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दलित श्रद्धालु को कंधे पर बिठा कर मंदिर में ले गया पुजारी, सनातन धर्म की पेश की मिसाल

इस उत्सव में चिलकुर बालाजी मंदिर के मुख्य पुजारी सीएस रंगराजन भी शामिल थे। रंगराजन ने इस मौके पर कहा कि इसे एक वैष्णव आचार्य भगवद रामानुज की शिक्षाओं के उत्सव के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने एक गैर-भेदभावपूर्ण और समतावादी समाज के लिए संघर्ष किया।

दलित व्यक्ति को कंधे पर उठाकर मंदिर में ले जाते पुजारी। (Photo: vsktelangana.org)

तेलंगाना में सोमवार को समाजिक समता और समरसता की एक मिसाल देखने को मिली। यहां एक पुजारी ने दलित व्यक्ति को कंधे पर उठाया और उन्हें मंदिर के अंदर ले गए। यह वाक्या तेलंगाना के खम्मम स्थित रंगनायकुला गुट्टा का है। खम्मम में ऐतिहासिक श्री लक्ष्मी रंगनाथ स्वामी मंदिर (रंगनायकुला गुट्टा) में समाजिक समरसता वेदिका, नरसिंह वाहिनी और अन्य संगठनों के साथ मंदिर संरक्षण आंदोलन (टीपीएम) का आयोजन किया गया।

इस मौके पर कुछ ही दूरी पर स्थित गांधी प्रतिमा को माल्यार्पण करने के बाद सड़क के दोनों ओर सैकड़ों की संख्या में मौजूद महिलाओं ने नादस्वरम और कोल्लम के साथ एक बड़ी शोभा यात्रा निकाली। भद्राचलम नरसिंह स्वामी मंदिर के एक अर्चक (पुजारी) कृष्ण चैतन्य ने श्रद्धेय तिरुप्पनलवार की वेशभूषा धारण किए दलित समुदाय से आने वाले रवि को अपने कंधे पर उठा लिया और उन्हें मंदिर में ले गए।

इस उत्सव में चिलकुर बालाजी मंदिर के मुख्य पुजारी सीएस रंगराजन भी शामिल थे। रंगराजन ने इस मौके पर कहा कि इसे एक वैष्णव आचार्य भगवद रामानुज की शिक्षाओं के उत्सव के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने एक गैर-भेदभावपूर्ण और समतावादी समाज के लिए संघर्ष किया। रंगराजन ने कहा, “सनातन धर्म में ईश्वर के बाद सभी को एक समान माना जाता है। तथाकथित भेदभाव केवल हाल के दिनों में ही शुरू हुआ है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम दुनिया में अलग-अलग लोगों के बीच आने वाले भेदभावों को खत्म करें।”

दो साल पहले मुख्य पुजारी ने भी दलित व्यक्ति को कंधे पर बिठाकर मंदिर पहुंचाया था
तेलंगाना में होने वाली मुनि वाहन सेवा तमिलनाडु में 2700 साल से चले आ रहे समारोह का ही एक रूप है। यह समारोह मुख्य रूप से वैष्णव मंदिर में होते हैं और इनमें सनातन धर्म के रीति-रिवाज माने जाते हैं। चिलकुर बालाजी मंदिर के मुख्य पुजारी सीएस रंगराजन ने ही सबसे पहले अप्रैल 2018 में दलित युवक आदित्य परासरी को कंधे पर बिठाकर जियागुड़ा स्थित रंगनाथ स्वामी मंदिर के अंदर पहुंचाया था।

अपने अनुभवों पर मीडिया से बातचीत के दौरान रंगराजन ने कहा कि उन्होंने आदित्य परासरी को मंदिर ले जाते वक्त पवित्र तिरुप्पनलवर का रूप मान लिया था। उन्होंने कहा कि यह खुशी की बात है कि मेरा वह कदम श्री वैष्णव सावंत भागवत रामानुज के प्रकट होने के शताब्दी वर्ष के साथ ही था, जिन्होंने एक जाति रहित और बराबरी वाले समाज की कल्पना की थी।

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