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मुंबई हमला 26/11: सच से सामना, तारिक खोसा की ज़ुबानी

भारत ने मुंबई में हुए आतंकी हमलों को 9/11 सरीखा बताया था। उस पुरहौल घटना में 66 घंटे से ज्यादा खूनी खेल चला। नवंबर 2008 में अत्याधुनिक असलहों...

Author August 8, 2015 10:28 AM
26/11 मुंबई हमले में 166 लोग मारे गए थे।

भारत ने मुंबई में हुए आतंकी हमलों को 9/11 सरीखा बताया था। उस पुरहौल घटना में 66 घंटे से ज्यादा खूनी खेल चला। नवंबर 2008 में अत्याधुनिक असलहों से लैस दस दहशतगर्दों ने भारत के कारोबारी महानगर में कत्लेआम मचा दिया। निर्दोष नागरिकों -सैलानियों का खून बहा। इस खूनखराबे ने दो आणविक क्षमता संपन्न मुल्कों के बीच जंग की नौबत तक खड़ी कर दी।

बदले हालात में दस जुलाई, 2015 को दोनों देशों के वजीरे-आजम रूस के उफा में मिलकर सभी अहम मसलों पर चर्चा के लिए तैयार हुए। दोनों ही नेताओं ने ‘हर तरह के आतंकवाद की निंदा की’ और दक्षिण एशिया से आतंक के सफाए के लिए सहयोग पर रजामंद हुए। बजाहिर, पाकिस्तान को तहे-दिल से इस सहमति का स्वागत करना चाहिए।

कहना होगा कि 9/11 की तरह बीते बरस 16 दिसंबर को हम भी उस दर्द और संताप से नहीं गुजरे, जब आतंक के आका तहरीके-तालिबान और उसके खूनी गुर्गों ने पाकिस्तान की सरजमीं में भी ऐसा ही खूनखराबा किया और पूरे मुल्क ने एकजुट होकर हर तरह की दहशतगर्दी के खात्मे के लिए कमर कस ली। इस बात पर मुझे कोई शुबहा नहीं कि देश का सियासी और सुरक्षा नेतृत्व दहशतगर्दी, चरमपंथ के विनाश के लिए कृतसंकल्प है। असल में अच्छे और बुरे तालिबानके बीच फर्क और दोगलेपन को खत्म करना चाहिए और साथ ही मीरमशाह से मुरीदके और कराची से क्वेटा तक आतंक का खात्मा करना होगा।

फिलहाल ‘आतंकवाद से जुड़े सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए’ दोनों देशों के सुरक्षा सलाहकारों की बैठक को मंजूरी देने के वास्ते उफा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच हुआ करार स्वागतयोग्य कदम है। समझौता एक्सप्रेस बम धमाके की ढीली जांच को लेकर पाकिस्तान की फिक्र, बलूच बगावत और कराची और फाटा में भारतीय और अन्य विदेशी एजंसियों के दखल और आतंकी इमदाद का मामला उठाना चाहिए, बल्कि ठोस सबूत पेश कर दोनों तरफ से ऐसे कारनामे रोकने की पहल करनी चाहिए।

पाकिस्तान में जांच और खुफिया पृष्ठभूमि वाले कई जानकार और माहिर अफसर हैं जो पेशेवर ढंग से भारतीय सुरक्षा अधिकारियों से मिल सकते हैं और पेशेवराना तरीके से बात रख सकते है। दोनों ही देशों को अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए और साथ रहने के लिए अमनपरस्त तरीकों से जटिल मसलों का हल तलाशना चाहिए। पाकिस्तान को यह बात माननी चाहिए कि मुंबई जनसंहार की भूमिका यहीं की धरती में लिखी गई और यहीं बैठे आकाओं ने उस हमले को संचालित किया।

इस सच्चाई का सामना करने की जरूरत है और पाकिस्तान को यह गलती माननी चाहिए। पूरे सरकारी तंत्र को यह बात सुनिश्चित करनी चाहिए कि मुंबई में भयानक हमला करने वालों के आका, साजिशकर्ता इंसाफ के दायरे में लाए जाएं। यह मामला बहुत लंबा खिंच रहा है। मुलजिमों-प्रतिवादियों की लटकाऊ चालें, वाद न्यायाधीशों के बार-बार तबादले, मामले के अभियोजक की हत्या और कुछ गवाहों के मुकरने से अभियोजन पक्ष को झटका लगा है। हालांकि इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने मामले में संज्ञान लेते हुए इस मुकदमे को दो माह में निपटाने का निर्देश दिया था।

जहां तक मुंबई हमले की बात है, ये कुछ तथ्य वाजिब लगते हैं। पहला, अजमल कसाब पाकिस्तानी था। जांचकर्ताओं ने उसकी स्कूली पढ़ाई, घर, प्रतिबंधित आतंकी संगठन में उसके शामिल होने के बारे में पक्के सबूत दिए हैं। दूसरा, लश्करे-तैयबा के आतंकवादियों को थाटा, सिंध के करीब ट्रेनिंग दी गई और यहां से वे सागर के रास्ते गए।

जांचकर्ताओं ने ट्रेनिंग कैंप की पहचान की। इस कैंप से मिले विध्वंसक उपकरणों के आवरण वही थे जो मुंबई हमले में इस्तेमाल किए गए। तीसरा,आतंकवादियों की ओर से इस्तेमाल की गई मछली पकड़ने वाली नौका वापस पाकिस्तानीतट पर लाई गई। उस पर पेंट किया गया और छिपाया गया। जांचकर्ताओं ने इसे खोज निकाला और अभियुक्तों से इसे जोड़ा। इसके अलावा कराची के जिस घर से आतंकी अभियान को निर्देशित किया जा रहा था, उसकी खोज भी जांचकर्ताओं ने की थी। इसके कमांडर और सहायकों की शिनाख्त कर उन्हें गिरफ्तार किया गया।

बहरहाल, भारतीय पुलिस अधिकारियों से कई तरह की जांच सामग्री के आदान-प्रदान के बाद वाद अदालत से अनुरोध किया गया कि साजिश के आका और उसे गुर्गों की आवाज के नमूने के लिए मंजूरी दे। लेकिन अदालत ने कहा कि इसके लिए अभियुक्त की रजामंदी चाहिए। जाहिर है, अभियुक्तों ने मना कर दिया।

बेशक, मुंबई का मामला एकदम अलग है। एक घटना पर दो न्यायाधिकार क्षेत्र और दो मुकदमे। एक तरफ भारतीय अजमल कसाब को पकड़ने में कामयाब रहे और मुकदमा निपटाने के लिए उसका कबूलनामा ले सके। लेकिन दूसरे न्यायाधिकार क्षेत्र में साजिश को साबित करना ज्यादा जटिल है और काफी पक्के सबूत की दरकार है। इसलिए दोनों तरफ के कानून-माहिरों को एक दूसरे को कोसने के बजाय साथ बैठकर बातचीत करनी चाहिए।

बहरहाल क्या एक मुल्क के तौर पर हम लोग नागवार सच्चाई का सामना करने और दहशतगर्दी के शैतान का मुकाबला करने के लिए तैयार हैं? यही सवाल हमारे सामने है।… तारिक खोसा, पाकिस्तानी एफआइए के पूर्व मुखिया
(डॉन से साभार)

दुर्रानी का दर्द

मुंबई हमले में पकड़े गए आतंकवादी अजमल कसाब को पाकिस्तानी नागरिक मान लेने पर पाकिस्तान के तब के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार महमूद अली दुर्रानी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने 7 जनवरी 2009 को उन्हें बर्खास्त करते हुए कहा था कि दुर्रानी ने बिना उन्हें भरोसे में लिए मुंबई हमले में गिरफ्तार एकमात्र जिंदा पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब के बारे में एक भारतीय समाचार चैनल को साक्षात्कार दिया था। गिलानी ने दुर्रानी के बयान को राष्ट्र की छवि खराब करने वाला बताया था।

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