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जीएसटी: न खुदा ही मिला न विसाले-सनम

दरों में बदलाव कहने को तो गुवाहाटी में जीएसटी काउंसिल ने किया, पर इस कवायद में दिखाई गई जल्दबाजी का कारण विधानसभा चुनाव के मद्देनजर गुजरात के कारोबारियों की नाराजगी को कम करना ही था।

Author नई दिल्ली | Published on: November 22, 2017 3:22 AM
प्रतीकात्मक फोटो। (फाइल)

जीएसटी की दरों में किए गए बदलाव ने एक बार फिर केंद्र सरकार की हड़बड़ी को उजागर किया है। जाहिर है कि दरों में बदलाव कहने को तो गुवाहाटी में जीएसटी काउंसिल ने किया, पर इस कवायद में दिखाई गई जल्दबाजी का कारण विधानसभा चुनाव के मद्देनजर गुजरात के कारोबारियों की नाराजगी को कम करना ही था। नतीजतन कई मामलों में उपभोक्ताओं को राहत देने का मकसद तो पूरा होता दिख ही नहीं रहा है सरकारी खजाने को भी चपत लगी है।  सरकार ने रेस्तरां पर जीएसटी की दर घटाने का खूब प्रचार किया । 15 नवंबर से सभी रेस्तरां पर जीएसटी एक समान 5 फीसद की दर से लागू करने का एलान हुआ है। इससे पहले गैर-वातानुकूलित रेस्तरां में खाने पर जीएसटी पांच फीसद था जबकि वातानुकूलित रेस्तरां में खाने पर 18 फीसद जीएसटी लागू था। दरों में कटौती तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जरूर कर दी है। पर साथ में यह शर्त भी लगा दी है कि अब रेस्तरां के मामले में किसी को भी आइटीसी का लाभ नहीं मिलेगा। देखने से यही लगता है कि सारा टैक्स सरकार के पास रह जाएगा।  लेकिन हकीकत के धरातल पर गौर करें तो यह कवायद निरर्थक लगती है। उपभोक्ता को इसका कोई फायदा नहीं मिल रहा। उसकी जेब को पहले भी चपत लग रही थी और अब भी लग रही है। मसलन 20 रुपए की एक कप चाय पर पहले रुपए 3.60 जीएसटी जोड़कर रेस्तरां वाले बिल तो रुपए 23.60 का देते थे, पर खुले चालीस पैसे कोई नहीं लौटा रहा था। अलबत्ता उपभोक्ता से 25 रुपए वसूल कर उसे एक रुपए की  टाफी देते थे। दर पांच फीसद हो जाने पर भी वे एक कप चाय 21 रुपए में नहीं दे रहे। अब अपनी चीज के दाम बढ़ाकर जीएसटी तो पांच फीसद लेने लगे हैं, पर ग्राहक को अब भी 25 रुपए ही देने पड़ रहे हैं। इस मनमानी के पीछे रेस्तरां मालिक जीएसटी पर आइटीसी का लाभ वापस ले लेने की अपनी पीड़ा को वजह बना रहे हैं।

पूर्व की तरह ही इस बार भी सरकार का नेटवर्क दरों में बदलाव के फैसले को तय तारीख 15 नवंबर को लोड करने में नाकाम साबित हुआ। वित्त मंत्री ने सोचा ही नहीं कि आम आदमी के फायदे के नाम पर उन्होंने जो फैसला किया है, उसका न तो आम आदमी को फायदा मिल पाया और न सरकार का कर राजस्व बढ़ेगा। यानी खुदा ही मिला न विसाले सनम, वाली कहावत चरितार्थ हो गई। सरकार की विसंगतियों और विरोधाभासों की सूची तो बहुत लंबी है। मसलन, महंगे काजू पर जीएसटी पांच फीसद है तो उससे सस्ते और ज्यादा लोगों के उपयोग में आने वाले बादाम पर जीएसटी 12 फीसद है। और तो और दस्तकारी को भी सरकार ने नहीं छोड़ा। लखनवी चिकन के कपड़ों पर भी 12 फीसद की दर से जीएसटी लगा दिया है। नतीजतन दस्तकारों का रोजगार कपड़ा महंगा होने से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। महज एक हजार रुपए से कम कीमत वाले चिकन कपड़े को ही जीएसटी से मुक्त रखा है। इससे पहले कपड़े पर कोई टैक्स नहीं था। बेकरी के आइटमों पर भी जीएसटी की दरें भिन्न हैं। यानी आइटम में क्रीम लगी है तो अलग दर और कोई मेवा इस्तेमाल हुआ हो तो अलग दर। कारोबारियों को कई दरें होने से ही खाते रखने और रिटर्न भरने में ज्यादा अड़चन आ रही है। दुनिया के किसी भी देश में आम तौर पर जीएसटी की दो से ज्यादा दरें नहीं हैं। लेकिन अपने देश में अब भी चार दरें बदस्तूर लागू हैं।

 

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