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तीज-त्योहार: बंगाल, ओड़ीशा और असम में काली पूजा का महत्व

बंगाल में कार्तिक अमावस्या की आधी रात को मां काली की पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां काली की विधिवत आराधना हमारे शरीर की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक और ऊर्जा के स्तरों को संतुलित कर देती हैं। यही पांच ऊर्जाएं अगर संतुलित न हों तो मनुष्य के जीवन में उथल-पुथल मचा देती हैं। लेकिन क्या सिर्फ पूजा से ही ये ऊर्जाएं नियंत्रित हो सकती हैं? उत्तर है- नहीं। इसके लिए साधना की विशेष पद्धतियां बताई गई हैं, जिसका सार्वजनिक उल्लेख वर्जित माना गया है।

मां काली की विधिवत आराधना हमारे शरीर की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक और ऊर्जा के स्तरों को संतुलित कर देती हैं।

विनय बिहारी सिंह

यह तो आप जानते ही हैं कि बंगाल, ओड़ीशा और असम में शक्ति पूजा को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। लेकिन अनेक लोग यह नहीं जानते कि ऐसा क्यों होता है। जब पूरा देश दीपावली मना रहा होता है तो बंगाली परिवारों में बहुत ही श्रद्धा से मां काली की पूजा अर्चना की जाती है। कोलकाता में तो मिली-जुली संस्कृति है और पूरी जनसंख्या के 35 फीसद लोग हिंदीभाषी हैं। इसलिए यहां दीपावली भी धूमधाम से मनाई जाती है।

हम सभी जानते हैं कि राक्षसों के संहार के बाद भी मां काली का क्रोध शांत नहीं हुआ था। मां काली को शांत करने के लिए अनंत भगवान के स्वरूप और मां काली के पति- भगवान शिव उनके सामने लेट गए। ज्योंही मां काली का पैर भगवान शिव के सीने पर पड़ा, उन्हें मालूम हो गया कि पैर साधारण जगह नहीं पड़ा है। उन्हें अपनी गलती महसूस हो गई और उन्होंने पश्चाताप में अपनी जीभ बाहर निकाल कर दांतों से हल्के से दबाया। उसी क्षण मां काली ने ब्रह्मांड के समस्त जीवों को अभयदान किया।

बंगाल में प्राचीन काल से शक्तिपूजा होती रही है। मध्यकालीन युग में बंगाल से लेकर यूरोप तक में अनेक स्थलों पर काला जादू (ब्लैक मैजिक) के प्रभाव के उल्लेख मिले हैं। उस समय मां काली के सच्चे भक्तों ने काला जादू के प्रभाव को नकार कर कालीपूजा के महत्व को स्थापित किया। आज बंगाल काला जादू के लिए नहीं, कला और साहित्य के लिए जाना जाता है। आज भी तंत्र साधना के लिए तारापीठ विख्यात है। लेकिन तंत्र साधक सरेआम नहीं पहचान में आते। वे आधी रात को गुप्त रूप से तंत्र साधना करते हैं।

माना जाता है कि मां काली का रूप जितना भयावह है, वे उतनी ही कृपालु और करुणामयी हैं। जो भक्त उनकी पूजा-आराधना करते हैं, उनका कोई अनिष्ट नहीं होता। कोई भी नकारात्मक ऊर्जा मां काली के भक्तों से दूर ही रहती है। मां की पूजा करने वाले राहु या केतु के किसी भी कष्टकारी प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं। किसी भी बाधा-विपत्ति से दूर रहते हैं।

बंगाल में कार्तिक अमावस्या की आधी रात को मां काली की पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां काली की विधिवत आराधना हमारे शरीर की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक और ऊर्जा के स्तरों को संतुलित कर देती हैं। यही पांच ऊर्जाएं अगर संतुलित न हों तो मनुष्य के जीवन में उथल-पुथल मचा देती हैं। लेकिन क्या सिर्फ पूजा से ही ये ऊर्जाएं नियंत्रित हो सकती हैं? उत्तर है- नहीं। इसके लिए साधना की विशेष पद्धतियां बताई गई हैं, जिसका सार्वजनिक उल्लेख वर्जित माना गया है।

तांत्रिक साधकों का कहना है कि कुछ मंत्रों के जाप से भी ये ऊर्जाएं संतुलित होती हैं। कहा गया है कि कालीपूजा करने वाले व्यक्ति का मन, हृदय और आचरण शुद्ध होना चाहिए। शुद्ध कपड़े पहन कर, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मां काली की आराधना करने वाले को अवश्य लाभ मिलता है। आराधना के समय (कौल तंत्र साधकों को छोड़ कर) किसी को भी मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।

मां काली के बारे में एक बात सभी कहते हैं। किसी भी गृहस्थ यानी घर-परिवार वाले को उग्र काली की मूर्ति या फोटो घर में नहीं रखनी चाहिए। हमेशा शांत भाव वाली मां काली का फोटो या मूर्ति रखनी चाहिए। एक बात और कोशिश होनी चाहिए कि घर में मां काली का फोटो ही रहे, मूर्ति नहीं। क्योंकि मूर्ति की स्थापना के साथ कई नियम भी जुड़ जाते हैं। माता की कैसी छवि है? माता के बाएं दो हाथों में से एक में खड्ग और दूसरे में मनुष्य का कटा हुआ सिर है। खड्ग क्या करता है, सभी जानते हैं। कटा हुआ सिर अहंकार का प्रतीक है।

जब तक अहंकार नहीं जाएगा, मनुष्य ईश्वर (यहां मां काली) की भक्ति में लीन नहीं हो पाएगा। तो माता पहले अपने भक्त का ज्ञान रूपी तलवार से अहंकार काट देती हैं। दाएं के दो हाथों में एक अभय दान दे रहा है, दूसरा वरदान दे रहा है। अभय दान यानी मां काली के भक्तों को डरने की आवश्यकता नहीं है। यदि वे सात्विक कार्य और चिंतन करते रहेंगे तो मां उनकी रक्षा करती रहेंगी।

कई लोग प्रश्न करते हैं कि सच्चा भक्त माने क्या? साधकों का कहना है कि सच्चा भक्त वही है जिसका मन और हृदय निर्मल हो। चाहे वह किसी पेशे में हो। यदि ईमानदार है, सच का उपासक है और ईश्वर में पूर्ण विश्वास है तो उसका काम बन जाएगा। साधना पूर्ण हो जाएगी। सच्चा भक्त वही है जो ईश्वरीय नियमों का पालन करते हुए जीवन में परोपकार, सेवा और भक्ति पर खरा उतरता हो। उसका प्रेम अपने परिवार के दायरे तक सीमित नहीं रहता। वह समूचे ब्रह्मांड के जीवों से प्रेम करने लगता है।

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