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यादें: छोटी सी बात पर शुरू हुई थी 1965 की लड़ाई

इस युद्ध में भारतीय सेना लाहौर के बिल्कुल पास पहुंच गई और पाकिस्तान के गरूर को चकनाचूर कर दिया था। तीन महीने पहले जो साख जमा की थी, भारत के जांबाजों ने सूद समेत वापस ले ली थी। भारतीय फौज ने इतना नुकसान पहुंचाया था कि उबरने में पाकिस्तान को कई दशक लगे।

1965 में पाकिस्तान के अचानक हमला बोल देने पर भारत के बहादुर सैनिकों ने मुंहतोड़ जवाब दिया था

अजय श्रीवास्तव

उन दिनों पड़ोसी देश पाकिस्तान में राष्ट्रपति थे, जनरल अयूब खां। उनका भारत दौरा तय हो गया था। इसी दरम्यान प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया और उन्होंने भारत दौरा रद्द कर दिया। अयूब खां लाल बहादुर शास्त्री को नापसंद करते थे। जब ये बात शास्त्री को पता लगी तो उन्होंने बेहद परिपक्व और सधे हुए शब्दों में अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि आप मत आइए, हम आ जाएंगे। वे अपनी बात रखते हुए काहिरा से एक दिवसीय दौरे पर पाकिस्तान गए और वहां द्विपक्षीय संबंधों पर खूब चर्चा की, मगर वो फौजी जनरल अयूब खां को प्रभावित नहीं कर पाए।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खां और उनके सहयोगियों को लगा कि अभी भारत का शीर्ष नेतृत्व कमजोर है और यही वह समय है जब भारत की जमीन पर कब्जा किया जा सकता है। पाकिस्तान ने अपना पहला लक्ष्य बनाया गुजरात के कच्छ जिले के बियाबान इलाके को। पाकिस्तान ने अपनी सरहद में सड़क बनानी शुरू की, जो बहुत सी जगहों पर भारतीय सीमा के अंदर बन रही थी। उन दिनों भारत या पाकिस्तान के लिए रेगिस्तानी और दुर्गम इलाकों में सड़क निर्माण बेहद चुनौतीपूर्ण काम था। भारत के लिए कच्छ का यह बंजर इलाका महत्त्वहीन जरूर था मगर पाकिस्तान के लिए सामरिक दृष्टि से अहम।

भारत ने कूटनीतिक स्तर पर इस मामले को उठाया। पाकिस्तान का कहना था कि यह उसका इलाका है। दरअसल, सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान डींग और सुराई के बीच सड़क निर्माण कर बेहद मजबूत हो जाना चाहता था। भारतीय सुरक्षाबलों ने कई बार काम रोक दिया था जिससे पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खां बेहद चिढ़े हुए थे और उन्होंने अपनी फौज के 51वीं ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर अजहर अली से कहा दिया कि हर हाल में सड़क बने।

पाकिस्तान के आक्रामक तेवर को देखते हुए भारत ने भी कच्छ में अपनी सामरिक तैयारी को पुख्ता किया। भारतीय फौज ने भी कंजरकोट के पास सरदार चौकी, जंगल और शालीमार चौकी बना ली जिससे पाकिस्तान और चिढ़ गया। तब पाकिस्तान के बददिमाग मेजर जनरल टिक्का खां ने 51वीं ब्रिगेड के कमांडर अजहर अली को यह आदेश दिया कि वे सरदार चौकी पर हमला कर कर दें।

अप्रैल के शुरुआती दिनों में भारतीय चौकियों पर पाकिस्तानी फौज ने हमला बोला। जब भारतीय सैनिकों के पास गोला बारूद खत्म होने लगा तो वे चुपचाप अपनी चौकी छोड़कर विजियोचौक चौकी पर चले आए। इसके बाद पाकिस्तानी फौज अपने बैरक में लौट आई। उसे यह पता भी नहीं चला कि सरदार चौकी पर तैनात भारतीय सैनिक वहां सेदूसरी चौकी पर आ गए हैं।

खैर शाम होते होते भारतीय कमांडर बड़ी संख्या में अपने सैनिकों को लेकर सरदार चौकी पर पुन: कब्जा करने के लिए गए तो उन्होंने देखा कि वहां कोई पाकिस्तानी सैनिक नहीं है। इस तरह भारतीय फौज ने फिर से हारी बाजी को जीत लिया और सरदार चौकी पर पुन: कब्जा जमा लिया।

स्थिति की गंभीरता देखते हुए भारत ने कच्छ में बडी संख्या में फौज भेजी। लेफ्टिनेंट कर्नल सुंदर जी ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी और उसमें सिफारिश की गई थी कि भारत को तत्काल कंजरकोट पर हमला करना चाहिए। यद्यपि अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले भारतीय शीर्ष नेतृत्व ने लेफ्टिनेंट कर्नल सुंदरजी की बात को नहीं माना। युद्ध के प्रति भारत की ठंडी प्रतिक्रिया को देखकर पाकिस्तान और आक्रामक हो गया और उसने 24 अप्रैल,1965 को सेराबेत पर कब्जा कर लिया। इस आंशिक युद्ध को रोकने के लिए ब्रिटेन ने मध्यस्थता की और दोनों पक्ष युद्धविराम को तैयार हो गए।

दोनों देशों में युद्धविराम के तीन महीने बाद पाकिस्तान एकबार फिर कश्मीर हड़पने की योजना बनाने लगा। उसने एक आॅपरेशन चलाया जिसका नाम ‘आपरेशन जिब्राल्टर’ रखा गया। इस आॅपरेशन के तहत पाकिस्तानी फौजी चरवाहों के रूप में संपूर्ण कश्मीर घाटी में फैल गए और उन्होंने स्थानीय लोगों से दोस्ती कर ली। कश्मीरी ये नहीं जानते थे कि ये पाकिस्तानी हैं और बदनियती से उनके यहां घुस आए हैं।

थोडे ही दिनों में यह बात भारतीय फौज को पता लग गई और फिर शुरू हुआ पाकिस्तानी फौजियों का सफाया। हर तरफ पाकिस्तानी फौजी मारे जा रहे थे या खदेड़े जा रहे थे। अयूब खां और उनके विश्वस्त जुल्फिकार अली भुट्टो जो आॅपरेशन जिब्राल्टर के जनक थे, उन्हें लगा था कि भारत का कमजोर नेतृत्व कभी अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन कर उनके देश में नहीं घुसेगा मगर इस बार बात अलग थी।

26 सितंबर,1965 को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ऐतिहासिक रामलीला मैदान पर हजारों लोगों को संबोधित करते हुए व्यंग्य से कहा कि सदर अयूब ने एलान किया था कि वे दिल्ली तक चहलकदमी करते हुए पहुंच जाएंगे। वे इतने बड़े आदमी हैं और मैंनै सोचा कि उनको दिल्ली तक पैदल चलने की तकलीफ क्यों दी जाए। हम ही लाहौर की तरफ बढ़कर उनका इस्तकबाल करें।

इस युद्ध में भारतीय सेना लाहौर के बिल्कुल पास पहुंच गई और पाकिस्तान के गरूर को चकनाचूर कर दिया था। तीन महीने पहले जो साख जमा की थी, भारत के जांबाजों ने सूद समेत वापस ले ली थी। भारतीय फौज ने इतना नुकसान पहुंचाया था कि उबरने में पाकिस्तान को कई दशक लगे। अयूब खां इस भ्रम में रह गए कि भारत चीन से 1962 की हार और नेहरू की मौत से बेहद कमजोर हो चुका होगा। अयूब खां जब तक जिंदा रहे उन्हें आपरेशन जिब्राल्टर की करारी हार सालती रही।

एक बार एक विदेशी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान आया और बातों ही बातों में आपरेशन जिब्राल्टर का जिक्र शुरू हो गया। अयूब खां ने झल्लाते हुए कहा कि इस बाबत आप जुल्फिकार अली भुट्टो से बात करिए, वे ही सही जवाब देंगे।

सांवले और नाटे कद के लालबहादुर शास्त्री ने फौजी जनरल अयूब खां को ये बता दिया था कि अब भारत 1962 के चीन से पराजय और नेहरू की मौत से बहुत आगे निकल चुका है। 1965 की विजय ने लाल बहादुर शास्त्री को वह मुकाम दिया, जिसके वे असली हकदार थे।

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