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एकल पुरुषार्थ का कोविडकाल

व्यवस्था और शासन का ढांचा मुश्किल वक्त में कैसे हमें निहत्था छोड़ देता है, यह कोरोनाकाल ने लोगों को समझने से ज्यादा महसूस कराया है।

साफ है कि सरकार और समाज का सहकारी साझा महामारी के दौर पर बुरी तरह से दरकता जा रहा है।

मृणाल वल्लरी

कोरोना संकट के आज हम ऐसे चरण में हैं जहां सारी संस्थाएं अचानक से भरभराकर गिरती दिख रही हैं। हिंसा और भाषाई ओछेपन के तो कहने ही क्या। वैसे ऐसा सिर्फ हिंदुस्तानी समाज में ही नहीं, पूरी दुनिया हो रहा है। दिलचस्प है इस दौरान उम्मीद की जितनी भी कहानियां सामने आई हैं, वो एकल हैं। कोई लड़की 1500 किलोमीटर साइकिल चला गई तो बिहार से लौंगी मांझी की कहानी, जिन्होंने सालों कुदाल चला कर तीन किलोमीटर लंबी नहर खोद डाली ताकि उनके गांव तक पानी आ सके। लोग अपने बूते जो कर रहे हैं राज-समाज की उसमें कोई दिलचस्पी नहीं। इसके उलट एकल पुरुषार्थ के ये सुलेख जब वायरल हुए तो सरकारी प्रतिष्ठानों से लेकर सिनेमा और कॉरपोरेट घराने इंसानी जज्बे की इस चमक की बोली लगाने जरूर आगे आ आए।

यहां जो बात समझने की है वह यह कि अभी तक हमारे सीखने और जीने का जो पूरा अभिक्रम था वो कोरोना जैसे हालात के लिए तैयार नहीं था। हमने अपने बच्चे को स्कूल में दाखिला इसलिए नहीं दिलाया था कि वो आॅनलाइन क्लास करे। अनिता (अनुरोध पर बदला हुआ नाम) कहती हैं कि मैं दिल्ली के ऐसे नामी स्कूल में पढ़ाती हूं जहां बहुत ज्यादा अमीरों के बच्चे पढ़ने आते हैं। किसी बच्चे के अभिभावक की कमाई पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा है लेकिन वे पूरी फीस देने को तैयार नहीं हैं। आॅनलाइन कक्षा लेना मेरे लिए कितनी बड़ी चुनौती है यह मैं जानती हूं। लेकिन अभिभावकों को लगता है कि वो गाना और पेंटिंग सिखा रही है, इसके लिए पैसे क्या देना।

अनिता कहती हैं कि मुझे सिर्फ चालीस फीसद तनख्वाह मिल रही है। हमारे समाज में शिक्षकों की इतनी भी जरूरत नहीं समझी जा रही कि अमीर अभिभावक एक बार सोचे कि वो अपनी जिंदगी कैसे गुजार रहा होगा। अनिता सिंगल हैं और उन्हें अभी तक अपने इस फैसले पर गर्व था। लेकिन आज चालीस फीसद तनख्वाह खाते में आता देख कर वो अपने भविष्य को लेकर खौफजदा हो जाती हैं। अनिता कहती हैं कि कोरोना के पहले तक मुझे भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि हमने कैसा राज और समाज तैयार किया है।

मीनाक्षी लंबे समय से वर्क फॉर होम कर रही हैं। वो जरूरी काम से थोड़ी देर के लिए दफ्तर गईं तो वहां गंदगी का आलम देख कर चौंक गई। शौचालयों का हाल बुरा था। जो एकमात्र स्त्री शौचालय था उसका इस्तेमाल भी पुरुष करने लगे थे। मीनाक्षी के पता करने पर बताया गया कि कोरोना के कारण दफ्तर के अस्सी फीसद सफाई कर्मचारियों को निकाल दिया गया है। मीनाक्षी यह सोच कर दहल गई कि उन लोगों की जिंदगी कैसे कट रही होगी। शिक्षकों से लेकर सफाई कर्मचारियों की छुपी हुई बेरोजगारी के बीच सोनू सूद को नायक बना कर पेश कर दिया जाता है जो अपने निजी संसाधनों से अप्रवासी मजदूरों की घर पहुंचाने में मदद कर रहे थे।

एक राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अशोक कुमार बताते हैं कि एकल नायक का बखान और संस्थागत दुर्गति पर चुप्पी के कई कारण हैं। राजनीति का मतलब सिर्फ सत्ता पक्ष नहीं होता है। विपक्ष जो करता है वह भी राजनीति है। ऐसा नहीं है कि कोरोना के समय में विपक्षी दलों से जुड़े संगठनों ने कुछ नहीं किया। वे मजदूर, किसान, शिक्षक संगठनों के तौर पर बहुत कुछ कर रहे थे लेकिन उसकी चर्चा नहीं होने दी गई। उन्हें काम करने से रोका तक गया। इसकी वजह यह है कि वे विकल्प पैदा कर सकते हैं।

अशोक कहते हैं कि राज्य अगर इन बदहालियों की चर्चा करेगा तो फिर उसकी जिम्मेदारी होगी, जनकल्याणकारी योजनाओं में निवेश करना होगा। लेकिन अब सरकारों को निवेश और सबसिडी की बात करनी ही नहीं है। इसलिए वो निजी मेहनत कर कथित आत्मनर्भिर होने के महिमामंडन में जुटा रहता है।

साफ है कि सरकार और समाज का सहकारी साझा महामारी के दौर पर बुरी तरह से दरकता जा रहा है। सरकार और समाज के संबंधों की लोकतांत्रिक परस्परता इस दौरान जिस तरह दरकी है, उसकी कीमत हमें लंबे समय तक चुकानी पड़ सकती है। गनीमत सिर्फ यह है कि लोग हालात से हारने के बजाय अब सब्र के साथ इसका सामना कर रहे हैं, श्रम और नैतिकता की इकाई-दहाई बढ़ाकर वे यह मान रहे हैं कि इस कठिन वक्त को वे काट लेंगे। पर तब भी एक बात जो अपनी जगह कायम रहेगी, वह यह कि व्यवस्था और शासन का ढांचा मुश्किल वक्त में कैसे हमें निहत्था छोड़ देता है, यह कोरोनाकाल ने लोगों को समझने से ज्यादा महसूस कराया है। ल्ल

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