वर्ष 2024 में महाराष्ट्र से ओड़ीशा के सिमलीपाल बाघ अभयारण्य में लाई गई बाघिन जीनत ने चार शावकों को जन्म दिया है। ओड़ीशा के वन मंत्री गणेश राम सिंह खुंटिया ने मंगलवार को बताया कि बाघिन ने करीब 20 दिन पहले शावकों को जन्म दिया था और बाघिन व शावक स्वस्थ हैं।
इस बाघिन ने ओड़ीशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होते हुए लगभग 300 किलोमीटर की यात्रा करके राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था।
गणेश राम सिंह खुंटिया ने बताया कि शावक जीपीएस आधारित निगरानी में हैं और सुरक्षित हैं। यह अभयारण्य के लिए बहुत ही उत्साहजनक खबर है। उन्होंने कहा कि एक कैमरे से ली गई तस्वीर में जीनत अपने एक शावक को अपने मुंह में लिए हुए दिखाई दी।
जीनत को एक अन्य बाघिन जमुना के साथ नवंबर, 2024 में महाराष्ट्र के ताडोबा-अंधारी बाघ अभयारण्य से सिमलीपाल लाया गया था। यह कदम अभयारण्य के बाघ जीन पूल को मजबूत करने के प्रयासों का हिस्सा था। उस समय वह तीन साल की थी।
300 किमी यात्रा के बाद पकड़ी गई
जीनत ने ओड़ीशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होते हुए लगभग 300 किलोमीटर की यात्रा करके राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था। वह सात दिसंबर, 2024 को सिमलीपाल से निकली थी और कई जंगली रास्तों से गुजरते हुए 21 दिनों तक चले एक अभियान के बाद पश्चिम बंगाल में पकड़ी गई।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक पीके झा ने बताया कि इन शावकों में काफी ज्यादा आनुवंशिक विविधता है, क्योंकि इनका जन्म ताडोबा की एक बाघिन और सिमलीपाल के एक बाघ के मिलन से हुआ है। ये शावक इस अभयारणय में मौजूद बड़ी बिल्लियों (बाघों) की आबादी के भविष्य को सुरक्षित करने में मदद करेंगे।
उन्होंने कहा कि यह ओड़ीशा शावक के साथ जीनत की एक संरक्षण पहल है, जिसमें बाघों का अंतर- राज्यीय स्थानांतरण शामिल है। इसका सफल क्रियान्वयन अब दृढ़ता, विज्ञान और टीम कार्य की एक मिसाल बन गया है। पीके झा ने बताया कि बाघ स्थानांतरण परियोजना, जिसे सिमलीपाल के बाघों की आनुवंशिक विविधता बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, उसने सफल संतानें पैदा करके अपना मुख्य लक्ष्य हासिल कर लिया है।
नर बाघ टी-12 के साथ घूमते भी देखा गया
उन्होंने कहा कि अप्रैल, 2025 में जंगल में दोबारा छोड़े जाने के बाद जीनत को वहां रहने वाले नर बाघ टी-12 के साथ घूमते हुए देखा गया। हालांकि, बाघिन गर्भवती नहीं हुई। वह सिमलीपाल के अंदर आजादी से घूमी और मुख्य इलाके में अपना एक क्षेत्र बना लिया। फिर उसने चार शावकों को जन्म दिया।
ओड़ीशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने भी इस खबर की सराहना करते हुए इसे राज्य के वन्यजीव संरक्षण के सफर में गौरवपूर्ण मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा कि शावकों का सफल जन्म सिमलीपाल बनाए गए अनुकूल वातावरण को दर्शाता है । यह सफलता न केवल ओड़ीशा में बाघों की आबादी में वृद्धि का संकेत है, बल्कि वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित और सुदृढ़ वातावरण बनाने के हमारे प्रयासों का भी एक प्रमाण है।
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पिछले साल 126 बाघों की मौत हुई थी। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के मुताबिक दस वर्षों में देश में 1,256 बाघों की जान गई है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
