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दिल्ली में 15 साल राज करने वाली कांग्रेस के वोट खिसके, झाड़ू और कमल को मिला हाथ का साथ

2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 52 फीसद मतों के साथ दिल्ली की कुल 70 विधानसभा सीटों में 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि इस चुनाव में उसका वोट 52 से बढ़कर करीब 53.6 फीसद हो गया लेकिन उसकी सीटें 67 सीटों से घटकर 62 पर आ गईं। दूसरी ओर भाजपा के वोट भी बढ़े और उसकी कुछ सीटें भी बढ़ीं।

आम आदमी पार्टी ने एक नारा दिया था-दिल्ली में तो केजरीवाल। इसका आशय यह था कि दिल्ली वालों ने लोकसभा के चुनाव में भले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना हो लेकिन विधानसभा के चुनाव में तो एक ही विकल्प केजरीवाल हैं।

अजय पांडेय
दिल्ली वालों ने जिस प्रकार लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर वोट बरसाए थे, विधानसभा चुनाव में मतों की ठीक वैसी ही बरसात मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए की। संसदीय चुनाव में 56 फीसद वोट हासिल कर भाजपा ने सभी सात सीटें जीत ली थीं, उसी प्रकार विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की अगुआई में आप ने 53.6 फीसद वोट हासिल कर 62 सीटों पर जीत दर्ज कर दो तिहाई से भी अधिक का बहुमत हासिल किया।

दिलचस्प यह है कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव में मतों के लिहाज से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ है। पार्टी को 2015 के चुनाव में करीब नौ फीसद वोट मिले थे जबकि 2020 के ताजा नतीजों के अनुसार यह आंकड़ा घटकर चार फीसद पर सिमट गया। दिल्ली में लगातार 15 साल हुकूमत करने वाली इस पार्टी की दुर्दशा का सबसे ज्यादा लाभ भाजपा मिला। उसके मतों में करीब छह फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है जबकि आम आदमी पार्टी को भी पिछले विधानसभा चुनाव की अपेक्षा इस बार करीब डेढ़ फीसद वोट ज्यादा मिले हैं।

2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 52 फीसद मतों के साथ दिल्ली की कुल 70 विधानसभा सीटों में 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि इस चुनाव में उसका वोट 52 से बढ़कर करीब 53.6 फीसद हो गया लेकिन उसकी सीटें 67 सीटों से घटकर 62 पर आ गईं। दूसरी ओर भाजपा के वोट भी बढ़े और उसकी कुछ सीटें भी बढ़ीं। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को 32 फीसद वोट मिले थे और कुल तीन सीटें मिली थीं। इस बार उसको 38.5 फीसद वोट मिले हैं और आठ सीटों पर उसे जीत मिली है। कांग्रेस के 67 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।

लोकसभा के चुनाव में दिल्ली में भाजपा को 56 फीसद मत मिले थे और पार्टी ने सूबे की सभी सात लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की जबकि कांग्रेस को करीब 22 फीसद वोट मिले और वह दूसरे नंबर की पार्टी बनी। सबसे दिलचस्प आंकड़ा आम आदमी पार्टी का है। संसदीय चुनाव में पार्टी को महज 18 फीसद वोट मिले थे और उसे तीसरे नंबर पर संतोष करना पड़ा। सीट जाहिर तौर पर न कांग्रेस को कोई मिली और नही आप को। लेकिन विधानसभा चुनाव में केजरीवाल को ठीक वैसा ही समर्थन मिला है जैसा लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी को मिला था।

आम आदमी पार्टी ने एक नारा दिया था-दिल्ली में तो केजरीवाल। इसका आशय यह था कि दिल्ली वालों ने लोकसभा के चुनाव में भले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना हो लेकिन विधानसभा के चुनाव में तो एक ही विकल्प केजरीवाल हैं। जानकारों का कहना है कि जिस प्रकार का आक्रामक चुनाव प्रचार भाजपा की ओर से किया गया, उससे ध्रुचीकरण उल्टा हो गया।

अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में आम आदमी पार्टी के पक्ष में एकतरफा मत पड़े और अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी लोगों ने एकजुट होकर झाडृू चुनाव निशान के सामने वाला बटन दबाकर आप को बंपर जीत दिला दी। कांग्रेस को लेकर कहा जा रहा है कि पार्टी पहले दिन से ही चुनाव में दिखाई नहीं दे रही थी। उसके मतदाताओं को लगा कि उसके पक्ष में मतदान करना वोट खराब करना है लिहाजा, कुछ ने भाजपा के पक्ष में तो कुछ ने आप के पक्ष में वोट डाल दिए। इसीलिए भाजपा व आप दोनों के वोट बढ़े। यह अलग बात है कि भाजपा वोट बढ़ाने के बावजूद ज्यादा सीटें नहीं जीत पाई।

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