तिहाड़ जेल में ‘कैदी नंबर 2265’ थी ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया की पहचान, जानें ये किस्सा

देश में इंदिरा सरकार ने जब इमरजेंसी लगाई थी, तब ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया को गिरफ्तार करके दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा गया था।

Vijaya Raje Scindia
विजयाराजे सिंधिया को कैदी नंबर 2265 दिया गया और जेल में राजमाता की पहचान केवल कैदी नंबर 2265 रह गई। (फोटो सोर्स- Express Archive)

1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देशभर में आपातकाल लगाए जाने की घोषणा की थी। भारत में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक 21 महीने का आपातकाल लगा था। यह भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे विवादित काल था क्योंकि आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे। उस वक्त इंदिरा गांधी ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले हर व्यक्ति को जेल में बंद करवा दिया था। ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी उन्हीं लोगों में शामिल थीं, जिन्हें जेल में बंद कर दिया गया था। विजयाराजे को दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैद किया गया था। सरकार की तरफ से ये कहा गया था कि उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया है।

विजयाराजे सिंधिया को इस बात का पहले से ही डर था कि कहीं इंदिरा सरकार उन्हें तिहाड़ जेल में रख सकती है। और हुआ भी ऐसा ही। सिंधिया को 3 सितंबर 1975 को इसी जेल में ले जाया गया। जेल में उनकी पहचान केवल कैदी नंबर 2265 रह गई थी। ग्वालियर की महारानी रह चुकीं विजयाराजे सिंधिया जब दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैदी थीं तब वहीं उनकी मुलाकात जयपुर की राजमाता गायत्री देवी हुई।

तिहाड़ एक नरक है: विजयाराजे सिंधिया इस बात को समझ गईं थीं कि तिहाड़ एक नरक है और उन्हें इसे भोगना ही होगा। हालात ये थे कि हर सुख-सुविधा के साथ जीने वाली विजयाराजे और गायत्री देवी को एक ही शौचालय इस्तेमाल करना पड़ता था। वहां की हालत ये थी कि शौचालय में पानी का नल नहीं था और नाम मात्र की सफाई भी दो दिन में एक बार होती थी।

इतने कठिन माहौल में भी राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने हिम्मत नहीं हारी और वह इस बात से खुद को हौसला देती रहीं, कि बाकी महिलाओं को तो जेल में ये सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। जेल की बाकी महिलाओं को शौचालय के इस्तेमाल के लिए लाइन लगानी पड़ती थी। जेल की कुछ महिलाओं और बच्चों को तो खुले में शौच करना पड़ता था।

जिन राजमाता विजयाराजे सिंधिया के पास बाहर की दुनिया में इतना बड़ा साम्राज्य था, उनके पास जेल के अंदर केवल 2 कुर्सियां, एक खटिया और बिजली के बल्ब में गुजारा करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था।

इस किस्से का जिक्र ‘राजपथ से लोकपथ पर’ नाम की किताब में है। ये किताब राजमाता विजयाराजे सिंधिया की ऑटोबायोग्राफी है और इस किताब का संपादन मृदुला सिन्हा ने किया है।

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