‘तालिबान दहशतगर्द नहीं’, बोले जमीयत उलेमा-ए-हिंद चीफ- अगर आजादी के लिए लड़ना दहशतगर्दी, तब तो गांधी-नेहरू भी थे

यह पूछे जाने पर कि संकटग्रस्त अफगानिस्तान में तालिबान जो कर रहा है, क्या वह ठीक है? उन्होंने बताया, “मुझे नहीं मालूम कि वहां क्या हो रहा है। अभी तो वहां सही से सरकार भी नहीं आई है। पहले उन्हें स्वतंत्र होकर हुकूमत को चलाने दीजिए। जब तक वह पूरी तरह से हुकूमत न कर लें, तब तक हम कुछ नहीं कह सकते।”

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जमीयत उलेमा ए हिंद के प्रमुख अरशद मदनी और अफगानिस्तान के काबुल में तालिबानी लड़ाके। (फोटोः टि्वटर- @ArshadMadani007/एपी)

अफगानिस्तान संकट के बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के चीफ अरशद मदनी तालिबान को दहशतगर्द नहीं मानते हैं। उन्होंने कहा है कि जो आजादी के लिए लड़ते हैं वे दशहतगर्द नहीं होते। अगर इसके लिए लड़ना ही दहशतगर्दी है, तब तो फिर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और शेखुद्दीन भी दहशतगर्द थे।

ये बातें उन्होंने हिंदी अखबार ‘दैनिक भास्कर’ को दिए इंटरव्यू में कहीं। वह यूपी के सहारनपुर स्थित देवबंद में दारुल उलूम के प्रिंसिपल भी हैं। माना जाता है कि तालिबान और दारुल उलूम दोनों देवबंद विचारधारा पर चलते हैं। उन्होंने बताया कि तालिबानी गुलामी को नहीं मानते, जबकि दारुल उलूम गुलामी की मुखालफत के लिए बना। बाकी हमारा उनसे कोई ताल्लुक नहीं है। वैसे, इस बात को साबित नहीं कर सकता है कि दारुल उलूम का कोई आदमी तालिबान के लोगों से संपर्क में रहता है।

यह पूछे जाने पर कि संकटग्रस्त अफगानिस्तान में तालिबान जो कर रहा है, क्या वह ठीक है? उन्होंने बताया, “मुझे नहीं मालूम कि वहां क्या हो रहा है। अभी तो वहां सही से सरकार भी नहीं आई है। पहले उन्हें स्वतंत्र होकर हुकूमत को चलाने दीजिए। जब तक वह पूरी तरह से हुकूमत न कर लें, तब तक हम कुछ नहीं कह सकते।”

भारत, ऑस्ट्रेलिया ने अफगानिस्तान में ‘समावेशी सरकार’ की वकालत कीः भारत और ऑस्ट्रेलिया ने अफगानिस्तान में दीर्घकालिक शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए वहां पर ‘व्यापक एवं समावेशी’ सरकार का आह्वान किया है और तालिबान शासन को मान्यता देने के बारे में अपनी अनिच्छा का स्पष्ट संकेत दिया है। भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच आरंभिक ‘टू-प्लस-टू’ वार्ता के बाद रविवार को जारी एक संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि दोनों पक्ष चाहते हैं कि महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो, सार्वजनिक जीवन में उनका पूरा योगदान रहे। इसमें महिलाओं के अधिकारों के हिमायती लोगों को निशाना बनाकर की जा रही हिंसा पर भी चिंता जताई गई।

शरणार्थी संकट से बचने को विश्व को अफगान तालिबान से वार्ता की जरूरत’: इसी बीच, पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) मोईद युसूफ ने शनिवार को कहा कि दुनिया को अफगानिस्तान में तालिबान के साथ रचनात्मक बातचीत करने की जरूरत है ताकि शासन व्यवस्था को ध्वस्त होने से बचाया जा सके तथा एक और शरणार्थी संकट को टाला जा सके। सेंटर फॉर एयरोस्पेस एंड सिक्योरिटी स्टडीज (सीएएसएस) इस्लामाबाद द्वारा ‘अफगानिस्तान का भविष्य एवं स्थानीय स्थायित्व: चुनौतियां, अवसर और आगे की राह’ विषय पर आयोजित एक वेबिनार में उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा अफगानिस्तान को फिर से अलग-थलग छोड़ना एक गलती होगी।

अंतरिम PM के नाते अखुंद को देश की बागडोरः बता दें कि तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जे के लगभग तीन हफ्ते बाद सात सितंबर को सरकार का ऐलान किया था। वहां अंतरिम पीएम के तौर पर मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद को देश की बागडोर सौंपी गई। तालिबान की पिछली सरकार में विदेश मंत्री समेत कई अहम पद संभाल चुके अखुंद को संगठन की शक्तिशाली सूरा परिषद के सदस्य के तौर पर ‘बामियान में बुद्ध प्रतिमाओं को बर्बाद’ करने वाले फैसले समेत फतवों की फेहरिस्त के लिए भी जाना जाता है।

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