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उत्तराखंड: 1857 नहीं 1822 में लड़ी गई आजादी की पहली लड़ाई!

उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी कुंजा बहादुरपुर के शहीद स्मारक का दौरा किया था और शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी। शहीद स्मारिका में रखी पुस्तिका में उपराष्ट्रपति ने लिखा है कि कुंजा बहादुरपुर गांव के वीर योद्धाओं ने आजादी की लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति दी थी। अब तक आजादी के असली इतिहास को छिपाने का काम किया गया। जरूरत है कि नई पीढ़ी तक इतिहास की सही-सही जानकारी पहुंचे।

आजादी के संघर्ष में कई जवानों ने वीरता से मुकाबला किया था।

आजादी के आंदोलन की सबसे पहली क्रांति 1822 में हरिद्वार जिले के रुड़की तहसील के गांव कुंजा बहादुरपुर में हुई थी। अब तक माना जाता रहा है कि आजादी के आंदोलन की पहली चिंगारी 1857 में फूटी थी। सहारनपुर गजट के अनुसार इतिहास के पन्नों पर उत्तराखंड के रुड़की के कुंजा बहादुरपुर गांव का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा है। सहारनपुर गजट से लेकर नीदरलैंड के पुस्तकालयों तक में रखी इतिहास की पुस्तकों में कुंजा बहादुरपुर गांव में तीन अक्तूबर 1822 को हुई क्रांति दर्ज है।

सहारनपुर गजट के मुताबिक 19वीं सदी के दूसरे दशक के बाद कुंजा बहादुरपुर में आजादी की लड़ाई की चिंगारी सुलगने लगी थी और 1822 में सबसे पहली आजादी की लड़ाई शहीदों की इस वीरभूमि से ही शुरू हुई थी। अंग्रेज शासकों के अत्याचार जब हिंदुस्तानियों पर ज्यादा ही होने लगे तो स्थानीय लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। जिस पर अंग्रेज शासक नाराज हो गए और अंग्रेज सेना ने क्षेत्र के ग्रामीणों पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए। जुल्मों की इंतहा इतनी हो गई कि स्थानीय ग्रामीणों ने क्षेत्र के वीर गुर्जर राजा विजय सिंह के नेतृत्व में क्रांति का बिगुल बजा दिया।

कुंजा बहादुरपुर के लोगों ने अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए करौंदी गांव के पास से अंग्रेज सेना के हथियार लूट लिए और अंग्रेजों को चुनौती दे डाली। इस संघर्ष में अंग्रेजी फौज के कई सैनिक मारे गए। कुंजा गांव के लोगों की इस वीरता से परेशान होकर फिरंगियों की फौज ने 3 अक्तूबर 1822 को क्रांतिकारियों के गांव कुंजा बहादुरपुर को चारों ओर से घेर लिया। अंग्रेज हुक्मरानों ने गांव में क्रांतिकारियों के खिलाफ मुनादी पिटवा दी कि जो गांव वाला हथियार डालकर अंग्रेजों के शरण में आ जाए, उसे माफ कर देंगे लेकिन गांव में जमा क्रांतिकारियों ने ऐसा करने से मना कर दिया और राजा विजय सिंह के नेतृत्व में सेनापति कल्याण सिंह और उपसेनापति भूरा ने फिरंगी फौज के खिलाफ युद्ध का मोर्चा संभाल लिया और अंग्रेजों को ललकार कर कहा कि हमें समझौता नहीं, आजादी चाहिए।

इस पर आगबबूला फिरंगी फौज ने गांव को चारों तरफ से घेर कर हमला कर दिया और अंग्रेज फौज ने जमकर खूून खराबा किया। अंग्रेज फौज से लड़ते हुए गांव के कई वीर योद्धा शहीद हो गए। अंग्रेजी सेना का मुकाबला करते हुए जो 44 वीर योद्धा बचे थे, उनको बांधकर अंग्रेज फौज ने रुड़की के सुनहरा स्थित एक बरगद के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया था। तभी से 3 अक्तूबर को कुंजा गांव में बलिदान दिवस मनाया जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गांव के 152 लोग शहीद हुए थे।

स्थानीय निवासी विजय पाल सिंह ने बताया कि नीदरलैंड से इतिहास के एक प्रोफेसर जिनका नाम डॉक्टर डीएचए कॉफ था, वह गांव में आए और तीन-चार दिन तक गांव में ही रुके और उन्होंने शहीद स्मारक और गांव के अन्य स्थानों का भ्रमण किया और अध्ययन किया। एक पुस्तक में उन्होंने कुंजा बहादुरपुर के लोगों की वीरता का जिक्र करते हुए अंग्रेजों के खिलाफ इसे पहली क्रांति का नाम दिया। नीदरलैंड के एक पुस्तकालय में यह दस्तावेज सुरक्षित रखे हैं। इसमें कुंजा बहादुरपुर से ही अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहली क्रांति का जिक्र है।

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