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विशेष: इश्तेहार बाजार और विवाद

तनिष्क विवाद के बहाने जिस बात पर हमें गहराई से सोचने की जरूरत है, वह यह कि क्या यह विरोध समाज की नई चेतना और समावेशी आधार पर तय हो रही समरसता का विरोध है या फिर एक दक्षिणावर्ती सनक।

तनिष्क के विवाद ने विज्ञापन जगत में धमाल मचा दिया।

विज्ञापन की दुनिया बाजार का रणनीतिक मोर्चा भर नहीं बल्कि यह एक रचनात्मक दुनिया भी है, जहां समाज और संवेदना के बारे में प्रगतिशील खयाल के साथ लोग काम करते हैं। यह बात कुछ गिनती के विज्ञापनों को सामने रखकर चाहे तो कोई गलत ठहरा दे, पर विज्ञापन का इतिहास और विकास इस दुनिया की रचनात्मकता के असंख्य साक्ष्य और तर्क सामने रखते हैं। हाल में तनिष्क के एक विज्ञापन पर मचे विवाद के बाद यह देखना खासा दिलचस्प है कि अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वायत्तता को बचाने का संकट राजनीतिक-सांप्रदायिक दायरों से आगे निकलने के लिए किस तरह संघर्ष कर रहा है। कोरोना संकट के बीच एक विज्ञापन के बहाने जाहिर हुई सोच और मानसिकता से जुड़े विभिन्न पहलुओं की चर्चा कर रहे हैं प्रेम प्रकाश

किसी उत्पाद को महज बेचने के लिए किए गए सृजनात्मक उद्यम को ही अगर हम विज्ञापन समझते हैं तो यह विज्ञापन से जुड़े सृजनकर्म को देखने की हमारी इकहरी दृष्टि है। तनिष्क के हालिया विज्ञापन पर मचे विवाद में भी नजरिए का यह इकहरापन खूब दिखा है। तनिष्क के विज्ञापन में एक घर में गोद भराई का उत्सव दिखाया गया है। घर के माहौल से ऐसा लगता है कि एक मुसलिम परिवार में एक हिंदू बहु की गोद भराई का कार्यक्रम हो रहा है। विज्ञापन के आखिर में युवती कहती है- ‘ये रस्म तो आपके घर में होती भी नहीं है’ तो सास जवाब देती हैं कि- ‘बिटिया को खुश रखने की रस्म तो हर घर में होती है।’ इसी मोड़ पर विज्ञापन खत्म हो जाता है।

निशाने पर संवेदना
तनिष्क का यह विज्ञापन टीवी पर जारी होते ही इतना विवादित हो गया कि कंपनी को इसे वापस लेना पड़ा। यहां सवाल यह है कि समाज की नई बनावट, प्रेम और संबंधों में आए नए मार्मिक संदर्भों के साथ विचार और संवेदना की उदात्तता से जुड़ना क्या कोई आपत्तिजनक कर्म है कि इसके विरोध का हैशटैग ट्विटर पर ट्रेंड करने लगे और देखते-देखते विरोध के निशाने पर आए व्यक्ति या संस्थान के सामने सिर झुकाने और माफी मांगने के अलावा कोई विकल्प न बचे।

यहां जो एक बात और गौर करने की वह यह कि इस विज्ञापन के खिलाफ जिस तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और नफरत के बोल सोशल मीडिया से लेकर सड़कों पर सुनाई दिए, वह सब तब हो रहा था जब पूरी दुनिया के साथ भारत भी कोरोना महामारी से जूझ रहा था। मानवता के इतिहास में यह संकट की ऐसी घड़ी है जिसके मुकाबले के लिए हमें अपने वैज्ञानिक सामर्थ्य को तो आजमाना पड़ ही रहा है, इस बात की भी परीक्षा देनी पड़ रही है कि हम कितने सामाजिक और संवेदनशील हैं। दुर्भाग्य से अमेरिका, ब्रिटेन से लेकर भारत की सड़कों पर इस दौरान जो कुछ भी दिखा, वह इंसानी संवेदना और तरक्की के तमाम दावों के भरभराकर गिरने के मंजर के तौर पर ही तारीख में दर्ज होगा।

संवेदना और बदलाव
तनिष्क के विज्ञापन के खिलाफ आए तर्कों को अगर कोरोनाकाल के दौरान अश्वेतों, गरीबों और महिलाओं के खिलाफ सलूक की सीध में रखकर देखें तो साफ दिखेगा कि विकास को महज एक भौतिक होड़ और संवेदना को एक तिरोहित संस्कार में तब्दील करने की सनक से हमने और कुछ हासिल किया हो या नहीं मानवीय सजलता के पैमाने पर खोया जरूर बहुत है।

तनिष्क विवाद का एक अहम पहलू यह भी है कि बाजार और उससे जुड़े सरोकारों के बीच प्रेम और संवेदना का स्पेस बना रहे, बढ़ता रहे, यह चिंता अगर कुछ लोगों की है तो उनके लिए समर्थन और सराहना की गुंजाइश अब काफी कमजोर पड़ गई है। बात तनिष्क की ही करें तो उसने अपने हालिया विज्ञापन में बल्कि इससे पहले के कम से कम दो विज्ञापनों में समाज और संवेदना को बदलाव का एक रचनात्मक प्रश्रय देने की कोशिश की है। कहीं बेटी अपनी मां के अकेलेपन के खिलाफ सिंदूरी योजना बनाती है तो कहीं श्यामवर्णी होने की पीड़ा को खुशी में बदलने की सजल पहल है।

पद्मसी की सीख
भारत में विज्ञापन क्रांति के नए दौर में जब एड गुरुओं के नाम लोकप्रियता के शिखर चूमने लगे तो विज्ञापनों की दुनिया में बोली-भाषा और संस्कृति की नई प्रस्तुति देखने को मिली। विज्ञापन की संप्रेषनीयता को स्त्री देह और भौतिक भूख से अलग जिम्मेदार रचनात्मक सरोकारों के आधार पर तय करने की यह पहल अब भी जारी है। भारतीय विज्ञापन जगत में गुरु से आगे ‘ईश्वर’ का दर्जा पाने वाले एलेक पद्मसी अपने साथ काम करने वाले लोगों को अक्सर यह समझाते थे कि बाजार का अस्तित्व समाज के बाहर नहीं है। लिहाजा विज्ञापनों के बारे में सोचते या उसे बनाते हुए हमें यह समझ कायम रखनी चाहिए कि हम एक सृजनशील कर्म कर रहे हैं और इस सृजनशीलता का मूल्यांकन सामाजिक मूल्यों की प्रगतिशीलता के आधार पर होगा।

गौरतलब है कि यह उस शख्स की सीख है जिसने एक तरफ तो सर्फ की ललिता जी से हमें मिलवाया, वहीं दूसरी तरफ लिरिल साबुन और कामसूत्र का विज्ञापन फिल्माते हुए उन्होंने समाज और युवाओं के खुले अहसास को केंद्र में रखा। दरअसल, पद्मसी की बात पर गौर करें तो राजशाही पनाहों में पनपने वाली काव्य व सांगतिक परंपरा और अलग-अलग उत्पादों के लिए विज्ञापन बनाने वाले कुबेरी उद्यम में बुनियादी फर्क कहीं नहीं है।

विरोध का चुनिंदा होना
तनिष्क विज्ञापन विवाद ने जिस एक और बात के प्रति हमें सावधान किया है, वह यह कि विरोध के चुनिंदा और इरादतन प्रतिक्रिया के जरिए आज अभिव्यक्ति की दुनिया को एक मनमाफिक शक्ल देने की कोशिश की जा रही है। इसलिए अगर कोई यह सरलीकरण करना चाहे कि बयान से लेकर विज्ञापन तक के विरोध में हुड़दंगी अंदाज में जाहिर हो रही मानसिकता हमारे समाज का तार्किक सच है तो गलत होगा। समाज की अपनी स्वाभाविकता और तरलता को इस तरह के कुयत्नों से हाल के वर्षों में जिस तरह बार-बार नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है।

आखिर में तनिष्क विवाद के बहाने जिस बात पर हमें गहराई से सोचने की जरूरत है, वह यह कि क्या यह विरोध समाज की नई चेतना और समावेशी आधार पर तय हो रही समरसता का विरोध है या फिर एक दक्षिणावर्ती सनक। यह भी कि यह सोच अब उस खतरनाक सीमा तक पहुंच गई है जब एक फेसबुक पोस्ट और ट्वीट के कारण किसी को मार-मार कर अधमरा कर दिया जाता है तो किसी के घर में आग लगा दी जाती है।

बड़ा सवाल
सवाल पूछना चाहिए कि जैसा विरोध तनिष्क के विज्ञापन का हुआ वैसा विरोध इससे पहले आए ऐसे ही कुछ दूसरे विज्ञापनों का भी हुआ क्या? गौरतलब है कि इससे पहले सर्फ एक्सेल ने हिंदू बच्ची को होली के गुब्बारे से बचाते हुए एक मुसलिम बालक को नमाज पढ़वाई थी। उससे पहले रेड लेबल ने बताया कि कैसे हिंदू लोग मुसलिम पड़ोसी को हिकारत की नजर से देखते हैं पर मुसलिम पड़ोसन उन्हें बारंबार चाय पर बुलाती रहती है या फिर घड़ी डिटर्जेंट का ईद वाला विज्ञापन।

दिलचस्प है विरोध से परे तो खैर ये सारे विज्ञापन भी नहीं रहे। पर विरोध के मुकाबले सराहना या स्वीकृति का जोर चूंकि ज्यादा था, इसलिए बात ज्यादा बिगड़ी नहीं। तनिष्क के मामले में ये सारा विरोध फौरी, सुनियोजित और सामूहिक रहा। शायद इसमें एक वजह यह भी हो कि बाकी के विज्ञापन शादी से जुड़े नहीं थे, लिहाजा विरोध की आग ज्यादा नहीं भड़की। इस पूरे मामले का निचोड़ यह कि अभिव्यक्ति के तमाम प्रगतिशील मोर्चों पर खतरे अब पहले से काफी ज्यादा बढ़ गए हैं।

विज्ञापन जगत आहत

तनिष्क के विज्ञापन पर मचा विवाद और विरोधियों के दबाव में विज्ञापन वापस लेने की घोषणा को विज्ञापन जगत ने एक बड़े खतरे के संकेत के तौर पर देखा है। विज्ञापन की दुनिया से जुड़े लोगों और संगठनों को लगता है कि यह एक तरह से कलात्मक अभिव्यक्ति की दुनिया को बदरंग और नियंत्रित करने की साजिश है।

इंटरनेशनल एडवर्टाइजिंग एसोसिएशन (आइएए) के इंडिया चैप्टर ने अपने बयान में कहा, ‘जिन घटनाओं के कारण तनिष्क का विज्ञापन वापस लिया गया है, वो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। हम व्यक्तिपरक मामलों पर हर व्यक्ति की राय का सम्मान करते हैं, लेकिन उन्हें असामाजिक व्यवहार नहीं करना चाहिए। हम संबंधित सरकारों से अपील करते हैं कि वो इस तरह के धमकाने वाले व्यवहार के बारे में गंभीरता से विचार करें और जरूरी कार्रवाई करें, ताकि उद्योग जगत अपने ब्रांड का मैसेज सुरक्षित माहौल में बता पाएं।’

आइएए के इस बयान को एडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन आफ इंडिया (एएएआई) और द एडवर्टाइजिंग क्लब (टीएसी) का भी समर्थन हासिल है। टीएसी ने अपने बयान में कहा, ‘भारतीय मीडिया और विज्ञापन उद्योग की ओर से हम तनिष्क और उसके कमर्चारियों को नई ज्वेलरी लाइन पर उनके विज्ञापन के संबंध में धमकी और निशाने पर लेने की कड़ी निंदा करते हैं।’

इसके पहले विज्ञापनों की देखरेख करने वाली स्वनियंत्रित संस्था एएससीआइ में भी तनिष्क के विज्ञापन को लेकर शिकायत की गई। एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल आफ इंडिया (एएससीआइ) में तनिष्क के विज्ञापन के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई कि ये विज्ञापन ‘सांप्रदायिकता मिलावट को बढ़ावा देता’ है, लेकिन एएससीआइ ने कहा है कि ये किसी कोड का उल्लंघन नहीं है।

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