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विशेष: एसवाईएल की लड़ाई में उलझे पंजाब-हरियाणा कोरोना से हारे

एक नवंबर 1966 को पंजाब से अलग होकर हरियाणा के अस्तित्व में आने के बाद से ही दोनों राज्यों के बीच एसवाईएल की लड़ाई चल रही है। इस बीच कई ऐसे मौके आए जब केंद्र व राज्यों में एक ही राजनीतिक दल की सरकार रही लेकिन इस मुद्दे को सुलझाने की बजाय अपने राजनीतिक हित साधने के लिए फुटबाल बनाकर इस्तेमाल किया गया।

Author चंडीगढ़ | Updated: September 9, 2020 12:44 AM
पंजाब के सीएम कैप्टन और हरियाण मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर।

संजीव

पिछले कई दशकों से हरियाणा और पंजाब के विवाद का कारण बना एसवाईएल का मुद्दा जहां फिर से गरमा गया है वहीं एसवाईएल की लड़ाई को प्रतिष्ठा का सवाल बनाने वाले पंजाब व हरियाणा कोरोना की लड़ाई हार गए हैं। कोरोना काल में दोनों राज्यों की सरकार जहां एसवाईएल के मुद्दे को हवा देकर अपने अनुकूल ढालने के प्रयास में जुटी हुई हैं वहीं पंजाब में अब तक कोरोना से 1862 तो हरियाणा में अब तक कोरोना से 800 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

एक नवंबर 1966 को पंजाब से अलग होकर हरियाणा के अस्तित्व में आने के बाद से ही दोनों राज्यों के बीच एसवाईएल की लड़ाई चल रही है। इस बीच कई ऐसे मौके आए जब केंद्र व राज्यों में एक ही राजनीतिक दल की सरकार रही लेकिन इस मुद्दे को सुलझाने की बजाय अपने राजनीतिक हित साधने के लिए फुटबाल बनाकर इस्तेमाल किया गया। करीब पचास साल तक 12 से अधिक चुनावों में एसवाईएल मुद्दा बनी रही है।

अब कोरोना के कारण 22 मार्च से चल रही बंदी में हरियाणा को जहां करीब 20 हजार करोड़ और पंजाब को करीब 40 हजार करोड़ का नुकसान हो चुका है और दोनों राज्यों की सरकारों के लिए कोरोना से निपटना बड़ी चुनौती बन गया है। पंजाब में जहां दूसरी बार साप्ताहिक बंदी चल रही है वहीं हरियाणा दूसरी बार बंदी लागू करने के बाद इसे हटा चुका है। हरियाणा में अब तक 76 हजार से अधिक कोरोना केस आ चुके हैं जबकि पंजाब में यह आंकड़ा 63 हजार से पार हो चुका है। पंजाब में इस समय 16 हजार और हरियाणा में 15 हजार से अधिक सक्रिय मरीज हैं। दोनों राज्यों में कोरोना को लेकर स्थिति गंभीर रूप धारण कर चुकी है।

पंजाब की सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार तथा हरियाणा में भाजपा-जजपा गठबंधन वाली सरकार अब तक कोरोना से निपटने को कोई भी ठोस कारगर नीति लागू नहीं कर सकी हैं। कोरोना के मुद्दे पर कोई साझा रणनीति बनाने की बजाय आज भी हरियाणा व पंजाब वर्षों पुराने एसवाईएल के मुद्दे में उलझे हुए हैं। पूर्णबंदी एक के दौरान पंजाब में जहां जहरीली शराब पीने से सवा सौ लोगों की मौत हो चुकी है वहीं हरियाणा में भी शराब घोटाला व रजिस्ट्री घोटाला भी इसी दौरान सुर्खियों में आया है।

पंजाब में बंदी के दौरान खनन माफिया पूरी तरह से सक्रिय रहा है। पंजाब के मौजूदा तथा पूर्व अकाली मंत्रियों के नाम शराब व खनन माफिया के साथ जुड़ते रहे हैं। इन सब मुद्दों से ध्यान भटकाने और अपनी असफलता को छिपाने के लिए ही पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दोबारा बंदी लागू कर दी। अकाली दल प्रधान सुखबीर सिंह बादल कहते हैं कि बंदी से पहले राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श किया जाना जरूरी था।

पंजाब सरकार कोरोना से निपटने में पूरी तरह असफल साबित हुई है। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पांच माह से अपने फार्म हाउस में बैठे हुए हैं। उन्होंने पंजाब की जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया है। कुछ ऐसी ही स्थिति पड़ोसी राज्य हरियाणा की है। यहां दूसरी बार हुई पूर्णबंदी के मुद्दे पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल तो चुप रहे लेकिन गृहमंत्री अनिल विज आनन-फानन में साप्ताहिक पूर्णबंदी का फैसला लेकर विपक्ष के निशाने पर आ गए थे। हालांकि इसके तुुरंत बाद उन्हें यह फैसला वापस लेना पड़ा।

नेता प्रतिपक्ष एवं हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के अनुसार पहली बंदी के दौरान हरियाणा में शराब घोटाला, रजिस्ट्री घोटाला, धान घोटाला हुआ है। इन घोटालों का अभी तक कोई सुराग नहीं लग पाया है।

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