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तमिलनाडु में बाढ़: मदद की राह में रोड़ा बनी जाति की दीवार, दलितों का आरोप- ओबीसी तक पहले पहुंच रही राहत

यहां 2012 में हुए धर्मपुरी दंगों के बाद से ही जातिगत तनाव ने जड़ें जमा रखी हैं।

तमिलनाडु के कड्डलोर में बीते शुक्रवार को जारी राहत कार्य। (PHOTO/PTI)

बाढ़ से प्रभावित तमिलनाडु के उत्‍तरी जिलों में राहत कार्य में दलितों और ओबीसी के बीच की खाई रोड़े अटका रही है। आरोप है कड्डलोर के कई गांवों में ओबीसी अनुसूचति जाति के लोगों के लिए राहत सामग्री वाले ट्रक पहले भेजने का विरोध कर रहे हैं। सुदूर के गांवों में राहत कार्यों के लिए जा रहे आम वॉलंटियर्स को कई मुश्‍क‍िलों का सामना करना पड़ रहा है। बता दें कि यहां 2012 में हुए धर्मपुरी दंगों के बाद से ही जातिगत तनाव ने जड़ें जमा रखी हैं। तमिलनाडु के उत्‍तरी हिस्‍सों में ओबीसी वनियार समुदाय की आबादी 11 से 12 प्रतिशत है। वहीं, दलित समुदाय परायार करीब 6 पर्सेंट हैं। दोनों समुदायों के बीच अक्‍सर झड़प होती रही है। सबसे बुरा वाकया नवंबर 2012 का है। वनियार समुदाय की लड़की और दलित समुदाय के एक लड़के के साथ भाग जाने के बाद उपजे तनाव और बाद में भड़की हिंसा में धर्मपुरी जिले में कई दलित बस्‍त‍ियों को जला दिया गया था।

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, कुरिंजीपडी का ओनाक्‍कापम गांव बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित है। यहां राहत सामग्री से भरे ट्रकों के सामान का इस्‍तेमाल पहले ओबीसी करते हैं। इसके बाद ही, बची हुई राहत सामग्री दलितों के इलाकों में आवंटित हो पाती है। गांव में एक बार सेना जब मेडिकल कैंप लगाने पहुंची, तो वहां के ओबीसी लोगों ने गांव के बीचों बीच स्‍थित एक घर में यह कैंप लगवाया। आपसी संदेह के माहौल की वजह से दलित ओबीसी लोगों के घरों के करीब लगे इस मेडिकल कैंप तक जाने का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हुए।

ओबीसी समुदाय के लोगों के भी आरोप हैं। एक ओबीसी महिला ने बताया कि गांव में बने एक संकरे पुल की वजह से उन्‍हें काफी दिक्‍कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसकी वजह से उन्‍हें मेन रोड तक जाने के लिए अनुसूचित जाति के लोगों के घरों के पास से निकलना पड़ता है। महिला का आरोप है कि अनुसूचित जाति के लोगों के घरों के करीब से जाने पर उनकी जवान बेटियों के साथ छेड़छाड़ की जाती है। वहीं, एक दलित महिला ने बताया, ”हमारे झोपड़े गांव के दायरे में हैं, इसलिए हमें सबसे ज्‍यादा दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है। जब भी कोई राहत सामग्री से भरा ट्रक आता है तो वो पहले ओबीसी लोगों के इलाके में जाता है। उस इलाके में हम बरसों से नहीं गए।” दलितों का यह भी आरोप है कि एक बार पानी की सैंकड़ों बोतलों से भरा एक ट्रक जब गांव में आया तो उसे पहले ओबीसी लोगों के घरों की तरफ भेज दिया गया। जब ट्रक वापस लौटा तो उसमें पानी के महज दस कार्टन ही बचे थे। कड्डलोर में राहत कार्यक्रम में पंचायत प्रमुखों को शामिल किए जाने को लेकर भी विरोध है क्‍योंकि इनमें से अधिकतर ओबीसी समुदाय से ताल्‍लुक रखते हैं।

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