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The Unseen Indira Gandhi: पाक से जंग शुरू होने के अगले दिन बेहद कूल थीं इंदिरा, चेंज कर रही थीं बेड कवर

यह दावा 92 साल के डॉक्‍टर केपी माथुर ने अपनी हालिया प्रकाशित किताब में किया है। किताब में इंदिरा से जुड़े कई किस्‍सों का जिक्र है।

Author नई दिल्‍ली | April 28, 2016 5:09 PM
सफदरजंग अस्‍पताल के पूर्व डॉक्‍टर शर्मा ने इंदिरा गांधी की 1984 में हुई हत्‍या से पहले अपने और उनके जुड़ाव के 20 सालों के अनुभव को किताब में संजोया है।

1971 में भारत और पाकिस्‍तान के बीच जंग छिड़ने के ठीक एक दिन बाद तत्‍कालीन पीएम इंदिरा गांधी बेहद कूल थीं। जब उनके निजी डॉक्‍टर उनके पास पहुंचे तो इंदिरा दीवान के बेडकवर बदल रही थीं। यह दावा 92 साल के केपी माथुर ने अपनी हालिया प्रकाशित किताब में किया है। इंदिरा गांधी के साथ बिताए गए कई सालों के अनुभवों को उन्‍होंने किताब में जगह दी है।

किताब का नाम है-द अनसीन इंदिरा गांधी। किताब में माथुर ने लिखा है, ”यह बांग्‍लादेश वॉर शुरू होने का अगला दिन था। इससे पहले, वे देर रात तक काम करती रही थीं। जब मैं उन्‍हें देखने सुबह गया तो मैंने उन्‍हें कमरे की धूल साफ करते देखा। शायद इससे उन्‍हें पिछली रात के तनाव को कम करने में मदद मिली होगी।” 151 पन्‍नों की इस किताब में कई किस्‍सों का जिक्र है। सफदरजंग अस्‍पताल के पूर्व डॉक्‍टर शर्मा ने इंदिरा गांधी की 1984 में हुई हत्‍या से पहले अपने और उनके जुड़ाव के 20 सालों के अनुभव को किताब में संजोया है।

माथुर के मुताबिक, जब पाकिस्‍तान ने 3 दिसंबर 1971 को भारत पर हमला किया, उस वक्‍त गांधी कोलकाता में थीं। वह दिल्‍ली लौटीं। माथुर ने लिखा है, ”पूरी फ्लाइट के दौरान वे बेहद शांत नजर आईं। उनके दिमाग में जंग को लेकर रणनीति और आगे की कार्रवाई क्‍या हो, ये बातें चल रही थीं।” किताब में लिखा है कि ये वही गांधी हैं, जो 1966 में पीएम पद संभालने के बाद अक्‍सर नर्वस हो जाती थीं। किताब के मुताबिक, ”पीएम बनने के शुरुआती दो सालों में वे अक्‍सर तनाव में रहती थीं। कभी-कभी कन्‍फ्यूज भी रहती थीं। उनके पास कोई सलाहकार या दोस्‍त नहीं था।” माथुर के मुताबिक, पीएम बनने के शुरुआती दिनों में इंदिरा गांधी के पेट में दिक्‍कत होती थी जो शायद उनके नर्वस होने का नतीजा था।

माथुर के मुताबिक, गांधी एक खुशमिजाज, ख्‍याल रखने वालीं और मददगार महिला थीं। वे नौकरों से अच्‍छा बर्ताव करती थीं और हर नौकर को उसके नाम से पुकारती थीं। गांधी साधारण जीवन बिताती थीं। उन्‍होंने तीन मूर्ति हादस में शिफ्ट करने से इनकार कर दिया था। 1968 में राजीव और सोनिया की शादी के बाद ही इंदिरा ने घर में कमरों की संख्‍या बढ़ाई। जब वे टूर पर जाती थीं तो उनका नाश्‍ता दिल्‍ली के कनॉट प्‍लेस स्‍थित साउथ इंडियन कॉफी हाउस से मंगवाया जाता था। किताब में बताया गया है कि राजीव और सोनिया की शादी के बाद पीएम चाहती थीं कि सोनिया गांधी देश की सामाजिक और सांस्‍कृतिक जीवन में घुलमिल जाएं। घर में दूसरों से बात करते वक्‍त इंदिरा सोनिया को ‘बहुरानी’ कहकर पुकारती थीं। सोनिया और इंदिरा जल्‍द ही बेहद करीब आ गए। इसके बाद सोनिया को घर संभालने की जिम्‍मेदारी मिल गई।

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किताब के मुताबिक, इंदिरा रविवार और अन्‍य छुट्ट‍ियों को किताबों के साथ रिलैक्‍स करना पसंद करती थीं। उन्‍हें महान लोगों की जीवनी पढ़ने का शौक था। इसके अलावा, उन्‍हें इंसानी शरीर और दिमाग से जुड़े विषयों पर आधारित किताबें भी पढ़ना पसंद था। उन्‍हें क्रॉसवर्ड्स सुलझाना भी अच्‍छा लगता था। माथुर का कहना है कि गांधी ने 1977 के लोकसभा चुनावों में मिली हार को बेहद ‘शालीनता’ से कबूल कर लिया। वे कहते हैं, ”चुनाव हारने के बाद पीएम खुद को थोड़ा अकेला महसूस करती थीं। उनके पास करने के लिए कुछ नहीं था। उनके पास कोई फाइलें नहीं आती थीं। उनके पास ऑफिस, स्‍टाफ कार या खुद की कार तक नहीं थी। उन्‍हें जो स्‍टाफ कार मिली थी, वो वापस ले ली गई। उनकी मदद के लिए कोई टेलिफोन ऑपरेटर नहीं था। वे अपने दोस्‍तों के नंबर भूल गई थीं।”

किताब में दावा किया गया है कि इंदिरा गांधी न केवल धार्मिक थीं, बल्‍क‍ि अंधविश्‍वासी भी थीं। वे रूद्राक्ष की लडि़यों वाली एक माला पहनती थीं, जो धर्मगुरु आनंदमयी मां ने उन्‍हें दिया था। माथुर ने लिखा है, ”मैं इस बात को लेकर आश्‍वस्‍त नहीं हूं कि वे रोजाना पूजा करती थीं कि नहीं, लेकिन एक अलग रूम में उन्‍होंने देवी-देवताओं की तस्‍वीरें और कुछ मूर्तियां लगा रखी थीं। अपने दौरों में वे देश के किसी भी हिस्‍से में बने हर मशहूर मंदिर जाती रहती थीं। वे बद्रीनाथ, केदारनाथ के अलावा कई अन्‍य मशहूर मंदिर गईं। वे वैष्‍णो देवी और तिरुपति मंदिर भी जा चुकी हैं। वे सभी धार्मिक रीति रिवाजों का पालन करती थीं।”

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