पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा में एक बार फिर मतदाताओं को सांप्रदायिक आधार पर बंटते हुए दिख रहे हैं, लेकिन इस बार इसकी भाषा अलग है। 2021 के विधानसभा चुनाव में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की आशंका से मतदाताओं में तीखे मतभेद उभरकर सामने आए थे। इस बार विशेष गहन संशोधन (एआइआर) के इर्द गिर्द मौजूदा राजनीतिक घूम रही है। इसके साथ ही ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ और ‘घुसपैठ’ जैसे पुराने मुद्दों पर भी कुछ जगहों पर चर्चा है।

पश्चिम बंगाल, एक ऐसा राज्य है जहां 2011 की जनगणना के अनुसार 27 फीसद से अधिक मुस्लिम आबादी है। ऐसे में बंगाल के मुस्लिम-बहुल जिले एक बार फिर चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। जानकारों का कहना है कि 2021 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें तो यह शायद दशकों में सांप्रदायिक आधार पर प्रदेश का सर्वाधिक ध्रुवीकृत चुनाव माना जा सकता है।

पिछले बंगाल चुनाव का पैर्टन

इस तरह के ध्रुवीकरण को तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में निर्णायक भूमिका के तौर पर अहम माना गया था। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूम, दक्षिण 24 परगना, नदिया, हावड़ा, उत्तर 24 परगना और कूचबिहार समेत प्रदेश के नौ जिलों में मुस्लिमों की आबादी 25 फीसद से अधिक है। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 160 में से 127 सीटें जीतीं, जो करीब 80 फीसद की सफलता दर है। भाजपा को 32 सीट मिली थी, जिनमें करीब 50 फीसद सीट कूचबिहार और नदिया जिले की थीं। इसके उलट, 25 फीसद से कम मुस्लिम आबादी वाले 14 अन्य जिलों में तृणमूल का प्रदर्शन अपेक्षाकृत सफलता दर की थी, हालांकि सत्तारूढ़ दल ने भाजपा से अच्छी बढ़त बनाए रखी।

इन जिलों में तृणमूल ने 134 में से 86 विधानसभा सीट (64 फीसद) पर जीत हासिल की थी जबकि भाजपा को 47 सीटें मिलीं। इनमें बर्धमान, पश्चिम बर्धमान, कोलकाता, हुगली, पूर्व मेदिनीपुर, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, बांकुरा, पुरुलिया, दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और दक्षिण दिनाजपुर शामिल हैं।

ममता की रणनीति

तृणमूल कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं, बंगाली क्षेत्रीयतावाद और उम्मीदवारों के चयन में रणनीतिक सूझबूझ की बदौलत एक पिछले चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की। पार्टी ने 2021 के चुनावों में 294 में से 213 सीट पर जीत दर्ज की थी, जिसमें कुल 48 फीसद मत मिले थे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी एक महिला-केंद्रित राजनीतिक छवि बरकरार रखते हुए ‘कन्याश्री’ और ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं को तवज्जो देते हुए अपेक्षाकृत ज्यादा संख्या में महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा।

इन वजहों से तृणमूल कांग्रेस को सभी समुदायों की महिला मतदाताओं को अपने पक्ष में एकजुट करने में मदद की। इससे पहले 2016 और 2021 के चुनावों की तुलना से पता चलता है कि तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या 54 से घटाकर करीब 45 कर दी। खास तौर पर उन निर्वाचन क्षेत्रों में जहां भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनावों में मजबूत प्रदर्शन किया था।

इस बार फिर टीएमसी अपने प्रदर्शन को दोहराने के लिए फेसबुक पर भी काफी पैसा खर्च कर रही है। विज्ञापनों के जरिए सियासी माहौल बनाया जा रहा है। जनसत्ता की इस पड़ताल को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें