Tamil Nadu Elections 2026: तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों को लेकर एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इस बार सत्ताधारी DMK और कांग्रेस गठबंध के अलावा विपक्ष में बैठी AIADMK और बीजेपी तक ने एक भी ब्राह्मण नेता को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है। राजनीतिक दलों ने यह काम उस तमिलनाडु में किया है, जहां लंबे वक्त से ब्राह्मणवाद विरोधी राजनीति हो रही है। हालांकि, एक सच ये भी है कि राज्य की सियासत से ब्राह्मण समुदाय पूरी तरह से गायब नहीं हुआ है।
तमिलनाडु में आज के दौर में भी ब्राह्मण राज्य की नौकरशाही, नीति निर्धारण और वैचारिक क्षेत्रों में प्रभावशाली पदों पर मौजूद हैं। ऐसे में पहेली ब्राह्मण समाज के गायब होने की नहीं बल्कि ‘विस्थापन’ की है। ये समुदाय मतपत्र से लेकर ‘बैक रूम’ तक और उम्मीदवार से ‘नियंत्रक’ तक गायब हो गया है। यह कोई अचानक हुआ बदलाव नहीं, बल्कि सदी पुराने समझौते की नवीनतम अभिव्यक्ति जैसा दिखता है।
जनसंख्या कम लेकिन मौजूदगी ज्यादा
एम.एस.एस. पांडियन अपनी पुस्तक ‘Brahmin and Non-Brahmin: Genealogies of the Tamil Political Present’ की शुरुआत 1916 के ‘गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र’ (Non-Brahmin Manifesto) से करते हैं, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि यदि स्वशासन बहुत जल्दी दे दिया गया, तो वह दूसरों पर ‘ब्राह्मण शासन’ बनकर रह जाएगा। पांडियन ने लिखा कि ब्राह्मण जनसंख्या का केवल 3% थे, फिर भी औपनिवेशिक नौकरशाही, पेशों और कांग्रेस नेतृत्व में उनका भारी दबदबा और विजिबिलिटी थी। वे जनसंख्या में कम थे लेकिन संस्थाओं में उनकी मौजदूगी काफी ज्यादा थी।
एस. नारायण की किताब ‘The Dravidian Years’ इस असंतुलन को सांख्यिकीय रूप देती है। वे लिखते हैं कि ब्राह्मणों की जनसंख्या 3 प्रतिशत से भी कम थी, लेकिन शिक्षा और सरकारी नौकरियों पर उनका अत्यधिक कब्ज़ा था। 1892 और 1904 के बीच, मद्रास प्रेसीडेंसी से भारतीय सिविल सेवा (ICS) के लिए चुने गए 16 भारतीयों में से 15 ब्राह्मण थे, और इसी अवधि में चुने गए 27 इंजीनियरों में से 21 ब्राह्मण थे। उन्होंने लिखा, “अंग्रेजी पर उनकी महारत को सत्ता, प्रभाव और लाभ के साधन के रूप में देखा जाता था।” औपनिवेशिक मद्रास में अंग्रेजी केवल एक भाषा नहीं थी, बल्कि सफलता की एक ‘एस्केलेटर’ थी।
सत्ता का कैसे बदला व्याकरण
इसके चलते उस दौर में ही समुदाय के प्रति न केवल नाराजगी पैदा की बल्कि एक विरोधी राजनीतिक पहचान को भी जन्म दिया। पांडियन बताते हैं कि कैसे गैर-ब्राह्मण स्वाभाविक रूप से एकीकृत सामाजिक समूह नहीं था, बल्कि इसे एक श्रेणी के रूप में कल्पित करना और राजनीतिक रूप से वास्तविक बनाना पड़ा। समय के साथ यह तमिलनाडु में सत्ता का स्थापित व्याकरण बन गया।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि 1950 के दशक तक राज्य में कांग्रेस का नेतृत्व ब्राह्मणों से गैर-ब्राह्मणों के हाथों में चला गया था। 1954 में के. कामराज के नेतृत्व में मद्रास ऐसा पहला राज्य बना जिसके मंत्रिमंडल में एक भी ब्राह्मण नहीं था। 1970 के दशक तक सत्ता और विपक्ष दोनों ही उन पार्टियों के पास थे जो गैर-ब्राह्मण हितों के प्रति निष्ठा का दावा करती थीं। यह केवल चुनाव जीतने वालों का बदलाव नहीं था, बल्कि ‘वैधता’ का बदलाव था।
रॉबर्ट एल. हार्डग्रेव की ‘The Dravidian Movement’ इस परिवर्तन को चुनावी अंकगणित से कहीं अधिक मानती है। द्रविड़ राजनीति ने पुरानी सामाजिक शिकायतों, भाषाई गर्व और पदानुक्रम-विरोधी भावना को एक टिकाऊ जन-राजनीति में बदल दिया। पांडियन ने इसके वैचारिक उद्देश्य को स्पष्ट किया। आत्म-सम्मान आंदोलन ने ब्राह्मण को असमानता और उत्पीड़न के विभिन्न रूपों के प्रतीक के रूप में पेश किया। तमिलनाडु में, ब्राह्मणवाद-विरोध केवल बयानबाजी बनकर नहीं रहा, बल्कि यह एक सामान्य समझ में बदल गया।
BJP के फैसले की व्याख्या क्या है?
एनडीए के उम्मीदवारों की सूची सदी की लंबी बहस के एक राजनीतिक ‘फुटनोट’ जैसी लगती है। अन्नाद्रमुक ने कभी एमजीआर और जयललिता के समय में ब्राह्मण चेहरों को जगह दी थी, उसने 35 वर्षों में पहली बार किसी भी ब्राह्मण नेता को टिकट नहीं दिया है। इसके विपरीत विजय की टीवीके (TVK) ने दो ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि NTK ने छह उम्मीदवार उतारे हैं। उन्होंने माइलापुर और श्रीरंगम जैसी सीटों को चुना है, जहां ब्राह्मण मतदाता संख्यात्मक और प्रतीकात्मक दोनों रूप से महत्वपूर्ण हैं। दूसरे शब्दों में छोटे या विद्रोही खिलाड़ी वहां प्रयोग करने को तैयार हैं, जहां स्थापित पार्टियां सतर्क हो गई हैं।
इसीलिए बीजेपी पर सबसे ज्यादा कठिन सवाल खड़े हो रहे हैं। मद्रास विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफेसर रामू मणिवन्नन इसे स्पष्ट रूप से कहते हैं, “बीजेपी के पास भी ब्राह्मण उम्मीदवार क्यों नहीं है, यह बहुत महत्वपूर्ण है। बीजेपी को किसी भी अन्य पार्टी से अधिक इसका जवाब देना चाहिए। वे कहते हैं कि बीजेपी में ब्राह्मण नेतृत्व भी दबदबा बनाना चाहता है, निर्णय लेने में भूमिका निभाना चाहता है लेकिन चुनाव नहीं लड़ना चाहता।”
आरएसएस विचारक एस. गुरुमूर्ति से लेकर बीजेपी प्रवक्ता नारायणन तिरुपति तक इस ईकोसिस्टम में ब्राह्मण चेहरे दिखाई देते हैं, फिर भी उनमें से कोई भी चुनाव नहीं लड़ रहा है। बीजेपी को एक ब्राह्मण पार्टी के रूप में देखा जाता है। वे चुनाव नहीं लड़ना चाहते, बल्कि पार्टी को नियंत्रित करना चाहते हैं। प्रो. मणिवन्नन का सिद्धांत है कि ब्राह्मण नेता राजनीतिक तंत्र को आकार दे रहे हैं, और दूसरों को चुनावी लड़ाई लड़ने के लिए छोड़ रहे हैं।
जयललिता: सबसे बड़ा अपवाद
जयललिता निश्चित रूप से वह अपवाद थीं, जो नियम को पुख्ता करती हैं। जयललिता ने खुद को कभी अपनी पहचान (श्रीवैष्णव ब्राह्मण) के साथ पेश नहीं किया। वे एक जन-लोकलुभावन नेता के रूप में सफल हुईं, जिनका आधार कल्याणकारी योजनाओं और पिछड़ी जातियों के समर्थन पर टिका था। बीजेपी नेता नारायण के अनुसार, द्रविड़ आंदोलन केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा; इसने सामाजिक विचारधारा को शासन और जन-अवसरों के पुनर्गठन में बदल दिया। समय के साथ, मुकाबला ‘ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण’ से हटकर शक्तिशाली ओबीसी (OBC) समूहों के बीच की प्रतिस्पर्धा में बदल गया।
सत्ता के नए केंद्र
द्रविड़ पार्टियों में अब नए समूहों के पास सत्ता की चाबी है। अन्नाद्रमुक में जयललिता के वर्षों के दौरान थेवर समुदाय का प्रभाव बढ़ा, जिसमें उनकी सहयोगी वी.के. शशिकला की बड़ी भूमिका थी। जयललिता के बाद यह संतुलन गौंडर (Gounders) समुदाय की ओर झुक गया। 2016 की जीत में सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण थे। मंत्रिमंडल में कम से कम आठ मंत्री गौंडर समुदाय से और सात थेवर समुदाय से थे।
द्रमुक में भी सत्ता जातिविहीन नहीं है। यदि कभी ब्राह्मण ‘संस्थागत लाभ’ का प्रतीक थे, तो आज मुदलियार (Muthaliyar) जैसे अन्य सामाजिक रूप से मजबूत समूहों को द्रविड़ राजनीति में उस प्रभावशाली स्थान पर देखा जाता है। तमिलनाडु में सत्ता ने जाति को खत्म नहीं किया है, इसने केवल अपनी जातिगत वेशभूषा बदल ली है।
इसीलिए वर्तमान दौर उम्मीदवार तालिका में एक साधारण ‘जीरो’ से कहीं अधिक दिलचस्प है। भले ही ब्राह्मण समुदाय के लोगों को टिकट नहीं मिला है लेकिन उसका प्रभाव राजनीति में कम नहीं हुआ है। कमी केवल इतनी आई है कि लोग गैर ब्राह्मण विरोध के चलते ब्राह्मण पहचान के साथ चुनाव में उतरने को उत्साहित नहीं है। एक सदी की द्रविड़ राजनीति के बाद वह पुराना अल्पसंख्यक समूह जो कभी असमान शक्ति रखता था, आज भी प्रभाव के लीवर के पास मंडरा रहा हो सकता है। नामांकन के दिन, ‘मंडराने’ और ‘मैदान में खड़े होने’ में फर्क होता है।
तमिलनाडु की पार्टियां अपने व्यावहारिक यथार्थवाद के साथ यह अच्छी तरह जानती हैं कि उस प्रतीकात्मक लड़ाई का जोखिम क्यों उठाया जाए जिसकी आपको आवश्यकता नहीं है, जब सत्ता मंच के बजाय ‘दूसरी पंक्ति’ में बैठने में अधिक सहज हो, तो उसमें ही दांव लगाया जा रहा है।
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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को लेकर 23 अप्रैल को मतदान होना है। इस चुनाव में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन और एआईएडीएमके के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के बीच है। अभिनेता विजय की टीवीके पार्टी भी चुनाव मैदान में उतर चुकी है, जिससे इस बार मुकाबला काफी कड़ा हो गया है। एक अहम बात यह भी है कि इस बार सत्ताधारी डीएमके और मुख्य विपक्षी दल AIADMK और गठबंधन की साथी BJP तक ने किसी भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। पढ़िए पूरी खबर…
