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सीआईए का दावा- बोफोर्स घोटाले में राजीव गांधी को बेइज्जती से बचाने के लिए स्वीडन ने बंद कर दी थी जांच

रिपोर्ट के मुताबिक स्टॉकहोम स्वीडन में लीक हुई जानकारी से जो गांधी को परेशानी हुई थी, उससे उन्हें बचाना चाहता था। लेकिन नोबल इंडस्ट्रीज (पैरंट कंपनी) चाहती थी कि रिश्वत देने का आरोप उस पर न आए।

Author January 25, 2017 11:17 AM
दोनों पक्षों ने इसलिए पेमेंट्स का राज गोपनीय रखने की एक स्कीम पर सहमति जताई थी। स्वीडन ने बाद में पूरे मामले की जांच बंद कर दी।

अमेरिका की केंद्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईए) ने अपने गोपनीय दस्तावेजों में दावा किया है कि स्वीडन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बेइज्जती से बचाने के लिए बोफोर्स स्कैंडल की जांच बंद कर दी थी। यह कदम भारत के साथ बनाई गई उस ‘स्कीम’ के तहत उठाया गया, जिसमें बिचौलियों को दी गई रकम की जानकारी गुप्त रखी गई थी। इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सीआईए की इस रिपोर्ट का शीर्षक था स्वीडन का बोफोर्स हथियार घोटाला। इस रिपोर्ट के मुताबिक स्टॉकहोम स्वीडन में लीक हुई जानकारी से जो गांधी को परेशानी हुई थी, उससे उन्हें बचाना चाहता था। लेकिन नोबल इंडस्ट्रीज (पैरंट कंपनी) चाहती थी कि रिश्वत खिलाने का दोष उस पर न लगे। दोनों पक्षों ने इसलिए पेमेंट्स का राज गोपनीय रखने की एक स्कीम पर सहमति जताई थी। स्वीडन ने बाद में पूरे मामले की जांच बंद कर दी।

हुई थी 1.5 बिलियन डॉलर की डीलः सीआईए ने यह आकलन साल 1988 में किया था। इससे दो साल पहले ही भारत ने होवित्जर तोपों के लिए 1.5 बिलियन डॉलर की एक डील साइन की थी। सीएआईए के वेस्ट यूरोपीयन डिविजन ने बताया था कि स्वीडन और भारत साथ मिलकर काम करेंगे और होवित्जर तोपों की डील को सुरक्षित करने के लिए बोफोर्स ने तुरंत पेमेंट्स भी कर दी थीं। इन गोपनीय दस्तावजों के मुताबिक बोफोर्स स्कैंडल और उसके चलते भारत और स्वीडन में होने वाले असर पर अमेरिका की नजर लगी हुई थी। इन दस्तावेजों में जांच की टाइमलाइन दी हुई है और यह भी कहा गया है कि स्वीडन की ओर से किए गए एक नैशनल ऑडिट में यह संकेत मिला था कि बिचौलियों को 4 करोड़ डॉलर कमिशन दिया गया था।

राजीव के दौरे के बाद उठाया कदमः 4 मार्च 1988 की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘जनवरी 1988 में यह जांच बंद कर दी गई थी। भारतीय प्रधानमंत्री गांधी के स्टॉकहोम दौरे के बाद यह कदम उठाया गया था। स्वीडन ने दावा किया था कि स्विस बैंक अकाउंट्स के जरिए पेमेंट्स को ट्रैक नहीं किया जा सकता है।’ इस आकलन में बोफोर्स मामले की जांच के दूसरे पहलुओं पर भी नजर डाली गई है, जिनमें सिंगापुर, दुबई और ईस्ट जर्मनी को हुई बिक्री शामिल हैं। तब सीआईए का आकलन यह था कि ‘बोफोर्स ने लगभग पक्के तौर पर पेमेंट्स किए थे और पैसे या तो भारतीय अधिकारियों को या बिचौलियों को दिए गए थे, जिन्होंने बाद में रकम अधिकारियों को दी।’ बोफोर्स घोटाले पर हंगामा मचने के बाद 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस हार गई थी, लेकिन जांच की तलवार राजीव गांधी पर लटकी रही, जो किसी नतीजे पर नहीं पहुंची।

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