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विशेष: सावन एक सजल सबक

भारतीय परंपरा में सावन बरसात का एक महीना भर नहीं है। यह महीना उस भगवान शिव का है, जिनके औघड़पन के पौराणिक किस्से सुन कभी एलेन गिंसबर्ग अमेरिका से खिंचे-खिंचे भारत आ गए थे और भारत के देशज सम्मोहन में बंंधते चले गए थे। गिंसबर्ग का नाम इसलिए क्योंकि अनास्था को विद्रोह और अराजकता को क्रांतिकारी विमर्श का प्रस्थान या साहित्यक दर्शन बताने वाली उनकी जैसी मोहभंगी फिक्र आज भी देश के अंदर-बाहर अलग-अलग स्वरों, तेवरों और तर्कों के साथ देखने-सुनने को मिलती है। असल में यह एक हताशा है जो भौतिकवादी दुनिया और मानस की तयशुदा नियति है।

Sawan, Shiv Month, Rainy seasonसावन बरसते मेघ और तपती धरती के बीच जिस तरह का सजल लोक संसार रचा है, वह न सिर्फ रंगारंग है बल्कि सांस्कृतिक संपन्नता की बड़ी मिसाल भी है।

सावन का आगमन हो चुका है। भारतीय लोक परंपरा में मौसम कैलेंडर के महज कुछ तारीख भर नहीं बल्कि परंपरा और जीवनशैली का रागात्मक साझा है। एक ऐसा साझा जिसके बीच जीवन और प्रेम के कई पाठ हम पीढ़ियों से पढ़ते-सीखते आए हैं। निष्कर्ष और विमर्श के आधुनिक चलन ने लोक की विलक्षणता का जहां एक तरफ कुबेरी इस्तेमाल किया है वहीं इसे मध्यकालीन भदेस के सांस्कृतिक अवशेष के तौर पर खारिज भी किया है। बात अकेले सावन की करें तो बरसते मेघ और तपती धरती के बीच जिस तरह का सजल लोक संसार इसने रचा है, वह न सिर्फ रंगारंग है बल्कि सांस्कृतिक संपन्नता की बड़ी मिसाल भी है। कोविड-19 के संकट के बीच हरियाले सावन का आगमन एक सुकून की तरह है। सावन से जुड़ी लोक परंपराओं के साथ नए समय में इस मौसम की सांस्कृतिक अहमियत की चर्चा कर रहे हैं प्रेम प्रकाश

लोक, आस्था और परंपरा का भारत कहीं पीछे छूट गया है। नया भारत रफ्तार में है, बाजार में है, कुबेरी सपनों में है, सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स के बीच महानगरीय संस्कारों में करवटें बदल रहा है। पर गांव को रूढ़ियों का तबेला और लोक परंपराओं को जहालत का युगीन लदान मानकर कोई अपनी कॉलर चाहे जितनी ऊंची कर ले लेकिन यह तो तय मानिए कि समझ और बुद्धि की इस दुनिया से आज भी कहीं ज्यादा सघन, जीवंत और विशाल है भारतीय लोक का सांस्कृतिक भूगोल।

इस लोक की समृद्धि का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इसके पास अपना कैलेंडर है, अपना संगीत और जीवनशैली है। मौसम से लेकर तीज-त्योहार तक रीति-संस्कृति की ऐसी लोक-समृद्धि 21वीं सदी के दूसरे दशक तक पहुंची दुनिया के शायद ही किसी हिस्से में देखने को मिले। बारहमासा गाने वाले इस भारतीय लोक में आस्था के सगुनिया और निरगुनिया रंग के तो कहने ही क्या! पीर और उल्लास दोनों की रागात्मक स्वीकृति इस लोक के पद को मान्यता और परंपरा से आगे दर्शन तक ले जाती है, उसे जीवन मंत्र में बदल देती है।

कोरोना और सावन
कोरोना संकट ने पिछले कुछ महीनों में दुनिया को वैसा ही नहीं रहने दिया है, जैसा इससे पहले वह थी। सेहत और जीवन की चिंता के बीच जहां सबसे ज्यादा उथल-पुथल मची है, वह है अर्थ और कारोबार की दुनिया। यानी एक ऐसी दुनिया जहां धन लक्ष्य भी है और कसौटी भी। मुनाफा इस दुनिया का एकल नियामकीय सूत्र है। इसे गनीमत ही कहें कि सोहर और मर्सिया दोनों के लिए समान शिद्दत से टेर भरने वाले भारतीय लोक में यह सूत्र काम नहीं करता। वहां नियामकीय आसन पर आज भी विराजमान हैं- प्रकृति और उससे जुड़ी ढेर सारी आस्था।

महज महीना भर नहीं सावन
आस्था को दिल से जीने वाले इस लोक के लिए साल का यह महीना खास है। यह महीना है सावन का। सावन का आगमन इस बार कोरोना संकट के कारण पाबंदियों के शासकीय आदेशों के कारण सुर्खियों और हैशटैग की दुनिया में कहीं खो सा गया। पर उमस भरी गर्मी के बीच सावनी मेघ की फुहारों ने इस बार भी बता दिया कि माटी-पानी और वाणी से सने भारतीय लोक में प्रकृति और परंपरा का सुलेख आज भी अमिट है।

दरअसल, भारतीय परंपरा में सावन बरसात का एक महीना भर नहीं है। यह महीना उस भगवान शिव का है, जिनके औघड़पन के पौराणिक किस्से सुन कभी एलेन गिंसबर्ग अमेरिका से खिंचे-खिंचे भारत आ गए थे और भारत के देशज सम्मोहन में बंंधते चले गए थे। गिंसबर्ग का नाम इसलिए क्योंकि अनास्था को विद्रोह और अराजकता को क्रांतिकारी विमर्श का प्रस्थान या साहित्यक दर्शन बताने वाली उनकी जैसी मोहभंगी फिक्र आज भी देश के अंदर-बाहर अलग-अलग स्वरों, तेवरों और तर्कों के साथ देखने-सुनने को मिलती है। असल में यह एक हताशा है जो भौतिकवादी दुनिया और मानस की तयशुदा नियति है।

बसंत और सावन
जिक्र सावन का है तो उस चूक की भी चर्चा जरूरी है जो बसंत को ऋतुराज मानने के कुलीनता से भरे सौंदर्यबोध के कारण भारत सहित पूरी दुनिया के साहित्यकारों से हुई है। सावन के पास बसंत का पीला पाग भले न हो पर प्रकृति का जितना हरापन और फलों की जितनी मिठास उसके पास है, वह शायद ही किसी और ऋतु के पास हो। और तो और बासंती राग और फाग में डूबे किसी दिल को अगर ठेस लग जाए तो वह अपनी पीर के लिए कोई बासंती टेर नहीं भर सकता।

पोर-पोर तक पीर, खुशी और आस्था का कलेजा तो सावनी मेघों की उमड़-घुमड़ पर जीवन नर्तन की कला जानने वालों के ही पास है। सावन के पास इस लिहाज से जीवन का श्याम-श्वेत, धूप-छांह कहीं ज्यादा है, जीवन की शुभ्रता को तिलकित करने वाले बसंत के मुकाबले।

मौजूदा शब्दावली में कहें तो बसंत का प्रेम मादक जरूर है, पर वह ‘टीनएजर’ है, जबकि सावन के पास आलिंगन, सम्मोहन से लेकर बिछोह की पुकार तक सब कुछ है। जिन कजरी गीतों को बड़े-बड़े गवैयों ने गाया, वे गीत लोकमानस में प्रेम की कोई पुरानी आकृति या स्मृति भर नहीं गढ़ते बल्कि लोक समाज के बीच उस जरूरी ‘स्पेस’ की तार्किक दरकार भी रखते हैं, जिससे प्रेम को वियाग्रे की खुराक से आगे सामाजिक ताने-बाने के जरूरी हिस्से के तौर पर देखा-समझा जाए।

पानीदार सबक
आज पूरी दुनिया जिन मुसीबतों से गहरे तौर पर घिरी है, उसमें सावन एक सजल सबक की तरह है। मेघ के बरसने और प्यासी धरती के होठ तर होने के बीच सिर्फ सौंदर्य और संगीत भर नहीं बल्कि यह पानीदार सीखभी है कि बिन पानी सब सून। नीति आयोग के सर्वे के अनुसार देश में 60 करोड़ की आबादी भीषण जल संकट का सामना कर रही है। अपर्याप्त और प्रदूषित पानी के इस्तेमाल से देश में हर साल दो लाख लोगों की मौत हो जाती है।

यूनिसेफ के मुहैया कराए गए विवरण के अनुसार भारत में दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर जिस तरह पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं, उससे लगता है कि 2030 तक भारत के बीस से ज्यादा महानगरों को पानी अन्य शहरों से लाकर उपलब्ध कराना होगा। लातूर, हैदराबाद और शिमला के लिए ऐसा पहले करना भी पड़ा है।

कुछ साल पहले दुनिया के 500 बड़े शहरों को लेकर हुए अध्ययन में सामने आया कि हर चार में से एक नगरपालिका पानी की कमी की समस्या से जूझ रही है। सावन में बरसते मेघ के बीच प्रकृति का जो धुला-खिला रूप हम देख रहे हैं, वह कहीं न कहीं हमें महात्मा गांधी की उस सीख की याद दिलाता है कि प्रकृति के पास हर की जरूरत के लिए सब कुछ भरपूर है। पर प्रकृति का आंचल छोटा पड़ जाएगा एक भी आदमी के लालच के सामने।

अपने प्रिय आराध्य शिव को जलाभिषेक कराकर तृप्त होने वाला लोक समाज हमेशा से पानी को कीमती मानते आया है। जल संरक्षण की जितनी विधियां लोकज्ञान और परंपरा के पास है, उतना आधुनिक विज्ञान के पास नहीं। साफ है कि सावनी घटा से बरसती बूंदों-फुहारों को ‘रस बुनिया’ कहने वाली सावनी लोक संस्कृति हमारी कई आधुनिक मुश्किलों का भी हल है।

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