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शोध: दो चरणों में बना हमारा शुरुआती सौरमंडल

वैज्ञानिकों ने हमारे सौरमंडल के शुरुआती दौर की दो चरणों की निर्माण प्रक्रिया की खोज की है। यह प्रक्रिया सौरमंडल की घटनाओं के क्रम के साथ उसकी आंतरिक और बाहरी घटनाओं की भी व्याख्या करने में सक्षम है। यह अध्ययन आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, एलएमयू म्यूनिख, ईटीएच ज्यूरिख, बीजीआइ बेरूत और ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने किया है।

Author Updated: January 26, 2021 4:12 AM
solarवैज्ञानिकों को अध्‍ययन से पता चला है दो चरणों में बना है हमारा शुरुआती सौरमंडल।

हमारे सौरमंडल का निर्माण कैसे हुआ, इस पर वैज्ञानिकों के कई मत सामने आए हैं। हालांकि, अभी तक कोई ऐसा सर्वमान्य मत सामने नहीं आया है जो सौरमंडल की वर्तमान सभी स्थितियों की व्याख्या कर सके। ताजा शोध में सौरमंडल के निर्माण और स्वरूप की ऐसी सैद्धांतिक व्याख्य दी है, जो हमारे ग्रहों की स्थितियों के साथ ही क्षुद्रग्रहों और उल्काओं की भी व्याख्या करने में सक्षम है।

आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, एलएमयू म्यूनिख, ईटीएच ज्यूरिख, बीजीआइ बेरूत और ज्यूरिख यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने हमारे सौरमंडल के शुरुआती दौर की दो चरणों की निर्माण प्रक्रिया की खोज की है। यह प्रक्रिया सौरमंडल की घटनाओं के क्रम के साथ उसकी आंतरिक और बाहरी घटनाओं की भी व्याख्या करने में सक्षम है।

यह कार्य खगोलविज्ञान में हो रही प्रगति से भी जुड़ा है। इसमें उल्काओं में पानी, सौरमंडल में लोहे और आइसोटोप के अध्ययन भी शामिल हैं। सूर्य और सौरमंडल के निर्माण के शुरुआती दौर के खगोलभौतिकी और भू-भौतिकीय प्रक्रियाओं के मिश्रण का अध्ययन किया गया।

अध्ययन में इस बात की भी व्याख्या की गई कि सौरमंडल के अंदर के ग्रह छोटे और कम पानी के साथ सूखे और बाहर के ग्रह बड़े और बहुत सारे पानी के साथ क्यों हैं। अंदर के ग्रह पहले सूर्य के चक्कर लगाने लगे थे और अंदर से बहुत तीव्र रेडियोधर्मी विघटन से गर्म होते रहे। इससे वे जल्दी ही सूखने लगे, जिससे उनकी आंतरिक परत की तुलना में बाह्य परत सूखी और गीली रह गई।

इस तरह की व्याख्या दूसरे बाह्य ग्रहों के प्रणालियों की निर्माण अवस्थाओं और वितरण में भी काम आ सकती है। वैज्ञानिकों के बहुत सारे प्रयोगों ने बताया कि आंतरिक सौरमंडल की आंतरिक शुरुआती अवस्थाओं और उसकी अनुवृद्धि एक युग में पूरी हुई, जबकि इसके बाद दूसरे युग में ज्यादा तेजी से बाहरी सौरमंडल के ग्रहों का निर्माण हुआ।

ग्रहों के निर्माण करने वाली डिस्क के हालिया अवलोकन से पता चलता है कि डिस्क के तल, जहां पर ग्रहों का निर्माण होता है वहां तुलनात्मक रूप से विक्षोभ (टब्युर्लेंस) स्तर कम होते हैं। ऐसी हालत में डिस्क की गैस और पानी में मौजूद धूल के कण ग्रहों के निर्माण की शुरुआत करते हैं। ऐसा डिस्क कक्षा में उस जगह पर होता है, जहां ये कण गैस से बर्फ की अवस्था में बदल रहे होते हैं।

आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एट्मॉस्फियरिक, ओसियानिक एंड प्लैनेटरी फिजिक्स विभाग के विशेषज्ञ और इस अध्ययन के प्रमुख लेखक टिम लिचेनबर्ग ने बताया कि ग्रहों के निर्माण के समय के अंतराल अलग-अलग थे, क्योंकि उनके रेडियोधर्म विघटन वाले आंतरिक ऊष्मा कारकों की सक्रियता में काफी अंतर था।

पहले सौरमंडल के अंदर के ग्रहों का निर्माण हुआ और फिर बाद में बाहरी हिस्से का निर्माण हुआ जहां गीले ग्रह बने। इस तरह सौरमंडल के निर्माण की शुरुआत से ही दो अलग अलग तरह से ग्रहों के विकास हुए। माना जा रहा है कि इस अध्ययन से खगलोविदों को पृथ्वी के शुरुआत वायुमंडल के निर्माण को समझने में भी मदद मिल सकती है।

हाल ही में खगोलविदों ने सुपर अर्थ की श्रेणी का एक गर्म और पथरीला बाह्य ग्रह खोजा है। यह ग्रह हमारी गैलेक्सी मिल्की के सबसे पुराने तारों में से एक का चक्कर लगा रहा है। बाह्य ग्रह हमारे सौरमंडल के बाहर पाए जाने वाले ग्रह को कहते हैं जो किसी दूसरे तारे का चक्कर लगाते हैं। यह बाह्य ग्रह पृथ्वी से 50 फीसद बड़ा है और इसका भार पृथ्वी से तीन गुना ज्यादा बड़ा है। इस वजह से टीओआइ-561बी नाम के ग्रह को सुपरअर्थ की श्रेणी में रखा गया है।

 

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