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इनका बस चले तो मेरी भी गर्दन काट दें- मदरसे की शिक्षा पर सवाल उठा बोले तारेक फतह, पठान ने डिबेट छोड़ी, जमई भी करने लगे विरोध

पाकिस्तानी मूल के लेखक तारेक फतेह ने मदरसों में दी जा रही शिक्षा पर सवाल उठाते हुए कहा कि 17-18 साल के बच्चों को पंप किया हुआ है कि तूने जब तक काफिरों को नहीं मारा तो तू जन्नत में कैसे जाएगा।

Tarek Fatah
पाकिस्तानी मूल के लेखक तारेक फतेह (फोटो सोर्स- एएनआई)

उदयपुर की घटना के बाद मदरसों में दी जा रही शिक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के बाद अब पाकिस्तानी मूल के लेखक तारेक फतेह ने भी सवाल उठाया है और हिंदुओं और मंदिरों के खात्मे से लेकर गजवा-ए-हिंद की उन बातों का खुलासा किया है, जो बच्चों के दिमाग में बैठाई जाती हैं।

इस मुद्दे पर चल रही एक टीवी डिबेट में तारेक फतेह ने कहा, “मसला सारा यह है कि आजादी के पहले से ही मदरसों में जो तालीम दी जाती है, वहां पर टेबल-कुर्सी भी नहीं होती। ये उनका अंदाज है बच्चों को रट्टा कराकर पढ़ाया जाता है। वो किताबों के अंदर लफ्ज काफिर कौन है, ये समझाया जाता है।”

उन्होंने कहा, “बच्चों को वहां पढ़ाया जा रहा है कि जुमे की नमाज में दुआ मांगों कि मुसलमानों को या अल्लाह कौम और काफरीन पर फतेह हासिल कराए। हर मस्जिद के अंदर यही दुआ मांगी जाती है।” इस बीच डिबेट में एआईएमआईएम के प्रवक्ता वारिस पठान, शोएब जमई समेत कुल 8 मुस्लिम पैनलिस्ट मौजूद थे।

जैसे ही तारेक फतेह ने बोलना शुरू किया तो वारिस पठान ने डिबेट छोड़ दी, तो शोएब जमई समेत तमाम पैनलिस्ट उनका विरोध करने लगे। इस पर तारेक फतेह ने कहा कि इनका अंदाज ए जवाब वही है। इनका बस चले तो ये मेरी भी गर्दन काट दें।

उन्होंने पैनलिस्ट पर हमला करते हुए कहा कि मुसलमान होकर झूठ बोलते हो यही तुम्हारा कमाल है। उन्होंने कहा कि अगर किसी की विचारधारा इनसे अलग हो तो ये वो भी नहीं सुन सकते, तैश में आ जाते हैं। अब सोचिए वो जो 17-18 साल का बच्चा है, जिसे आपने पंप किया हुआ है कि तूने जब तक काफिरों को नहीं मारा तो तू जन्नत में कैसे जाएगा।

तारेक फतेह ने कहा, “गजवा-ए-हिंद का बेसिक प्रिंसिपल है- हिंदुओं का खात्मा सबको मुसलमान करना, सारे मंदिर तोड़ना, फिर रोज ए कयामत आएगा और फिर ये जाएंगे अपनी जन्नत, अपनी हुरों के पास। इनके दिमाग में मजबूती से बैठाया गया है। आप कैसे करेंगे आपने खुली छूट दी हुई है, पिछले 70 सालों से। अग्रेजों के समय से चला रहा है देवबंद, वहीं से मदरसों का सिलेबस बनता है, राज्यों की तरफ से नहीं। किताबें वहां से नहीं मिल सकती हैं कि क्या पढ़ाया जा रहा है और क्या नहीं।”

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