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विशेष: महादेव के सीने पर कृष्ण के पांव के निशान

श्रीकृष्ण कंदरा में प्रवेश करके पहाड़ी के ऊपर प्रकट हुए और वहीं से उन्होंने मधुर बांसुरी बजाई। बांसुरी की आवाज सुनकर गोपियों का ध्यान टूटा और उन्होंने पहाड़ी के ऊपर कृष्ण को बांसुरी बजाते हुए देखा। इस बांसुरी की ध्वनि से पर्वत के पिघलने के कारण उसमें श्रीकृष्ण के चरण चिह्न उभर आए।

यूपी के ब्रजमंडल के नंदगांव के प्रसिद्ध काम्यवन में स्थित चरण पहाड़ी।

कुल 84 कोस में फैले समूचे ब्रज मंडल का संबंध भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं से है। यहां के कण-कण में कृष्ण का वास है। भगवान की लीलाओं के कई चिह्न इस क्षेत्र में बिखरे पड़े हैं। एक ऐसा ही स्थान है नंद गांव स्थित चरण पहाड़ी। जहां माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण के बांसुरी बजाने की मुद्रा में बाएं व दाएं पैर का अंगूठा आज भी अंकित है।

इस पौराणिक व आध्यात्मिक प्रसंग के बारे में कहा जाता है कि बाल रूप में कृष्ण के दर्शन की लालसा से भगवान शिव यहां आए तो काफी परिश्रम के पश्चात उन्हें उनके दर्शन संभव हुए। दर्शनों के समय कृष्ण ने अपने दाएं पैर के अंगूठे को शंकर जी के मस्तक से स्पर्श किया तो शिव ने अंगूठे के स्पर्श को चिरकाल तक रखने की कामना व्यक्त की।

बाल कृष्ण ने शंकर जी को छह महीने तक रुकने के लिए कहा। छह महीने के बाद बाल कृष्ण ने गाय चराने के लिए हठ किया। बाल हठ के सामने मैया यशोदा और नंद बाबा ने गाय चराने की अनुमति दे दी। सभी ग्वालों के साथ श्री कृष्ण नंदगांव गाय चराने गए तो गायों के दूर जाने पर कृष्ण ने भगवान शंकर के वक्षस्थल पर त्रिभंगी लाल के रूप में बांसुरी बजाई।

बांसुरी की मधुर ध्वनि से पहाड़ पिघला और यहां उनके पैरों के चिह्न अंकित हो गए। वर्तमान में यह स्थान चरण पहाड़ी के नाम से प्रसिद्ध है। यह पहाड़ी ब्रजमंडल के प्रसिद्ध काम्यवन में स्थित है। एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण गाय चराते हुए अपने सखाओं को छोड़कर एकान्त में इस रमणीय स्थान पर गोपियों से मिले।

वे गोपियों के साथ लुका-छिपी का खेल खेलने लगे। सभी गोपियों ने अपनी आंखें बंद कर लीं और कृष्ण निकट ही पर्वत की एक कंदरा में प्रवेश कर गए। सखियां उन्हें चारों ओर खोजने लगीं, लेकिन कृष्ण को ढूंढ न सकीं। इस पर वे बहुत चिंतित हुई कृष्ण का ध्यान करने लगीं। माना जाता है कि जिस स्थान पर वह ध्यान कर रही थीं, उस स्थल को वतर्मान में ध्यान कुंड कहा जाता है।

जिस कंदरा में कृष्ण छिपे थे, उसे लुकलुक कंदरा कहते हैं। श्रीकृष्ण कंदरा में प्रवेश करके पहाड़ी के ऊपर प्रकट हुए और वहीं से उन्होंने मधुर बांसुरी बजाई। बांसुरी की आवाज सुनकर गोपियों का ध्यान टूटा और उन्होंने पहाड़ी के ऊपर कृष्ण को बांसुरी बजाते हुए देखा। इस बांसुरी की ध्वनि से पर्वत के पिघलने के कारण उसमें श्रीकृष्ण के चरण चिह्न उभर आए। नजदीकी एक और पहाड़ी पर जहां गाय और बछड़े चर रहे थे और ग्वाल-बाल खेल रहे थे, उनके पैरों के निशान भी यहां अंकित हो गए।

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