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रोज 11 लाख मुसाफिरों को खाना सर्व करता है IRCTC, जान‍िए क‍िचन में कैसे बनता और ट्रेन तक पहुंचता है

साल 2016 में खाने को लेकर 8,486 शिकायतें आई थीं, जो उससे पिछले साल के मुकाबले 37 प्रतिशत ज्यादा थी। ज्यादातर शिकायतें खाने की ज्यादा कीमत, फूड क्वॉलिटी को लेकर थीं।

रेल में यात्रियों को खाना सर्व करता एक कर्मचारी।

भारतीय रेलवे में प्रतिदिन 11 लाख मील्स यात्रियों तक पहुंचाई जाती हैं, जो एक वैश्विक रिकॉर्ड है। यह खाना किचन से लेकर आपके बर्थ तक कैसे पहुंचता है, अभिषेक जी दस्तीदार ने यही पता करने की कोशिश की।

नोएडा में एक आईएसओ सर्टिफाइड सेंट्रल किचन है, जिसे इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिजम कॉरपोरेशन (IRCTC) चलाता है। यह मशीन पूरे देश में रेलवे के सिस्टम से जुड़ी हुई है, जिसमें प्राइवेट कैटरर्स, फूड सप्लायर्स, छोटी बड़ी किचन और रेलवे के हर स्तर के अधिकारी शामिल हैं। 24 घंटे दिन रात एक ही वक्त पर लाखों यात्रियों को खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी इसी पर होती है। नोएडा में स्थित जगह को किचन जरूर कहा जाता है, लेकिन 4 मंजिल की यह इमारत 43000 स्क्वेयर फुट में फैली हुई है। सब्जियां काटने और रोटी बनाने के लिए दूसरे देशों की मशीनें यहां लगाई गई हैं। फिलहाल इसमें 50 लोग काम कर रहे हैं, लेकिन ये स्थिति जल्द ही बदलने वाली है। यहां एक मशीन एेसी है जो एक मिनट में 10 किलो प्याज काट सकती है। इटली से आई बेकरी मशीन सूप से खाने वाली ब्रेड स्टिक बनाती है। किचन में काम करने वाले लोग साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखते हैं। इनमें से कई लोग होटल मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स हैं। इसके इंचार्ज राजेश कुमार हैं, जो अमेरिका में भी काम कर चुके हैं।

किचन में एक माइक्रोबायोलॉजी लैब भी है, जिसमें बने हुए और कच्चे खाने के सैंपल की जांच होती है। बने हुए खाने को छोटे-छोटे बर्तनों में रखा जाता है और मैनुअली उन्हें पैक किया जाता है। इसके बाद ब्लास्ट चिलर्स पैकेट्स के तापमान को 3-5 डिग्री सेल्सियस पर लेकर आते गहैं। इसके बाद एसी कंटेनर वैन्स के जरिए उन्हें स्टेशनों तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद उन्हें ट्रेन के कोच में बने गर्म कंटेनर्स में रखा जाता है। उन्हें 45 डिग्री सेल्सियस पर गर्म कर यात्रियों को दिया जाता है।

रेलवे जो हमेशा ट्रेनों के लेट होने और गंदे टॉयलेटों के कारण आलोचनाएं झेलता आया है, उसे लोगों तक खाने की सर्विस पहुंचाने के लिए भी खरी-खरी सुननी पड़ती है। साल 2016 में खाने को लेकर 8,486 शिकायतें आई थीं, जो उससे पिछले साल के मुकाबले 37 प्रतिशत ज्यादा थी। ज्यादातर शिकायतें खाने की ज्यादा कीमत, फूड क्वॉलिटी को लेकर थीं। इसी को ध्यान में रखते हुए दो महीने पहले एनडीए सरकार एक नई कैटरिंग पॉलिसी लेकर आई है। आखिरी 7 साल पहले आई थी। साल 2015 में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने मेट्रो मैन ई श्रीधरन को रेलवे में सुधार को लेकर गठित एक कमिटी का चेयरमैन बनाया था। श्रीधरन कमिटी की मुख्य सिफारिशों में से एक था कि 2010 की कैटरिंग पॉलिसी को हटाया जाए और आईआरसीटीसी को फिर से फूड बिजनेस का कार्यभार सौंपा जाए।

इस तरह मैनुअली खाने को पैक किया जाता है।

फिलहाल आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर यात्रियों को रेलवे के एक पार्टनर Travelkhana.com की ओर से फूड अॉप्शन्स भी दिए जाते हैं, जिसे वह अॉनलाइन भुगतान पर मंगवा सकते हैं। सुरेश प्रभु ने इसे भी एक उभरता हुआ सेक्टर पाया था। उन्होंने कहा था कि प्राइवेट पार्टनर्स को खाना मुहैया कराना चाहिए, जहां यात्रियों को खुद से खाना चुनने की आजादी हो और रेलवे का इस फूड बिजनेस में सीधे तौर पर कोई रोल न हो। उन्होंने ई-कैटरिंग के जरिए 1 लाख मील प्रति दिन का टारगेट रखा है। इसके अलावा रेलवे ने पहले से तैयार रेडी टू इट के आइडिए को भी सटीक पाया है, जैसा सैनिक करते हैं। इसमें पैकेट को गर्म पानी में कुछ देर रखने से यह डिश तैयार हो जाती है। नई कैटरिंग स्कीम के तहत रेलवे ने फूड बॉक्स को लागू किया है, जो बेंगलुरु रेलवे स्टेशन पर पैक्ड मील्स देती है। लेकिन फिर भी IRCTC की किचन से आने वाला खाना ही नई पॉलिसी का केंद्र है।

खाना पकाते हुए कर्मचारी। नोएडा स्थित आईआरसीटी की सेंट्रल कैंटीन से खाना ले जाता हुआ ट्रक यहां एक लैब भी है, जिसमें खाने के सैंपल्स की जांच होती है। इसके बाद खाना यात्रियों तक पहुंचाया जाता है।

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