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देश के भीतर ही सीमा विवाद: कैसे रुके राज्यों के बीच तकरार

असम और मिजोरम ही नहीं, देश में कुल 17 राज्य अपने पड़ोसियों से सीमा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

Inter state
(बाएं) संजय हजारिका, प्रोफेसर, जामिया मिलिया इस्लामिया, एमजी देवसहायम, पूर्व नौकरशाह । फाइल फोटो।
असम और मिजोरम ही नहीं, देश में कुल 17 राज्य अपने पड़ोसियों से सीमा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। न सिर्फ पूर्वोत्तर, बल्कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और ओड़ीशा जैसे राज्य भी अपने पड़ोसियों से सीमा को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच बेलगाम को लेकर विवाद तो हर साल सुर्खियों में आता है।

उत्तर प्रदेश और बिहार का जमीन विवाद भी अक्सर हिंसक संघर्ष में बदलता है। असम और मिजोरम की सीमा पर जिस दिन हिंसक झड़प हुई, उसके ठीक बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक सवाल के जवाब में लोकसभा को बताया कि देश में सात ऐसे मामले हैं, जहां पर सीमांकन और जमीन पर अलग-अलग दावों की वजह से प्रदेशों में विवाद है। केंद्र के अनुसार सीमाओं को लेकर जिन राज्यों में विवाद है, वे हैं- हरियाणा-हिमाचल प्रदेश, केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख-हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र-कर्नाटक, असम-अरुणाचल प्रदेश, असम-नगालैंड, असम-मेघालय और असम-मिजोरम। कई और राज्यों में भाषा और जल बंटवारे को लेकर भी विवाद है।

क्या है ‘इनर लाइन एग्रीमेंट’

असम और मिजोरम का सीमा विवाद 100 साल से ज्यादा पुराना है। विवाद 819.15 वर्ग किलोमीटर के जंगल को लेकर है। असम के जंगलों पर मिजोरम दावा करता है। ब्रिटिश राज में 1875 में इनर लाइन एग्रीमेंट से सीमा तय हुई थी। 1933 में अंग्रेजों ने इसे बदला। अब 1875 का करार मानें या 1933 का- इसको लेकर विवाद है। असम से अलग होकर मिजोरम 1972 में केंद्रशासित प्रदेश और 1987 में राज्य बना। दोनों राज्यों की सीमा 164.6 किमी लंबी है।

मौजूदा सीमा नॉर्थ-ईस्टर्न एरिया (रीआॅर्गेनाइजेशन) एक्ट 1971 के तहत तय हुई थी। पर मिजोरम इसे नहीं मानता, क्योंकि इसे 1933 के नोटिफिकेशन के आधार पर तय किया है। मिजोरम कहता है कि ब्रिटिश इंडिया ने 1875 में इनर लाइन नोटिफिकेशन के तहत जो बॉर्डर तय की थी, उसे मान्यता दी जाए। असम का कहना है कि 1875 का इनर लाइन नोटिफिकेशन सिर्फ प्रशासनिक उद्देश्य से था, उसे कछार (असम) और लुशाई हिल्स (मिजोरम) की सीमा नहीं माना जा सकता। इस विवाद को लेकर 1994, 2006, 2018, 2020 और 2021 में हिंसा हो चुकी है।

असम व सीमावर्ती अन्य राज्य

नगालैंड की सीमा 434 किलोमीटर लंबी है। नगालैंड 10 संरक्षित वन क्षेत्र की 12,488 वर्ग किलोमीटर जमीन पर दावा करता है। इसे 1963 में असम से निकालकर अलग राज्य बनाया गया। तब से ही असम के गोलाघाट और जोरहाट जिलों व नगालैंड के वोखा और मोकोकचुंग जिलों के इलाकों पर विवाद है। 1968, 1979, 1985 और 2014 में हिंसा हो चुकी है। सीमा विवाद को लेकर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरू की है। असम-अरुणाचल में दोनों के इलाकों में हो रहा अतिक्रमण। असम के 1,000 वर्ग किमी मैदानी क्षेत्र पर अरुणाचल प्रदेश दावा करता है। असम-मेघालय में 2,765 वर्ग किमी क्षेत्र को लेकर 1969 से विवाद चला आ रहा है। मेघालय असम रीआॅर्गेनाइजेशन (मेघालय) एक्ट 1969 को स्वीकार नहीं करता। सीमा पर विवाद कायम है। सरकारें और लोग एक-दूसरे के क्षेत्र में कब्जे कर रहे हैं।

कर्नाटक-महाराष्ट्र में भाषा का मामला

कर्नाटक के 814 गांवों के 7,000 वर्ग किमी क्षेत्र में मराठीभाषी रहते हैं। महाराष्ट्र इस हिस्से को अपने राज्य में मिलाना चाहता है। कर्नाटक के बेलागवी (बेलगाम), उत्तर कन्नड़ा, बीदर और गुलबर्गा जिलों के 814 गांवों में मराठीभाषी परिवार रहते हैं। बेलागवी, कारवार और निप्पानी शहरों में भी मराठी बोलने वालों की संख्या अधिक है। राज्यों के विलय अधिनियम-1956 के तहत बेलगाम और उसकी 10 तालुका को मैसूर स्टेट (1973 में कर्नाटक नाम मिला) में शामिल किया गया।

उत्तरप्रदेश का बिहार-हरियाणा से विवाद

गंगा की बदलती धारा को लेकर 62 हजार एकड़ जमीन का विवाद चला आ रहा है। 100 साल पुराना यह विवाद उत्तर प्रदेश के बलिया और बिहार के शाहबाद (अब भोजपुर और रोहतास जिले) में है। वर्ष 1959 में राज्य सरकारों ने केंद्र से मध्यस्थता के लिए कहा था। संसद ने एक सिफारिश के आधार पर 1970 में बिहार से 135 गांव और 50 हजार एकड़ जमीन यूपी को और यूपी के 12 हजार एकड़ जमीन के साथ 39 गांव बिहार को हस्तांतरित करने की सलाह दी थी। 1977 के बाद से यूपी ने जमीन के दस्तावेज हस्तांतरित नहीं किए। बिहार ने तो उत्तरप्रदेश से आई जमीन को मान्यता दे दी, पर यूपी ने सीमा पर बिहारी किसानों के अधिकार को स्वीकार नहीं किया। उत्तरप्रदेश का सीमा विवाद हरियाणा से भी है। यहां भी नदियों के रास्ता बदलने पर विवाद होता है।

कुछ और विवाद

हिमाचल-लद्दाख : हिमाचल प्रदेश शिमला हिल स्टेट्स और पंजाब हिल स्टेट्स से बना था। लद्दाख में शामिल सारचु को लेकर विवाद है।
ओड़ीशा-आंध्र: सीमाई इलाके में 63 गांवों में तेलुगू बोलने वाले लोग रहते हैं। आंध्रप्रदेश इस पर अपना दावा करता रहा है।
ओड़ीशा-झारखंड : सेरायकेला और खरसावां की पूर्व रियासतों के अधिकार क्षेत्रों को लेकर विवाद है। झारखंड के इन क्षेत्रों में ओड़ीया बोली जाती है।
ओड़ीशा-बंगाल : ओड़ीशा के बालासोर और मयूरभंज जिलों के कुछ गांवों में बंगाली आबादी रहती है। इस पर बंगाल दावा करता है।
कर्नाटक-केरल : विवाद केरल के कासरगोड को लेकर है। यहां कन्नड़ बोलने वाले अधिक हैं। फिर भी इसे केरल में रखा गया है। महाजन आयोग ने इसे कर्नाटक में शामिल करने की सिफारिश की थी।

क्या कहते हैं जानकार

पूर्वोत्तर में ऐसी जमीन हैं, जो सरकारी आदेश या नक्शे में चिह्नित नहीं हैं। पारंपरिक जोत हैं, उनके पारंपरिक चिह्नों पर अंकित हैं। इससे मामला उलझ जाता है। पूर्वोत्तर में कुछ समुदायों में संपत्ति रखने की शक्ति उनके मुखिया या एक व्यक्ति के पास होती है। सरकार की व्यवस्था और कबायली परंपराओं के बीच से रास्ता तलाशना होगा।
– संजय हजारिका, प्रोफेसर, जामिया मिलिया इस्लामिया

अंतरराज्यीय विवादों को केवल संबंधित राज्य सरकारों के सहयोग से ही हल किया जा सकता है और केंद्र सरकार विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए केवल एक ‘फैसिलिटेटर’ यानी मददगार के रूप में कार्य करती है। स्थानीय लोगों को समस्या के समाधान में शामिल करना होगा। समाधान केवल केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर नहीं हो सकता।
– एमजी देवसहायम, पूर्व नौकरशाह

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