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‘नवोदय’ भारत की रूमानी दास्तान

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद पर फैसला आ चुका है जिसके ताले राजीव के समय में खुले थे। ‘द लोटस ईयर्स’ न तो कोई नीरस राजनीतिक दस्तावेज है और न ही कोई गल्प कथा। राजनीतिक पत्रकारिता के जरिए एक ऐसे नेता की दास्तान है जो अपने जीवन व्यवहार के कारण इस राजनीतिक यात्रा को रूमानी बना देता है।

Author Published on: February 14, 2020 2:26 AM
पत्रकार, रचनाकार व राजनीतिक स्तंभकार अश्विनी भटनागर की हैचिट इंडिया से प्रकाशित किताब ‘द लोटस ईयर्स पॉलिटिकल लाइफ इन इंडिया इन द टाइम ऑफ राजीव गांधी’ आज के समय में और प्रासंगिक हो जाती है जब कांग्रेस के 70 साल सवालों के घेरे में है।

रोहित कुमार
भारत में 1980 से 1990 तक राजनीतिक रूप से राजीव गांधी का युग रहा। मजबूरी में राजनीति में कदम रखे एक नेता ने नए बनते भारत को इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करने के लिए सपनों की उड़ान दे दी। ‘जवाहर नवोदय विद्यालय’ ने हर तबके के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दरवाजे खोले, टेलीफोन के जरिए संचार क्रांति हुई और अखिल भारतीय स्तर पर एक ऐसा नेता उभरा जो नई भाषा में बात कर रहा था। यह भाषा थी सौहार्द की, विकास की और आगे बढ़ने की भावना की। पत्रकारों के लिए वेतन बोर्ड की स्थापना हो गई। और यह सब किया महज तीन साल के अंदर। पत्रकार, रचनाकार व राजनीतिक स्तंभकार अश्विनी भटनागर की हैचिट इंडिया से प्रकाशित किताब ‘द लोटस ईयर्स पॉलिटिकल लाइफ इन इंडिया इन द टाइम ऑफ राजीव गांधी’ आज के समय में और प्रासंगिक हो जाती है जब कांग्रेस के 70 साल सवालों के घेरे में है।

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद पर फैसला आ चुका है जिसके ताले राजीव के समय में खुले थे। ‘द लोटस ईयर्स’ न तो कोई नीरस राजनीतिक दस्तावेज है और न ही कोई गल्प कथा। राजनीतिक पत्रकारिता के जरिए एक ऐसे नेता की दास्तान है जो अपने जीवन व्यवहार के कारण इस राजनीतिक यात्रा को रूमानी बना देता है। भटनागर 1980 से 1990 तक टाइम्स ऑफ इंडिया के लखनऊ संस्करण में राजनीतिक संवाददाता थे। किताब की शुरुआत राजीव गांधी से साक्षात्कार के साथ होती है जिसमें ‘मम्मी से पूछिए’ का पंच पाठकों के सामने उस व्यक्ति की प्यारी सी तस्वीर रख देता है।

इस किताब में पाठकों के सामने ऐसा नायक आता है जो नियति की क्रूरता का शिकार होता है। अपनी मां-बीवी-बच्चों से प्यार करने वाले, साधारण पारिवारिक जिंदगी जीने की इच्छा रखने वाले राजीव। जीवन संगिनी सोनिया नहीं चाहती थीं कि पति राजनीति में जाए। तभी छोटे भाई की मौत के बाद मां के सपनों को पूरा करने के लिए अपने सपने को छोड़ दिया। और जब राजनीति में आए तो उसे एक युग का ही नाम मिल गया। एक दशक का समय वैसा समय रहा जिसमें राजीव गांधी अनिच्छा से राजनीति में आए और जब वो राजनीति को भाए तो उन्हें अनिच्छा से इसे छोड़ना पड़ा। उनकी हत्या कर दी गई।

परिवार सबसे पहले वाले मध्य वर्ग के बहुमत वाले भारत में राजीव गांधी और सोनिया गांधी की प्रेम कथा भी इस नेता को अलग बनाती है। भारतीय बच्चों की एक पूरी पीढ़ी को राहुल और प्रियंका का नाम मिला और इस जोड़े को प्रेम के आदर्श के रूप में देखा गया। राजीव गांधी की मौत के बाद और प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के पहले सोनिया गांधी एक विदेशी नहीं बल्कि परिकथा की नायिका के तौर पर देखी जा रही थीं।

राजीव-सोनिया की प्रेम कथा के समांतर देश में अमिताभ और रेखा की प्रेमकथा को भी देखा गया था। राजीव और अमिताभ एक-दूसरे के दोस्त थे। इस किताब में अमिताभ बच्चन के अलावा अरुण नेहरू, प्रणब मुखर्जी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, कमलापति त्रिपाठी, एआर अंतुले, वीर बहादुर सिंह, चंद्रशेखर, देवी लाल, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, चरण सिंह, एचएन बहुगुणा जैसी समकालीन शख्सियतों का भी जिक्र है।

आज के समय में सबसे अहम सवाल है कि कांग्रेस नेता की जीवनी कमल के नाम पर क्यों? इसका जवाब कई मंचों पर देते हुए अश्विनी भटनागर कहते हैं कि पहली बात की राजीव नाम का अर्थ कमल होता है और उनका नाम उनकी नानी कमला नेहरू के नाम पर रखा गया था। वैसे, पहले उनका नाम राहुल रखा जाना था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू इस नाम के खिलाफ थे क्योंकि यह बुद्ध के पुत्र का नाम था जिसे तथागत ने हमेशा बोझ की तरह देखा था। यह अश्विनी भटनागर की बारहवीं किताब है। इसके पहले वे नारायणमूर्ति, पुरुषोत्तम लाल गुप्ता, मीना कुमारी की भी जीवनी लिख चुके हैं।

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