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समय भारी संवाद जारी

कोरोना संक्रमण के दौर में मनुष्य और समाज ने ऐसे कई अनुभव अर्जित किए, जो अपूर्व थे। इस दौरान घरों के किवाड़ जरूर बंद रहे पर अभिव्यक्ति ने अपने लिए नए रास्ते खोज निकाले।

Author Updated: January 20, 2021 1:57 AM
coronaसांकेतिक फोटो।

नए तजुर्बों ने रचना और संवाद की नई दुनिया रातोंरात आबाद कर दी। आदमी अपने कमरे में बैठकर रचनारत ही नहीं बल्कि संवादरत भी रह सकता है, यह अनुभव कोरोनाकाल की ऐसी देन है जिसका असर आगे भी लाजिम तौर पर दिखेगा। दिलचस्प है कि इस दौरान न विद्यालयों-महाविद्यालयों में कक्षाएं चलीं और न ही साहित्यिक मंच सजे। पर इन सब स्थगनों के बीच तकनीक कहने-सुनने और सीखने का नया चलन लेकर आया। तारीफ यह कि इस चलन को अपनाने वालों में वे भी शामिल रहे जो इससे पहले तक आगे बढ़कर खुद को परंपरावादी बताते थे। एक भारी समय में संवाद की बदलती दुनिया के बारे में तफ्सील से बता रहे हैं सूर्यनाथ सिंह।

महामारी के इस दौर में बहुत कुछ ठहर गया है। बहुत कुछ का रंग-रूप थोड़ा बदल गया है। मगर जीवन से जुड़ी बहुत सारी चीजें जस की तस भी बनी हुई हैं, जो तमाम संकटों के दौर में बनी रहती हैं। इन्हीं से जीवन का छंद सधता, जीवन की लय बनी रहती है। सतत सीखने, जानने-समझने, सीखे को साझा करते रहने की ललक भी उन्हीं में एक है।

यही वजह है कि संक्रमण के साए से बचाव के लिए एक तरफ शैक्षणिक संस्थानों के कपाट बंद रखने पड़े, तो वहीं दूसरी तरफ आॅनलाइन मंचों पर ज्ञान की धारा भी फूटी। सीखने-समझने के नए माध्यम सामने आ गए। नए माध्यमों की नई दुश्वारियां दिखीं, तो उनसे तालमेल बिठाने की कोशिशें भी। रचनाकार, कलाकार, चिंतक तो अभिव्यक्तिके अपने माध्यम तलाश ही लेते हैं। विकट से विकट परिस्थितियों में भी। सो, संगोष्ठियों के नए ठीए बन गए। ‘सेमिनार’ की जगह ‘वेबिनार’ होने लगे। देखते-देखते एक नई और अद्भुत दुनिया विकसित हो गई। इससे नए अनुभव मिले, तो नई संभावनाओं ने पंख भी पसारने शुरू कर दिए।

नया चलन

रचना को एकांत चाहिए। वह इस महामारी के सन्नाटे में खूब मिला। इसलिए शायद रचा भी खूब गया। मगर इस दौरान सन्नाटा दिखा तो संगोष्ठियों के मंचों पर। पर धीरे-धीरे इसके भी रास्ते निकल आए। सेमिनार की जगह वेबिनार का चलन चल निकला। बेशक वेबिनार में वह सुख नहीं, जो सेमिनार में मिलता है, पर इस विधा के कारण ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में सन्नाटा नहीं रहने पाया। बल्कि इससे एक नया चलन विकसित हुआ और वैचारिक आदान-प्रदान का दायरा कुछ बढ़ा ही।

संगोष्ठियों का महत्त्व इसलिए है कि इससे जो कुछ नया खोजा, रचा, वैचारिक रूप में ग्रहण किया जाता है, उसका प्रसार होता है। उसके विश्लेषण, समीक्षा और फिर उससे आगे नए विचारों, खोजों, रचनात्मक रंगों के उदय की संभावना बनती है। इसीलिए साहित्य, कला, संस्कृति के उन्नयन में संगोष्ठियों के महत्त्व को समझते हुए सरकारी, सहकारी और गैर-सरकारी स्तर पर इसके लिए बजटीय आबंटन किए जाने लगे। उच्च शिक्षण संस्थानों में गोष्ठियां अनिवार्य की गईं।

विचार और संगोष्ठी

संगोष्ठियां केवल मंच पर कोई पर्चा प्रस्तुत करने या भाषण देने का अवसर प्रदान नहीं करतीं। मंच के बाहर भी परस्पर मिलने-जुलने, बहस-मुबाहिशे का जरिया बनती हैं, अंतरानुशासनिक समन्वय का माध्यम बनती हैं। इस तरह एक क्षेत्र का विषय दूसरे क्षेत्र में विचार, तर्क-वितर्क, बहस का विषय बनता है। फिर उनके बीच से कई बार एक तीसरी धारा भी फूट निकलती है। मसलन, हिंदी साहित्य में दलित और स्त्री विमर्श नाम से कोई स्थापित वाद या धारा नहीं थी, मगर वह संगोष्ठियों में प्रस्फुटित विचारों से विकसित हुई और फिर स्थापित हुई। इसी तरह इतिहास के क्षेत्र में ‘सबाल्टर्न’ धारा फूटी। विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में इसी तरह निरंतर शोध और अनुसंधान के अवसर उपजते हैं।

आभासी मंच

मगर कोरोना संक्रमण की स्थिति ने इस वातावरण को बनाए रखने में गतिरोध उत्पन्न कर दिया। इस गतिरोध को तोड़ने का रास्ता निकला संचार माध्यमों के जरिए। वेबिनार को पहले से मौजूद बतकही और संवाद के कुछ माध्यमों को संगोष्ठी का मंच बना लिया गया। जिस तरह विद्यालयों-महाविद्यालयों के विद्यार्थी इन मंचों से पढ़ाई-लिखाई के लिए जुड़े, उसी तरह इस दौरान अध्यापक, विद्वान, विद्यार्थी, रचनाकार, संस्कृतिकर्मी और अनुसंधानकर्ता संगोष्ठियों के लिए भी जुड़े। संवाद और सीखने, विचार प्रकट करने का नया पटल स्थापित हुआ। लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर तैयार संगोष्ठी कक्षों, सभागारों के बरक्स बहुत सारे आभासी मंच तैयार हो गए।

इसके अनुभव भी अनोखे हुए। हर घर का बंद कमरा सभागार का विशाल मंच बन गया। चलते-फिरते, पार्क में घूमते-टहलते, रसोई में कलछी-कड़ाही से खेलते हुए भी संगोष्ठी में शिरकत का मौका उपलब्ध हुआ।

दूरी ना मजबूरी

दिलचस्प यह कि इससे सारे काम-धंधे बंद करके, कई किलोमीटर चल कर किसी को सुनने जाने की मजबूरी नहीं रही। खर्च के नाम पर बस कुछ इंटरनेट डाटा की लागत। इस तरह बहुत सारे ऐसे लोग, जो सभागारों, अतिथियों को बुलाने, उनके ठहरने की व्यवस्था, मानदेय वगैरह पर खर्च को देखते हुए संगोष्ठियां, रचनापाठ, विचार-विमर्श के आयोजन नहीं कर पा रहे थे, उन्हें यह एक अच्छा अवसर मिल गया।

आलम यह रहा कि इस दौरान साहित्य में लगभग रोज ही संगोष्ठियों, रचनापाठ के आयोजन होने लगे। बहुत सारे लोग, जो दूसरे देशों में रहते हैं, वे पुराने ढंग की संगोष्ठियों में नहीं पहुंच पाते या बुलाए जाते थे। पर वे भी इस तरह जुड़ कर विचार-विमर्श का हिस्सा बनने लगे। बहुत सारे लोग फेसबुक पर अपने मित्रों से जुड़ कर अपनी बातें साझा करने लगे। निस्संदेह यह एक नया और हर लिहाज से अनूठा अनुभव था।

कोरोनाकाल

कहते हैं कि एक रास्ता बंद होता है, तो दूसरा खुलता भी है। कोरोनाकाल में यही हुआ। हालांकि वेबिनार और शिक्षण के जिन मंचों का उपयोग इन दिनों हो रहा है, वे पहले से हमारे पास तैयार और उपलब्ध थे, इसलिए बहुत मुश्किल नहीं आई।

संगोष्ठियां ही क्यों, अनेक कारोबारी गतिविधियां पहले से आॅनलाइन चल रही थीं, इसलिए रोजमर्रा के जीवन में भी बहुत कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा। दैनिक जरूरत की चीजें, थोड़ी मुश्किल से ही सही, उपलब्ध होती रहीं। सूचनाओं के संकलन, प्रकाशन-प्रसारण, आदान-प्रदान में भी बहुत दिक्कतें पेश नहीं आईं। यही संकट अगर पांच-दस साल पहले आया होता, तो शायद विचारों की दुनिया का गतिरोध तोड़ना मुश्किल होता। खासकर शहरी जीवन भी शायद कुछ अधिक कठिन हो जाता। मगर तब पूर्णबंदी जैसा फैसला भी नहीं लिया जा पाता।

आदत और अवसर

संगोष्ठियों में श्रोता समाज से जुड़ कर जिस तरह बातचीत करने, अपने विचार साझा करने का सुख प्राप्त होता है, वह वेबिनार में नहीं मिल पाता। ज्यादातर लोगों का मानस मंचों से बोलने का बना हुआ है। श्रोताओं की आंखों में देख कर बोलने का अभ्यास है। वे कैमरे के सामने बैठ कर अभिनय के अभ्यस्त नहीं हैं। इसलिए सबसे अधिक पुरानी पीढ़ी या दरम्यानी पीढ़ी के सामने मुश्किलें पेश आईं।

वे इस माध्यम में खुद को असहज महसूस करते रहे। बहुत सारे लोग काफी देर तक यही नहीं समझ पाते कि वे ‘कनेक्ट’ भी हो पाए हैं या नहीं। इस तरह उनके बोलने-कहने की लय भंग होती है। पुरानी पीढ़ी के लोग इस माध्यम का उपयोग बहुत कम कर पाए। मगर अच्छी बात यह है कि धीरे-धीरे लोगों में इसकी आदत विकसित होती गई है, हो रही है।

जिस तरह रेडियो और टीवी के कार्यक्रमों में अब लोगों को अपनी बात कहने में परेशानी नहीं आती। जैसे टेलीविजन पर खेल देखने का मानस लोगों में बनता गया, उसी तरह उम्मीद की जा रही है कि वेबिनार का भी मानस बनेगा। लोग आभासी मंचों के अभ्यस्त होते जाएंगे। ल्ल

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