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आतंक के रखवाले

कासिम खान उर्फ उस्मान खान उर्फ मुहम्मद नवेद खान। नाम कुछ भी हो। कोई फर्क नहीं। यह सच अपनी जगह कायम है कि उधमपुर के जीजा-साले की जांबाजी से पकड़ा गया..

पाकिस्तानी आतंकी नवेद (पीटीआई फोटो)

कासिम खान उर्फ उस्मान खान उर्फ मुहम्मद नवेद खान। नाम कुछ भी हो। कोई फर्क नहीं। यह सच अपनी जगह कायम है कि उधमपुर के जीजा-साले की जांबाजी से पकड़ा गया यह आतंकवादी पाकिस्तान की जमीन से अवैध तौर पर सीमा पार करके भारत आया। उसका खतरनाक कबूलनामा देखिए, ‘मजा लेने के लिए हिंदुओं की हत्या करने आया था’। यह सब किसी जांच का नतीजा नहीं बल्कि कसाब के बाद पहली बार जिंदा काबू आए इस उग्रवादी की मुंहजुबानी है। वह भी मौका-ए-वारदात से। इसके बाद पड़ोसी मुल्क को यह साबित करने के लिए और क्या चाहिए कि देश में, खास तौर पर कश्मीर में कौन है, जो दहशत और खूनखराबा फैलाना चाहता है।

सरहद पार से यह ऐसी पहली नापाक कोशिश नहीं है। फर्क इतना ही है कि यह बेनकाब हो गई। इस बात पर तो गंभीर इख्तेलाफ हो सकते हैं कि हमला करने वाले कौन थे? किसी आतंकवादी गुट से जुड़े थे? लेकिन इस पर तो अब शायद ही कोई मतभेद हो कि उनकी आतंकी ‘शिक्षा-दीक्षा’ पाकिस्तान में ही हो रही है। कसाब के पकड़े जाने और फांसी के तख्ते तक उसके हश्र के बाद तक भी कभी पाकिस्तान ने उससे अपना नाता कुबूल नहीं किया। हैरत नहीं कि इसी कारण पाकिस्तान ने 26/11 के मुंबई हमलों पर किस-किस बहाने से अपनी भूमिका को नकारा।

हमारे देश से 26/11 के हमलावरों की सजा और जांच के लिए जो आवाज उठी, उसे पाकिस्तान दरगुजर करता रहा है। यहां तक कि इस हौलनाक घटना के मुजरिमों को भी पनाह और शह देता रहा, जो इस मुल्क में अपने सुविधाजनक ठिकानों पर रह रहे हैं। उन्हें भारत के हवाले करने की पुकार पर पाकिस्तान ने कभी कान नहीं धरे। इस घटना पर भारत ने जितने भी सबूत मुहैया कराए , उन्हें भी नकार दिया गया। लेकिन हाल में पाकिस्तान की अपनी ही संघीय जांच एजंसी (एफआइए) के पूर्व महानिदेशक तारिक खोसा के खुलासे के बाद पाकिस्तान क्या कहेगा?

पड़ोसी देश में उठी आवाज और इल्जाम पर बयान बिल्कुल उचित है। लेकिन अपनी ही मिट्टी से जुड़ी आवाज को ही अगर नजरअंदाज किया जाएगा तो उसे हेठी ही कहा जाएगा। पाकिस्तान को ऐसे दुराग्रह और पक्षपात से ऊपर उठकर देखना होगा। खोसा की टिप्पणी (रिपोर्ट) का निष्कर्ष ही यह है कि पाकिस्तान को मुंबई हमलों पर उठे विवाद को हल करना ही होगा क्योंकि इसमें तो कोई शुबह ही नहीं कि इसकी साजिश पाकिस्तान की धरती पर रची गई। इस निष्कर्ष का मजबूत आधार अजमल कसाब ही माना जाएगा जिसका पाकिस्तान से रिश्ता निर्विवाद था। इस कड़ी में दूसरा नाम मुहम्मद नवेद का जुड़ा है।

हालांकि पाकिस्तान से इस पर कोई ईमानदार स्वीकृति सहज ही नहीं मिलने वाली। उलटे पाक हुकूमत नवेद को अपनानागरिक मानने से इनकार कर, भारत को आरोप लगाने में संयम बरतने की सलाह दे चुकी है। अब तक पाकिस्तान सभी ठोस सबूतों को नजरअंदाज करके देश के सभी मुजरिमों की पनाहगाह बना हुआ है। किसे इस बात में संदेह है कि दाऊद इब्राहीम या टाइगर मेमन की शरणस्थली पाकिस्तान ही है? किसे इस बात में संदेह है कि देश की आतंकी घटनाओं में कानून को उनकी जरूरत है? कौन नहीं चाहता कि मुंबई हमलों या दूसरी आतंकवादी घटनाओं के मुजरिमों को सजा मिले? पूरे विश्व ने इस बात की तस्दीक की है कि पाकिस्तानी धरती पर ही आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं।

इन सब सवालों का जवाब एक ही है कि सिर्फ पाकिस्तानी हुकूमत को इस सबसे इनकार है। और अगर ठीक से कहा जाए तो प्रत्यक्षत: इनकार है। इतनी बड़ी सरकार अपनी धरती पर चल रहे इस साजिशी कारोबार से बेखबर होगी? लेकिन आतंकवाद का जहर अब और मुल्कों में भी फैलता जा रहा है और इल्जाम भरी अंगुली पाकिस्तान की तरफ ही है। और विश्व भर में यह भी पता है कि इस मामले में पाकिस्तान से मदद की उम्मीद ज्यादा नहीं। वरना, अमेरिका को खुद यह निश्चित न करना पड़ता कि तालिबान सरगना उसामा बिन लादेन हर हालत में अपने किए की सजा पाए। यह अभियान पाकिस्तान के सहयोग से कभी संभव न हो पाता, इसलिए सीमा अतिक्रमण करके लादेन को मौत के घाट उतारा गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर रूस के उफा में दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच हुई बैठक से आपसी बदलाव की जो उम्मीद बनी, उसे पटरी से उतारने के लिए अलगाववादी-आतंकवादी हर हद तक चले जाएंगे। और वे गए भी। पहले गुरदासपुर और अब जम्मू-कश्मीर में हुई वारदात इस बात का सबूत है कि यही ताकतें एक बार फिर से सक्रिय हैं और उन्हें कुचला न गया तो दोनों देशों में आपसी सहयोग की उम्मीद की जो लौ जली है, वह पहले ही बुझ जाएगी।

हालांकि सीमा पार से आतंक के जो शोले भड़काए जाते हैं, उनकी आंच में भारत ही तपता है। इसके बावजूद देश की ओर से मोदी ने हाथ बढ़ाया। अब मौका है पाकिस्तान के पास इसका सकारात्मक जवाब देने का। हालांकि बातचीत के अगले ही दिन पाक से जो विवादी सुर उठे, उन पर किसी को भी सहज ही एतराज होगा। शांति के चाहवानों पर इसका अभी कोई असर नहीं और दोनों देशों के बीच में तय की गई बैठक बदस्तूर निर्धारित है। लेकिन ऐसी घटनाओं से इसका हश्र क्या होगा?

पाकिस्तान से जो दरकार है वह बस इतना है कि हुकूमत इस सब पर फैसला जम्हूरियत के दायरे में ही करे। लेकिन वहां की व्यवस्था पर सेना और उसकी खुफिया एजंसी आइएसआइ का दबदबा ज्यादा है। सरकार को अब इस दबाव से बाहर आकर शांति की राह पकड़नी होगी। आखिर आतंक की मार से पाकिस्तान भी तो अछूता नहीं है। वे हाथ जो यहां गोलियां चलाते हैं, पाकिस्तान में भी आतंक की मुखालफत करने वाली मलाला यूसुफजई के सिर में गोलियां उतार देते हैं। वही नापाक हाथ आर्मी पब्लिक स्कूल के निरीह बच्चों को जिबह कर देते हैं। जाहिर है, न तो आतंक और न आतंकवादी का कोई धर्म होता है। उनका तो बस एक ही मकसद होता है-दहशत फैलाना।

उफा में बैठक के बाद अब तक हुर्इं दर्जन भर घटनाएं इस बात का मुंह बोलती सबूत हैं। मगर पाकिस्तान ही शायद एक ऐसा देश होगा जो सारे सबूतों के बाद भी आतंकियों को अपना नागरिक मानने से इनकार कर दे। फिर चाहे वह कसाब हो या अब नवेद। ये दोनों अपने मुंह से खुद के बारे में जो बोले वह गलत। लेकिन जो आधिकारिक रुख सरकार ले, वह सही। इससे बड़ी हठधर्मिता आखिर क्या होगी।

यह सबको याद होगा कि कैसे अजमल कसाब को अपना नागरिक कुबूल करने की कीमत पाकिस्तान के तब के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार महमूद अली दुर्रानी को अपनी कुर्सी गंवाकर चुकानी पड़ी थी। लेकिन क्या हुकूमतें अड़ियलपन से चल सकती हैं? क्या सच को झूठ करने से उपमहाद्वीप में शांति हो सकती है? यह त्रासदी ही है कि खुद भी आतंक की आग में झुलस रहे पाकिस्तान को अपनी गलती मानना गवारा नहीं। वरना कानून का कोई भगोड़ा, चाहे वह टाइगर मेमन हो, दाऊद इब्राहीम हो, इकबाल मिर्ची हो या फिर जकी-उर-रहमान लखवी, कानून की पहुंच से दूर न होते।

बहरहाल अब इस बात की भी तस्दीक हो चुकी है कि हाल में पकड़े गए नवेद का उद्देश्य भारतीय जनमानस की आस्था की प्रतीक अमरनाथ यात्रा पर हमला करना था। जिस लश्करे-तैयबा से इस आतंकीके तार जुड़े थे, उसने पिछले दो दशक में कई बार इस यात्रा पर हमले की धमकी जारी की। नब्बे के दशक में ऐसे प्रयास भी किए गए। यह एक भयानक साजिश का हिस्सा है क्योंकि इसका मकसद हिंदू-मुसलिम दंगे भड़काना है। आतंकवादी संगठनों की तमाम कोशिशों के बाद भी दोनों समुदायों में कोई अस्थाई अलगाव तो दिख सकता है, लेकिन यह अलगाव कभी एक सीमा से आगे नहीं गया।

अजमल कसाब की तरह नवेद के पिता भी उसे कुबूल कर चुके हैं और उसने यह भी मान लिया है कि उसे लश्करे-तैयबा के प्रशिक्षण शिविरों में हमले के लिए तैयार किया गया। नवेद के इकबालनामे से यह भी जाहिर है कि आतंकवादी चाहे किसी भी मुल्क में हों उन्हें मानसिक तौर पर पंगु बनाकर ही उनका इस्तेमाल किया जाता है। नवेद का यह बयान कि ‘कोई सेलरी नहीं मिलती’ सीमा पर आतंकवादियों की आर्थिक स्थिति को भी बेनकाब करती है। मुद्दा यह भी है कि पाकिस्तानी हुकूमत क्यों अपनी युवा पीढ़ी को आतंक के सरगनाओं के शोषण का शिकार होने दे रही है? शायद एक डरी हुई हुकूमत की अपाहिज सफाई उसकी मजबूरी बयान करने के लिए काफी है।

जब दहली थी मुंबई
12 मार्च 1993 को एक के बाद एक हुए 12 बम धमाकों ने मुंबई को दहलाया, जिसमें 257 लोग मारे गए और 713 अन्य जख्मी हुए। देश पर हुए अब तक के इस भीषणतम आतंकवादी हमले के कई षड्यंत्रकारियों और साजिशकर्ताओं में शामिल अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहीम, उसका बेहद करीबी छोटा शकील और याकूब मेमन का बड़ा भाई टाइगर मेमन अभी तक फरार हैं और समझा जाता है कि ये सभी पाकिस्तान में पनाह लिए हुए हैं। मामले में हथियार रखने और आरोपियों की मदद करने के जुर्म में अभिनेता संजय दत्त (आरोपी संख्या-117) पुणे के येरवडा जेल में छह साल की सजा काट रहे हैं। धमाकों के एक दोषी याकूब रज्जाक मेमन को 30 जुलाई को फांसी दे दी गई।

खुद दहला पाकिस्तान
16 दिसंबर 2014 को पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा की राजधानी पेशावर के आर्मी स्कूल पर तालिबानी आतंकियों ने हमला बोल दिया और 132 बच्चों समेत 141 लोगों की हत्या कर दी। इस हमले में बच्चों समेत डेढ़ सौ से ज्यादा लोग जख्मी हुए। वारसाक रोड स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल हुआ हमला पाकिस्तान के इतिहास का सबसे निर्मम आतंकवादी हमला था, जिसकी अंतरराष्टÑीय स्तर पर निंदा हुई। इसके बाद ‘अच्छे और बुरे आतकंवाद’ को लेकर पाक पूरी दुनिया के निशाने पर आया और पाक सरकार को आतंकवादियों के खिलाफ कड़ फैसले लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।

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