करप्शन केस में इलाहाबाद HC के रिटायर जज पर चलेगा मुकदमा, CBI की अपील को केंद्र ने दी मंजूरी

आरोप है कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को केंद्र ने मई 2017 में मानदंड पूरे न करने की वजह से छात्रों को दाखिला देने से रोक दिया था। जस्टिस शुक्ला पर आरोप है कि उन्होंने कॉलेज को फायदा पहुंचाया।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर जज श्रीनारायण शुक्ला। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

यूपी के एक निजी मेडिकल कॉलेज की तरफदारी कर संस्थान के हक में फैसला देने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर जज श्रीनारायण शुक्ला पर सीबीआई का शिकंजा कस गया है। अब उन पर कोर्ट में मुकदमा चलेगा। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने गुरुवार शाम को इस आशय की मंजूरी प्रदान कर दी। सीबीआई का कहना है कि जज के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है। जल्दी ही चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की जाएगी।

आरोप है कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को केंद्र ने मई 2017 में मानदंड पूरे न करने की वजह से छात्रों को दाखिला देने से रोक दिया था। जस्टिस शुक्ला पर आरोप है कि उन्होंने कॉलेज को फायदा पहुंचाया। 2017-18 बैच के छात्रों के प्रवेश की डेडलाइन गलत तरीके से बढ़ाई जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मौजूदा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। सीबीआई जांच में उन्हें कथित तौर पर अनियमितता और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज को अनुचित फायदा पहुंचाने का दोषी पाया गया था।

जस्टिस शुक्ला पर केस दर्ज करने के लिए सीबीआई ने सीजेआई को एक चिट्ठी लिखी थी। एजेंसी ने अपनी चिट्ठी में बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा की सलाह पर उसने जस्टिस शुक्ला के खिलाफ एक जांच बिठाई थी। एजेंसी के मुताबिक, जस्टिस शुक्ला की अनियमितताओं का मामला तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा के संज्ञान में लाया गया था। ये चिट्ठी मिलने के बाद मौजूदा सीजेआई रंजन गोगोई ने सीबीआई को जस्टिस शुक्ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी थी। जस्टिस गोगोई ने जनवरी, 2018 से ही उनकी न्यायिक सेवाओं पर रोक लगाने का आदेश दिया था।

गोगोई ने पीएम नरेंद्र मोदी से ये सिफारिश भी की थी कि जस्टिस शुक्ला को उनके पद से हटा दिया जाए। हालांकि, पहले भी ऐसी घटनाएं हुईं हैं जब जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और सरकारों को उन्हें महाभियोग के जरिए हटाने की सिफारिशें की गईं लेकिन किसी जज को हटाया नहीं गया। दरअसल, भारत में जुलाई, 1991 तक सुप्रीम और हाईकोर्ट के जजों पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं थी। लेकिन इसके बाद 25 जुलाई, 1991 को सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के एक मामले की सुनवाई के दौरान एक ऐतिहासिक फैसले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भी केस दर्ज करने का आदेश दिया था।

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