रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह में शीर्ष स्तर पर प्रभाव और नियंत्रण को लेकर खींचतान के बीच उनके करीबी रहे कई वरिष्ठ लोगों ने समूह को अलविदा कह दिया है। ताजा मामला टाटा संस के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन का है।

रतन टाटा के करीबियों के छोड़कर जाने से देश के इस प्रमुख कारोबारी समूह में सत्ता संतुलन में बदलाव की स्थिति बनती नजर आ रही है। टाटा संस के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन ने बुधवार को कहा कि वह अपने मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति के बाद 20 फरवरी, 2027 को इस पद पर दोबारा नियुक्ति नहीं चाहेंगे।

उनका यह फैसला रतन टाटा के करीबी रहे विजय सिंह और मेहली मिस्त्री के टाटा समूह से अलग होने के बाद आया है। इस विवाद के केंद्र में टाटा के ट्रस्ट हैं, जिनके पास समूह की मूल कंपनी टाटा संस की करीब 66 फीसद हिस्सेदारी है। टाटा संस टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है।

वर्ष 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद उनके सौतेले भाई नोएल एन टाटा अक्तूबर, 2024 से टाटा के सभी ट्रस्ट के अध्यक्ष होने के अलावा टाटा संस के गैर-कार्यकारी निदेशक भी हैं। टाटा संस के छह-सदस्यीय निदेशक मंडल में चंद्रशेखरन, नोएल टाटा, टाटा समूह के वरिष्ठ अधिकारी एवं सभी ट्रस्ट के उपाध्यक्ष वेणु श्रीनिवासन, समूह के मुख्य वित्त अधिकारी सौरभ अग्रवाल और स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी व अनीता मरंगोली जार्ज शामिल हैं।

टाटा के सभी ट्रस्ट में 2025 के दौरान मतभेद बढ़े

टाटा के सभी ट्रस्ट में 2025 के दौरान मतभेद बढ़े। एक गुट नोएल टाटा के साथ रहा, जबकि मिस्त्री की अगुवाई वाले दूसरे गुट में प्रमीत झावेरी, जहांगीर एचसी जहांगीर और डेरियस खंबाटा शामिल थे। मिस्त्री के विस्तारित शापूरजी पालोनजी परिवार से संबंध भी विवाद का एक पहलू रहे हैं। इस परिवार के पास टाटा संस की करीब 18.37 फीसद हिस्सेदारी है।

पूर्व रक्षा सचिव और टाटा के सभी ट्रस्ट के नामित निदेशक विजय सिंह ने 2025 में बोर्ड से इस्तीफा दे दिया। स्वतंत्र निदेशक अजय पीरामल और राल्फ स्पेथ भी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। मिस्त्री ने रतन टाटा द्वारा स्थापित निवेश कंपनी आरएनटी एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड के बोर्ड से भी इस्तीफा दे दिया।
इस साल अप्रैल में श्रीनिवासन ने बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन के ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया था। मंगलवार को सिंह ने सर रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी पद का नवीनीकरण नहीं कराने का फैसला किया। उनका मौजूदा कार्यकाल 14 अगस्त को समाप्त हो रहा है। हालांकि, वे सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी बने रहेंगे।

टाटा के सभी ट्रस्ट में बढ़ते मतभेदों के बीच पिछले साल अक्तूबर में नोएल टाटा, चंद्रशेखरन, श्रीनिवासन और ट्रस्टी डेरियस खंबाटा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात भी की थी।

चंद्रशेखरन ने बुधवार को कहा कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने सर्वसम्मति से उनका कार्यकाल पांच साल बढ़ाने की सिफारिश की थी। टाटा संस की नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति और बोर्ड ने भी इसकी अनुशंसा की, लेकिन 24 फरवरी की बोर्ड बैठक में एक निदेशक का समर्थन नहीं मिलने से प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। चंद्रशेखरन ने कहा, ‘सर्वसम्मति से समर्थन नहीं मिलने पर मैंने फैसला टालने का विकल्प चुना। लेकिन छह महीने बाद भी कोई समाधान नहीं निकलने पर कर्मचारियों, निवेशकों, भागीदारों और अन्य हितधारकों के लिए नेतृत्व को लेकर स्पष्टता जरूरी थी।’

उन्होंने बोर्ड को सूचित कर दिया है कि वह 20 फरवरी, 2027 के बाद टाटा संस के चेयरमैन पद पर पुनर्नियुक्ति के लिए अपना नाम आगे नहीं करेंगे। उन्होंने निदेशकों से अपने उत्तराधिकारी पर जल्द फैसला करने को भी कहा, ताकि नेतृत्व परिवर्तन सुचारू रूप से हो सके। चंद्रशेखरन का यह फैसला टाटा संस के शीर्ष नेतृत्व में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। पहले से चले आ रहे मतभेदों के बीच अब नए अध्यक्ष का चयन समूह के भविष्य के नेतृत्व और शासन व्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण होगा। टाटा संस की केंद्रीय भूमिका और सभी ट्रस्ट की बहुलांश हिस्सेदारी के कारण इस समूची प्रक्रिया पर समूह के दीर्घकालिक दिशा-निर्धारण के संदर्भ में नजर रहेगी।

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