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नवाचार का चिकित्सक

तपेश की जब राजस्थान के सबसे बड़े सरकारी गोशाला में नियुक्ति हुई तो वहां वे हर दिन दुर्घटना में घायल पशुओं को देखते और दिन भर उनका संघर्ष देखकर उन्हें उनकी असल पीड़ा का अहसास हुआ। देखते-देखते यह पीड़ा निवारण या समाधान तलाश में तब्दील होती चली गई। पहली सफलता मिलने के बाद उन्होंने इसे जीवन का मिशन बनाया। धीरे-धीरे सिलसिला शुरू हुआ, लोग संपर्क करने लगे तो अपनी प्रयोगशाला में ही चिकत्सकीय नवाचार शुरू किया।

Author Updated: November 18, 2020 7:54 AM
Animal rightपशुओं का उचित इलाज जरूरी। फाइल फोटो।

अपंगता शरीर की तो होती ही है, समझ की भी होती है। पशुओं के बारे में समझ और सलूक की बात करें तो इंसानी सोच की अपंगता या अधूरापन लंबे समय तक दिखती रही है। पर अच्छी बात यह है कि यह अधूरापन अब कुछ नेक और विलक्षण प्रयासों से कम हो रहा है। ऐसे ही प्रयास में जुटे एक पशु चिकित्सक हैं डॉ तपेश माथुर। वे जयपुर में रहते हैं। ‘कृष्णा लिंब’ का उनका अनूठा पर सफल प्रयोग आज पूरी दुनिया में लोकप्रियता और समादर पा रहा है।

यह प्रयोग है दुर्घटनावश पशुओं की चलने-फिरने की लाचारी को दूर करने की। तपेश को पहली सफलता मिली आज से छह साल पहले। 2014 में एक तीन साल के बछड़े कृष्णा को उन्होंने पहला कृत्रिम पैर लगाया तो वो उछलने-दौड़ने लगा। ‘कृष्णा लिंब’ का नाम भी तभी आया। भगवान कृष्ण का पशु प्रेम और उनकी त्रिभंगी मुद्रा, दोनों ही आशय इस नामकरण के पीछे है।

तपेश के लिए यह साब रातोंरात मिलने वाली कामयाबी नहीं थी। उनके मन में पशुओं की अपंगता को लेकर चिकत्सकीय दृष्टि से कुछ करने की उधेड़बुन सात-आठ सालों से चल रही थी। जब भी वे इसके बारे में किसी से पूछताछ करते, तो सब इसे असंभव काम बताते। मन तब दुखी होता जब अस्पताल में इलाज के दौरान अपंग और असहाय पशुओं को देखते। लेकिन फिर वो घर लौट जाते और मन की बात मन में ही रह जाती।

तपेश की जब राजस्थान के सबसे बड़े सरकारी गोशाला में नियुक्ति हुई तो वहां वे हर दिन दुर्घटना में घायल पशुओं को देखते और दिन भर उनका संघर्ष देखकर उन्हें उनकी असल पीड़ा का अहसास हुआ। देखते-देखते यह पीड़ा निवारण या समाधान तलाश में तब्दील होती चली गई। पहली सफलता मिलने के बाद उन्होंने इसे जीवन का मिशन बनाया। धीरे-धीरे सिलसिला शुरू हुआ, लोग संपर्क करने लगे तो अपनी प्रयोगशाला में ही चिकत्सकीय नवाचार शुरू किया।

अपनी प्रायोगिक सफलता के बाद तपेश की यात्राओं का सिलसिला शुरू हुआ, क्योंकि पशु तो चलकर आ नहीं सकते थे। 99 फीसद मामले गायों के थे और इन गायों को चलने-फिरने लायक बनाने की उनकी नवाचारी धुन देखते-देखते प्रदेश की सीमा लांघ देश के कोने-कोने तक पहुंच गई। इरादा और काम करने का रास्ता उन्होंने यह तय किया कि किसानों और मवेशीपालकों को यह समझाया जाए कि गायों के पैर कटने पर उन्हें छोड़ने के बजाय चलाने की कोशिश करें।

सोच बदलनी जरूरी थी। सड़क हादसे ही पशु अपंगता की बड़ी वजह हैं और देश में इसका कोई पुख्ता आंकड़ा नहीं है। वन्यजीवों का एक आकलन जरूर होता है एक संस्था की ओर से, जिसमें जाहिर है कि सड़क और रेल दुर्घनटनाओं की वजह से हर साल सैकड़ों पशु मारे जाने का ब्योरा ज्यादा रहता है। इसमें सबसे ज्यादा संख्या तेंदुओं की है। इसके अलावा गांव वालों के द्वारा अपने बचाव में भी पशुओं को मारने का आंकड़ा बड़ा है। गैरकानूनी तौर पर शिकार के मामले भी कम नहीं हैं। लेकिन घरेलू पशुओं की दुर्घटना और उनकी मौत का कोई आंकड़ा मौजूद नहीं देश में। हालांकि हर पशु गणना में पशुओं की घटती बढ़ती आबादी का अंदाज़ ज़रूर लगता है।

‘कृष्णा लिंब’ के प्रयोग को यह श्रेय जाता है कि लोगों में पशुओं की अपंगता को दूर करने को लेकर समझ और जागरूकता दोनों बढ़ रही है। तपेश को वेटरनेरी सर्जरी एसोसिएशन की ओर से 2014 में एक इंटरनेशनल सिंपोजियम में इस नवाचार के लिए स्वर्ण पदक मिला। इसके अगले ही साल उन्हें बेस्ट फील्ड वेटरिनेरियन का एमआर पटेल सम्मान हासिल हुआ। प्रशंसा और सम्मान का यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। पशु प्रेम के लिहाज से एक संवेदनशील नवाचार से जुड़े शख्स के साथ अच्छी बात यह भी है वे इसके लिए अपने हिस्से न कोई प्रचार-प्रसार चाहते हैं और न ही मान-सम्मान को लेकर किसी तरह की ललक है उनके भीतर। पशुओं के प्रति प्रेम की जो साखी इस चिकित्सक ने लिखी है, वह वाकई अनूठी है।

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