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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: किसानों के साथ बातचीत में जमीनी स्तर पर सुधार नहीं

केंद्र सरकार के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 11 जनवरी को सुनवाई करेगा।

Author नई दिल्‍ली | January 7, 2021 9:45 AM
farmerअपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते किसान। फाइल फोटो।

वकील मनोहर लाल शर्मा की तरफ से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बुधवार को मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे की अध्यक्षता वाले एक पीठ ने यह आदेश दिया। शर्मा ने समवर्ती सूची में प्रविष्टि संख्या 33 को शामिल किए जाने की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है।

कृषि साधारण तौर पर राज्य का विषय है। केंद्र ने तीनों कृषि कानून इसी प्रविष्टि 33 के माध्यम से लागू किए हैं। जजों ने कहा कि वे भी सरकार और किसानों के बीच बातचीत को प्रोत्साहन देने के पक्ष में हैं। पीठ ने कहा कि अटार्नी जनरल अगर कहेंगे कि बातचीत जारी है तो हम सोमवार को भी सुनवाई स्थगित कर देंगे पर अभी तक स्थिति में कोई सुधार नहीं दिखा है। पीठ ने शर्मा की याचिका पर प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर दिए।

केंद्र की तरफ से अदालत में मौजूद अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल से जजों ने कहा कि संविधान (तीसरे संशोधन) कानून 1954 की सातवीं अनुसूची में 33वीं प्रविष्टि को शर्मा ने चुनौती दी है। इस पर सोमवार को सुनवाई की जाएगी। कृषि कानूनों को चुनौती देने वाली बाकी सभी याचिकाओं पर भी उसके साथ ही सुनवाई होगी। इस पर वेणुगोपाल ने जानकारी दी कि किसानों से सरकार की वार्ता जारी है और समझौता होने के आसार हैं।

जजों ने कहा कि वे भी बातचीत को प्रोत्साहन देने के पक्ष में हैं। अटार्नी जनरल अगर कहेंगे कि बातचीत जारी है तो हम सोमवार को भी सुनवाई स्थगित कर देंगे। पर अभी तक स्थिति में कोई सुधार नहीं दिखा है। इस पर महान्यायवादी तुषार मेहता बोले कि सरकार का जवाब तैयार है पर क्योंकि एक स्वस्थ वार्तालाप चल रहा है इसीलिए जवाब अभी तक दाखिल नहीं किया गया है। शर्मा का कहना था कि प्रविष्टि 33 को संविधान में 1954 में शामिल किया गया था पर अभी तक उसका अनुमोदन तबके 19 में से 8-9 राज्यों ने ही किया है। इस प्रविष्टि के जरिए केंद्र ने कृषि को समवर्ती सूची में शामिल किया था।

किसान संगठन इन कृषि कानूनों के खिलाफ लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। वे इन तीनों कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हैं। सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर आश्वासन तो जरूर दे रही है पर इसे कानूनी स्वरूप देने को तैयार नहीं हुई है। तीन विवादास्पद कृषि कानून संसद ने पिछले साल 24 सितंबर को पारित किए थे। शर्मा का कहना है कि तीनों कृषि कानून संविधान के अनुच्छेद 246 के विरूद्ध हैं। ये लोगों के मौलिक अधिकारों का भी हनन हैं।

किसानों ने प्रदर्शन तेज करने की चेतावनी दी

भीषण सर्दी, बारिश के बावजूद केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले करीब 40 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों ने अपना प्रदर्शन तेज करने की धमकी दी है। सरकार और किसान संगठनों के बीच सोमवार को हुई सातवें दौर की वार्ता भी बेनतीजा रही थी। दोनों के बीच अब अगली बातचीत आठ जनवरी को होगी।

किसानों ने कहा कि वे आने वाले दिनों में अपने आंदोलन को तेज करेंगे। किसान विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी की अपनी मांग को लेकर दिल्ली से लगी सीमाओं पर 28 नवम्बर से डटे हैं।

किसान संगठनों के प्रतिनिधि इन कानूनों को पूरी तरह निरस्त करने की अपनी मांग पर अड़े रहे जबकि सरकार कानूनों की ‘खामियों’ वाले बिंदुओं या उनके अन्य विकल्पों पर चर्चा करना चाह रही थी। दोनों के बीच अब अगली बातचीत आठ जनवरी को होगी।

किसानों ने कहा कि वे आने वाले दिनों में अपने आंदोलन को तेज करेंगे। किसान विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी की अपनी मांग को लेकर दिल्ली से लगी सीमाओं पर 28 नवम्बर से डटे हैं।

सुप्रीम कोर्ट जाएंगे कैप्टन अमरिंदर सिंह

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बुधवार को एक बार फिर केंद्र सरकार से कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि ये तीनों कानून किसान विरोधी हैं। हम इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। इसका समाधान प्रधानमंत्री के स्तर पर ढूंढ़ना होगा।

प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों व गृह मंत्री के साथ बैठक कर समाधान खोजना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों को विरोध करने का पूरा अधिकार है। किसानों के साथ मेरी 101 फीसद सहानुभूति है। उन्होंने कहा कि देश का पूरा किसान समुदाय मांग कर रहा है और सरकार गैर-जिम्मेदार है।

देश के लोगों को जवाब देना सरकार का कर्तव्य है। किसानों ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि कानूनों को निरस्त करना पड़ेगा। कैप्टन ने कहा कि कोई ऐसा कानून नहीं है जिसे छुआ नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि संविधान को 1950 में पेश करने के बाद 100 संशोधन हो चुके हैं। ऐसा क्या है कि इन कृषि कानूनों में संशोधन नहीं किया जा सकता है। केंद्र को इन कानूनों को वापस ही लेना होगा।

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