Telangana DGP in Naxal Area: तेलंगाना के डीजीपी सीवी आनंद सोमवार को कार्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर पहुंचे। पिछले पांच दशकों में यह पहला मौका था, जब किसी पुलिस महानिदेशक ने प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के गढ़ रहे इस क्षेत्र में अपना कदम रखा है।
कार्रेगुटा का यह इलाका कभी माओवादियों से प्रभावित था और यहां संगठन की केंद्रीय समिति के कई प्रमुख नेता रहा करते थे। डीजीपी सीवी आनंद ने घोषणा की कि इस इलाके को जल्द ही एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा।
आम लोगों की सुविधाओं में होगा इजाफा
डीजीपी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जंगल में जाने के लिए जो रास्ता बनाया गया है, वह अभी कच्चा है। इस रास्ते को जल्द ही पक्का (डामर की सड़क) किया जाएगा, जिससे आम लोग बिना किसी बाधा के यहाँ आसानी से आवाजाही कर सकेंगे।
डीजीपी आनंद ने स्पष्ट किया कि कार्रेगुट्टा में पर्यटन के विकास से उन आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को भी मदद मिलेगी जो अब तक समाज की मुख्यधारा में पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाए हैं।
मुख्यधारा में लाने के प्रयास
उन्होंने बताया कि मुख्यधारा में लौटने वाले माओवादियों को नया जीवन शुरू करने के लिए एकमुश्त अनुदान राशि दी जाती है और उनके सिर पर घोषित इनामी राशि भी उन्हीं को प्रदान की जाती है। इस विशेष दौरे के दौरान डीजीपी के साथ पुलिस और राजस्व विभाग के अधिकारियों का एक बड़ा दल मौजूद था।
इस पुरानी याद को ताजा करते हुए डीजीपी ने कहा कि इतना बड़ा प्रतिनिधिमंडल यहाँ यह संदेश देने आया है कि अब कार्रेगुट्टा का दौरा करना पूरी तरह सुरक्षित है। अतीत में यहाँ केवल ग्रेहाउंड्स और कोबरा जैसी विशेष सैन्य टुकड़ियां ही आती थीं, जो अपने माओवादी विरोधी अभियानों के तुरंत बाद लौट जाती थीं।
ऑपरेशन कागार और माओवादियों का सरेंडर
डीजीपी ने जानकारी दी कि तेलंगाना पुलिस विभाग ने ‘ऑपरेशन कागार’ में व्यापक स्तर पर सहयोग किया है। इस अभियान के तहत अकेले तेलंगाना राज्य में लगभग 700 माओवादियों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया है।
मुख्यधारा में लौटने की अपील
वर्ष 1991 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी सीवी आनंद ने बताया कि अब केवल दो से तीन शीर्ष माओवादी ही फरार हैं। इनमें सबसे प्रमुख नाम मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति का है। डीजीपी ने उनसे सार्वजनिक रूप से अपील की कि वे आत्मसमर्पण करें और समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर एक नए जीवन की शुरुआत करें।
माओवादी संगठन में विभाजन और आंतरिक बिखराव
मुप्पला लक्ष्मण राव प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के पूर्व महासचिव और सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले नेता रहे हैं। उनके बाद नंबला केशव राव उर्फ बसावराजू ने संगठन की कमान संभाली थी। बासावराजू के निधन के बाद माओवादी पार्टी दो गुटों में बंट गई, एक गुट का नेतृत्व मल्लो जुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू और दूसरे का नेतृत्व थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी कर रहे थे।
दोनों के बीच संगठन के भविष्य को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गए थे। इसके बाद सोनू और उनके कई साथियों ने महाराष्ट्र में, जबकि देवजी और अन्य सदस्यों ने तेलंगाना में आत्मसमर्पण कर दिया।
कार्रेगुट्टा में फहराया गया राष्ट्रीय ध्वज
डीजीपी के इस ऐतिहासिक दौरे के अंत में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने कार्रेगुट्टा में तिरंगा फहराया। केंद्र सरकार द्वारा देश को नक्सल मुक्त बनाने के लिए ‘ऑपरेशन कागार’ शुरू किया गया था, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं और संगठन का शीर्ष नेतृत्व अब लगभग समाप्त हो चुका है।
यह भी पढ़ें: अभिषेक बनर्जी का ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ अब सवालों के घेरे में, सेबाश्रय पर FIR से बढ़ी मुश्किल
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी के बहुचर्चित ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ पर सवाल उठने लगे हैं। उनके लोकसभा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई ‘सेबाश्रय’ पहल कभी जनसंपर्क और जनकल्याण के मॉडल के तौर पर पेश की गई थी। अब यही योजना स्वास्थ्य शिविरों में कथित अनियमितताओं, इलाज में लापरवाही और मेडिकल उपकरणों के कथित अनधिकृत इस्तेमाल को लेकर पुलिस शिकायतों और एफआईआर के घेरे में है। पढ़िए पूरी खबर…
