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तवलीन सिंह का कॉलम वक्त की नब्ज़ः नौकरशाही पर नकेल की जरूरत

प्रधानमंत्री को भूलना नहीं चाहिए एक क्षण के लिए भी कि उनको जनादेश पूरी बहुमत के साथ मिला था परिवर्तन लाने के नाम पर। परिवर्तन हर तरह का, लेकिन विशेष तौर पर परिवर्तन की उम्मीद करते हैं इस देश के वासी प्रशासनिक तौर-तरीकों में, जो अभी तक दिख नहीं रहा है दूर तक।

Author Updated: January 31, 2016 9:06 AM

क्या प्रधानमंत्री का राजनीतिक एजेंडा दिल्ली के आला अधिकारियों के पावों तले नफासत से कुचला जा रहा है? क्या इसका अहसास अब प्रधानमंत्री को भी होने लगा है, सो इसलिए खबर है कि मोदी ने अपने अधिकारियों को खूब फटकार लगाई पिछले हफ्ते? इन सवालों के जवाब ढूंढने जब निकल पड़ी दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में तो मालूम हुआ कि मोदी का अपने अधिकारियों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर होना चर्चा का विषय बन चुका है इन दिनों। चर्चा करने वाले यह भी कहते हैं कि परिवर्तन और विकास के रास्ते में यही आला अधिकारी रुकावट बन गए हैं। बने रहेंगे भविष्य में भी, क्योंकि भारत के बड़े साहबों को अगर एक शब्द से खास नफरत है तो वह है परिवर्तन।

यही वजह है कि अपने देश में अंगरेजी राज समाप्त होने के तकरीबन सत्तर वर्ष बाद भी प्रशासनिक तरीकों में कोई तब्दीली नहीं आई है। आज भी हमारे आला अधिकारी राज करते हैं, शासन नहीं। आज भी वे अपने आप को आम आदमी नहीं समझते हैं। सो, आम आदमी के लिए जो स्कूल, अस्पताल और अन्य आम सेवाएं उपलब्ध कराते हैं, उनको वे खुद कभी नहीं अपने लायक समझते हैं। उनके बच्चे कभी सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते हैं और सरकारी अस्पतालों में जब अफसर साहब जाते हैं इलाज कराने तो उनके लिए होते हैं खास एसी कमरे। इन अधिकारियों की मानसिकता अब भी वही है, जो तब थी जब वे ब्रिटिश राज की सेवा करते थे आइसीएस में भर्ती होने के बाद। आज भी हाल यह है भारत देश में कि जिनके पूर्वज आइसीएस में थे, वे गर्व से इस बात को बताते फिरते हैं हम जैसों को।

इतने होशियार, इतने पढ़े-लिखे होते हैं अक्सर ये आला अधिकारी कि बड़े-बड़े राजनेताओं को प्यादों की तरह चलाते हैं, राजनीति की बिसात पर। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में खबर यह भी है कि मोदी के मंत्रियों को प्यादों की तरह चलाना इन बड़े साहबों के लिए आसान रहा है, क्योंकि ज्यादातर मंत्री ऐसे हैं जिनको न अनुभव था प्रशासन का और न ही वे उभर कर आए थे चुनावों के मैदानों से। कई मंत्री ऐसे हैं, जिनका राजनीतिक प्रशिक्षण सिर्फ दिल्ली के टीवी स्टूडियों में हुई है, जहां वे भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता हुआ करते थे। ऐसे लोगों की कहां क्षमता है उन आला अधिकारियों का मुकाबला करने की, जो मंजे हुए खिलाड़ी हैं?

ये तो ऐसे लोग हैं, जो प्रधानमंत्री के आदेशों का भी उल्लंघन करने से नहीं डरते हैं। मोदी का अभी तक सबसे महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार रहा है योजना आयोग को नीति आयोग में परिवर्तित करना। ऐसा करके उन्होंने साबित किया कि वे पुराने सोवियत संघ के प्रशासनिक तरीकों से दूर होना चाहते हैं। नीति आयोग आज प्रधानमंत्री के लिए सबसे अहम सलाहकार बन गया होता, लेकिन ऐसा होने नहीं दिया दिल्ली के आला अधिकारियों ने। हर कदम पर नीति आयोग को विफल बनाने की कोशिश की है भारत सरकार के अधिकारियों ने, क्योंकि उनको लगा कि उनके कामकाज में ऐसे लोगों को दखल देने की इजाजत दी गई है, जो उनकी तरह आइएएस से नहीं आए हैं।

सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ने इतना भरोसा क्यों किया है अधिकारियों पर, सो इसका जवाब मिलता है गुजरात से। प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी गर्व से कहा करते थे कि वे गुजरात में परिवर्तन और विकास ला पाए हैं उन्हीं अधिकारियों द्वारा, जो पूर्व सरकारों के लिए अड़चन बनते थे। लेकिन उस समय शायद मोदी जानते नहीं थे कि भारत में परिवर्तन और विकास लाना इतना आसान नहीं है, जितना गुजरात में था। शायद जानते नहीं थे कि दिल्ली के आला अधिकारी कितने होशियार होते हैं। नतीजा यह हुआ है कि परिवर्तन के बदले मोदी उन्हीं योजनाओं को जीवित रखे हुए हैं, जो सोनिया-मनमोहन सरकार के समय बनाई गई थीं और जिनका खुल कर मजाक उड़ाया करते थे मोदी। मनरेगा के बारे में उन्होंने कभी कहा था कि इस योजना को वे चालू सिर्फ इसलिए रखेंगे ताकि देशवासी कभी भूल न पाएं कि सड़सठ वर्ष की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस पार्टी ने रोजगार के तौर पर जनता को गड््ढे खोदने और मिट्टी भरने पर मजबूर किया। अब स्थिति यह है कि मनरेगा में निवेश बढ़ाया गया है, बावजूद इसके कि इस योजना का केंद्रीकरण इतना है कि ऊपर से नीचे तक इसमें से रुपए रिस-रिस के गायब हो जाते हैं।

प्रधानमंत्री ने अपने विदेशी दौरों में भरपूर कोशिश की है निवेशकों को विश्वास दिलाने की कि भारत बदल गया है और जो लालफीताशाही पहले हुआ करती थी उसके बदले स्वागत का लाल कालीन दिखेगा उन्हें। पर समस्या यह है कि भारत सरकार के अधिकारियों की मानसिकता न बदलने के कारण विदेशी निवेशक ‘मेक इन इंडिया’ में पैसा लगाने से अब भी कतराते हैं। अभी दावोस से लौट कर आई हूं, सो यकीन दिला सकती हूं आपको कि भारत की छवि अभी बदली नहीं है।

संतोष की बात है अगर कोई तो सिर्फ यह कि अब भी प्रधानमंत्री के पास तीन साल बाकी हैं। उम्मीद करते हैं कि निकट भविष्य में वे अपनी राजनीतिक टीम बनाने में लग जाएंगे और इस टीम को परिवर्तन और विकास लाने की वे जिम्मेदारी सौंपेंगे, जो अभी तक उन्होंने आला अधिकारियों को दी है। यह जरूरी है क्योंकि राजनीतिक परिवर्तन लाने का काम वे लोग कभी नहीं कर सकते हैं, जो राजनीति से आए ही नहीं हैं।

प्रधानमंत्री को भूलना नहीं चाहिए एक क्षण के लिए भी कि उनको जनादेश पूरी बहुमत के साथ मिला था परिवर्तन लाने के नाम पर। परिवर्तन हर तरह का, लेकिन विशेष तौर पर परिवर्तन की उम्मीद करते हैं इस देश के वासी प्रशासनिक तौर-तरीकों में, जो अभी तक दिख नहीं रहा है दूर तक।

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