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देश के कुछ बड़े घोटाले

देश के बड़े घोटाले।

Author Updated: February 22, 2018 3:53 AM
बोफोर्स घोटाला

कोयला आबंटन घोटाला (2012) 1,86,000 करोड़

यह मामला तब सामने आया, जब महालेखाकार और नियंत्रक (सीएजी) ने मार्च 2012 में अपनी मसविदा रपट में सरकार पर आरोप लगाया कि उसने 2004 से 2009 तक की अवधि में कोयला ब्लॉक का आबंटन गलत तरीके से किया। सीएजी की अंतिम रपट के मुताबिक इससे सरकारी खजाने को 1 लाख 86,000 करोड़ रुपए की चपत लगी। फायदा कंपनियों ने कमाया। सीएजी के मुताबिक सरकार ने कई फर्मों को बिना किसी नीलामी के कोयला ब्लॉक आबंटित कर दिए। इनमें एनटीपीसी, टाटा स्टील, भूषण स्टील, जेएसपीएल, एमएमटीसी और सीईएससी जैसी सरकारी और निजी- दोनों कंपनियों के नाम शामिल थे।

2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला (2008)- 1,7600 करोड़

दिल्ली की एक अदालत ने पिछले दिनों 2 जी घोटाले में जिन 14 लोगों और तीन कंपनियों पर आरोप लगा था, उन सबको बरी कर दिया। इन लोगों के खिलाफ धारा 409 के तहत आपराधिक विश्वासघात और धारा 120बी के तहत आपराधिक षड्यंत्र के आरोप लगाए गए थे लेकिन अदालत को कोई सबूत नहीं मिला है।
क्या था घोटाला?
अब तक 2 जी घोटाला को भारत का सबसे बड़ा आर्थिक घपला माना जाता था। ये घोटाला साल 2010 में सामने आया जब भारत के महलेखाकार और नियंत्रक (कैग) ने अपनी एक रिपोर्ट में साल 2008 में किए गए स्पेक्ट्रम आबंटन पर सवाल खड़े किए। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कंपनियों को नीलामी की बजाय पहले आओ और पहले पाओ की नीति पर लाइसेंस दिए गए थे, जिसमें भारत के महालेखाकार और नियंत्रक के अनुसार सरकारी खजाने को अनुमानित एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था।

वक्फ बोर्ड जमीन घोटाला (2012) 1,50,000 करोड़

कर्नाटक अल्पसंख्यक आयोग ने राज्य वक्फ बोर्ड में 1,50,000 करोड़ से 2 लाख करोड़ रुपए के भूमि घोटाले का खुलासा किया था। कर्नाटक अल्पसंख्यक आयोग ने तब के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को रिपोर्ट सौंपने के बाद कहा था कि बोर्ड के पास 54 हजार एकड़ पंजीकृत भूमि है, जिसमें से करीब 27 हजार एकड़ भूमि में गड़बड़ी हुई है।

तेलगी घोटाला (2002) 20000
करोड़

अक्तूबर 2017 में बेंगलुरू के एक सरकारी अस्पताल में अब्दुल करीम तेलगी की मौत हो गई। साल 2006 में तेलगी को स्टांप घोटाले के कारण 30 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। इसके साथ ही उस पर 202 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था। माना जाता है कि कई हजार करोड़ रुपए के स्टांप पेपर घोटाले की शुरुआत 90 के दशक के आरंभिक वर्षों में हुई थी। तेलगी ने पहले तो स्टांप पेपर बेचने का लाइसेंस लिया फिर, जैसा कि आरोप है, वह नकली स्टांप पेपर छापने लगा। 1995 में तेलगी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
लेकिन गिरफ्तारी 2001 में ही हो सकी।

सत्यम घोटाला (2009) 14000 करोड़

बहुचर्चित सत्यम घोटाले में हैदराबाद की विशेष अदालत ने कंपनी के पूर्व चेयरमैन रामलिंग राजू समेत सभी दस दोषियों को सात साल की सज़ा सुनाई।अदालत ने राजू पर पांच करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया। यह घोटाला जनवरी 2009 में सामने आया था। मामले की सुनवाई 50 महीनों तक चली थी।. इस दौरान तीस महीनों तक राजू, और उनके प्रबंध निदेशक भाई बी रामा राजू ने जेल में बिताए। कंपनी के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी श्रीनिवास वदलामानी समेत अन्य अधिकारियों पर भी धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ था।

बोफर्स घोटाला (1980-90) 64 करोड़

बोफर्स तोप घोटाले को आजाद भारत के बाद सबसे बड़ा बहुराष्ट्रीय घोटाला माना जाता है। 1986 में हथियार बनाने वाली स्वीडन की कंपनी बोफर्स ने भारतीय सेना को 400 तोपें सप्लाई करने का सौदा किया था। यह डील 1.3 अरब डॉलर की थी। 1987 में यह बात सामने आई थी कि यह सौदा हासिल करने के लिए भारत में 64 करोड़ रुपए दलाली दी गई। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। स्वीडिश रेडियो ने सबसे पहले 16 अप्रैल1987 में दलाली का खुलासा किया।

चारा घोटाला (1990) 950 करोड़

इसे पशुपालन घोटाला ही कहा जाना चाहिए क्योंकि मामला सिर्फ चारे का नहीं था। असल में, यह सारा घपला बिहार सरकार के खजाने से गलत ढंग से पैसे निकालने का है। कई वर्षों में करोड़ों की रकम पशुपालन विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों ने राजनीतिक मिली-भगत के साथ निकाल ली थी। बात बढ़ते-बढ़ते तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तक जा पहुंची। मामला एक-दो करोड़ रुपए से शुरू होकर 950 करोड़ रुपए तक जा पहुंचा।

राष्ट्रमंडल खेल घोटाला (2010) 70000 करोड़

2010 में राष्ट्रमंडल खेल हुए थे। इसमें सामान की खरीदी में गड़बड़ी पकड़ में आई थी। करीब 70000 करोड़ रुपए का घपला हुआ था। इसमें कई गिरफ्तारियां हुई थीं।

हर्षद मेहता व केतन पारेख शेयर बाजार घोटाला (1992 और 2001) 5000 करोड़

हर्षद मेहता और केतन मेहता ने धोखाधड़ी कर बैंकों का पैसा शेयर बाजार में लगाना शुरू कर दिया जिससे बाजार को बड़ा नुकसान हुआ। एक रिपोर्ट के मुताबिक बाजार में बैंकों का पैसा लगाकर मेहता खूब लाभ कमा रहा था। लेकिन यह रिपोर्ट सामने आने के बाद शेयर बाजार धड़ाम हो गया। साल 2001 तक केतन पारेख देश का सफल ब्रोकर बन गया। पारेख ने तब ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और माधवपुरा मर्चेंटाइल को-आॅपरेटिव बैंक से पैसा लिया था।
और के-10 स्टॉक्स के नाम से उसने शेयर बाजार में हेर फेर की।

हवाला घोटाला (1990-91) 100 करोड़

इस कांड से पता चला कि कैसे हवाला दलालों से राजनेताओं को पैसे मिलते हैं। जब्त डायरियों के आधार पर सीबीआइ ने जांच की और कुछ मामलों में आरोप पत्र भी दायर हुए। दिल्ली हाईकोर्ट ने डायरी को सुबूत मानने से इनकार करते हुए पूरी कार्रवाई पर रोक लगा दी।

1998 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर मुहर लगा दी और राजनेता सभी आरोपों से मुक्त हो गए।

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