उम्मीद: आयुर्वेदिक चिकित्सा में नहीं है अवसरों की कोई कमी

एलोपैथी दवाओं की बढ़ती कीमत और दिन-प्रतिदिन इसके बढ़ते विपरीत प्रभावों की वजह से लोग एलोपैथी उपचार से दूरी बढ़ा रहे हैं और आयुर्वेद की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति भारतीय समाज में सदियों से मान्यता प्राप्त है।

भारत में प्राचीन काल से बीमारियों का इलाज जड़ी-बूटियों और अन्य प्राकृतिक औषधियों से किया जाता रहा है। चिकित्सा की इस पद्धति पर लोगों का भरोसा आज भी कायम है। बड़ी संख्या में लोग चिकित्सा की अन्य पद्धतियों के मुकाबले आयुर्वेद को अपना रहे हैं। कोरोना विषाण्ुा संकट के दौरान भी इस पद्धति का उपयोग बीमारी के इलाज और उससे बचाव के लिए किया जा रहा है। आयुष मंत्रालय की ओर से आयुर्वेद के ज्ञान के जरिए रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के सुझाव भी दिए गए हैं। ऐसे में यह क्षेत्र करिअर के बेहतर विकल्प के रूप में भी सामने आया है। यहां अवसरों की कोई कमी नहीं है।

आयुर्वेद को सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धति माना जाता है। इस चिकित्सा पद्धति की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसमें किसी बीमारी का इलाज प्राकृतिक तरीके से किया जाता है। देश में आयुर्वेद पाठ्यक्रम और शिक्षण संस्थान भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद (सीसीआइएम) द्वारा संचालित है। आयुर्वेद के पाठ्यक्रम विशेष 17 क्षेत्र हैं।

ये हैं पाठ्यक्रम
स्नातक : बैचलर आॅफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी (बीएएमएस) पाठ्यक्रम की अवधि पांच साल छह महीने है। इसमें छह महीने की इंटर्नशिप भी शामिल है। बैचलर आफ फामेर्सी इन आयुर्वेद का भी पाठ्यक्रम किया जा सकता है। स्नातक पाठ्यक्रम में नामांकन के लिए आवेदक को किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से भौतिकी, रसायन और जीवविज्ञान विषयों के साथ 12वीं की परीक्षा में 45 फीसद अंकों के साथ उत्तीर्ण होना अनिवार्य है।

स्नातकोत्तर : आयुर्वेद में स्नातकोत्तर (एमडी व एमएस) डिग्री भी कराई जाती है। इस पाठ्यक्रम की अवधि तीन साल है। इसमें दाखिले के लिए बीएएमस की डिग्री होना जरूरी है।
पीएचडी : पीएचडी पाठ्यक्रम में कम से कम दो साल का समय लगता है। आयुर्वेद में बीएएमएस और स्नातकोत्तर डिग्री धारक विद्यार्थी ही पीएचडी में दाखिले ले सकते हैं। इनके अलावा डिप्लोमा इन आयुष नर्सिंग एंड फार्मेसी में भी दाखिला लिया जा सकता है।

ऐसे होता है दाखिला
एमबीबीएस पाठ्यक्रम में दाखिले के आयोजित की जाने वाली राष्ट्रीय योग्यता एवं प्रवेश परीक्षा (नीट) में प्राप्त अंकों के माध्यम से तैयार होने वाली योग्यता सूची के आधार पर बीएएमएस में दाखिला होता है। काउंसिलिंग के माध्यम से विद्यार्थियों को शिक्षण संस्थानों का आबंटन किया जाता है। इसी तरह स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए अखिल भारतीय आयुष स्नातकोत्तर प्रवेश परीक्षा (एआइएपीजीईटी) का आयोजन किया जाता है। नीट और एआइएपीजीईटी का आयोजन राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी के द्वारा किया जाता है। स्नातक पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा में रसायन, भौतिकी और जीवविज्ञान से सवाल पूछे जाते हैं।

आयुर्वेद में बढ़ा शोध
एलोपैथी दवाओं की बढ़ती कीमत और दिन-प्रतिदिन इसके बढ़ते विपरीत प्रभावों की वजह से लोग एलोपैथी उपचार से दूरी बढ़ा रहे हैं और आयुर्वेद की ओर आकर्षित हो रहे हैं। आयुर्वेद के विकास और विस्तार के लिए भारत सरकार द्वारा केंद्रीय आयुर्वेद एवं सिद्धा अनुसंधान परिषद (सीसीआरएस) को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान के रूप में गठित किया गया है। पिछले कुछ साल में ऐसी कंपनियों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है, जो आयुर्वेदिक दवाइयों के निर्माण और शोध में लगी हैं। आयुर्वेद में काफी तेजी से बदलाव आ रहे हैं। विश्वसनीय चिकित्सा पद्धति होने के कारण लोग अब इसे काफी पसंद कर रहे हैं।

नौकरी के मौके
आयुर्वेद की पढ़ाई करने के बाद विद्यार्थी सरकारी एवं निजी अस्पतालों में सेवाएं दे सकते हैं। इसके अलावा अपना खुद का क्लीनिक खोलने का विकल्प भी उनके पास होता है। अगर कोई अध्यापन के क्षेत्र में जाना चाहता है तो किसी आयुर्वेद कॉलेज में सेवाएं दे सकता है। इसके अलावा दवा कंपनियों में भी तमाम अवसर उपलब्ध हैं। आयुर्वेद में बैचलर डिग्री हासिल करने के बाद किसी सरकारी अस्पताल या निजी अस्पताल में नौकरी मिलने पर 25-35 हजार रुपए प्रतिमाह मिल जाते हैं।

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