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भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की अधजली लाश छोड़ भागे थे अंग्रेज, कहने के बावजूद नहीं थी गोली से उड़ाने की हिम्मत

दिल्ली असेंबली में बम धमाके के बाद पर्चे उछाले गए थे, उस पर लिखा था कि बहरों को सुनने के लिए जोरदार धमाके की जरूरत होती है।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की अधजली लाश छोड़ भागे थे अंग्रेज, कहने के बावजूद नहीं थी गोली से उड़ाने की हिम्मत
शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव (Photo Credit – Indian Express)

भगत सिंह को फांसी लाहौर सेंट्रल जेल में हुई थी और उसके पहले उनकी गिरफ्तारी लाहौर से 400 किलोमीटर दूर दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में हुई थी। 93 साल पहले यहां ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ और ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ पर चर्चा हो रही थी। ट्रेड डिस्प्यूट बिल पहले ही पास हो चुका था, जिसके तहत मजदूरों की हड़तालों पर पाबंदी लगा दी गई। वहीं पब्लिक सेफ्टी बिल के जरिए ब्रिटिश हुकूमत संदिग्धों पर बिना मुकदमा चलाए हिरासत में रख सकती थी।

भगत और और बटुकेश्वर दत्त 8 अप्रैल 1929 की सुबह 11 बजे असेंबली में पहुंचे और करीब 12 बजे सदन की खाली जगह पर दो बम धमाके हुए भगत। भगत सिंह ने एक के बाद एक कई फायर भी किए। दिल्ली असेंबली में बम धमाके के बाद पर्चे उछाले गए थे, उस पर लिखा था कि बहरों को सुनने के लिए जोरदार धमाके की जरूरत होती है। भगत सिंह और बटुकेश्वर ने गिरफ्तारी दे दी, जो पहले से तय थी।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने लालजी की हत्या का बदला लेने की कसम खाई थी और जेम्स ए स्कॉट की हत्या का प्लान बनाया था। 17 दिसंबर 1928 (असेम्बली ब्लास्ट के पहले) को तीनों प्लान के तहत लाहौर के पुलिस हेडक्वार्टर के बाहर पहुंच गए। हालांकि स्कॉट की जगह असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस जॉन पी सांडर्स बाहर आ गया। भगत और राजगुरु को लगा कि यही स्कॉट है और उन्होंने मार दिया।

10 जुलाई 1929 को सांडर्स हत्या केस की सुनवाई शुरू हुई और भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव समेत 14 लोगों को मुख्य अभियुक्त बनाया गया। 7 अक्टूबर 1929 को इस केस में भगत, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई थी। 24 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दी जानी थी लेकिन उन्हें एक दिन पहले 23 मार्च को ही फांसी दी गई

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार फांसी वाले दिन जेल के बाहर भीड़ इकठ्ठा हो रही थी। इससे अंग्रेज डर गए और जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई। उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अंदर लाया गया और अपमानजनक तरीके से उन तीनों शहीदों के शवों (भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु) को अपमानजनक तरीके से उसपर रखा गया।

रावी के तट पर अंतिम संस्कार किया जाना था,लेकिन पानी कम होने की वजह से शवों को जलाने का फैसला लिया गया। लोगों को भनक लग गई और वे वहां पहुंच गए। ये देखकर अंग्रेज अधजली लाशें छोड़कर भाग गए। तीनों के सम्मान में तीन मील लंबा शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरू हुआ। इस दौरान पुरुषों ने विरोध में अपनी बाहों पर काली पट्टियां बांध रखी थीं और महिलाओं ने काली साड़ियां पहन रखी थीं।

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