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सार्इं बाबा के बाद अब इस्कान के खिलाफ मोर्चा खोला स्वामी स्वरूपानंद ने

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने सार्इं बाबा के अनुयायियों की तरह ही इस्कान के अनुयायियों पर भी हिंदू धर्म के हरे-भरे वृक्ष को दीमक की तरह चाटकर नष्ट करने का आरोप लगाया है।

Author हरिद्वार | June 13, 2017 5:08 AM
जगतगुरू शंकराचार्य

ज्योतिर्पीठ बदरीनाथ व शारदा द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने शिरडी के सार्इं बाबा को लेकर दिए गए विवादित बयान के बाद अब भगवान कृष्ण की अनुयायी संस्था इस्कान को लेकर विवादित बयान दिया है। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने सार्इं बाबा के अनुयायियों की तरह ही इस्कान के अनुयायियों पर भी हिंदू धर्म के हरे-भरे वृक्ष को दीमक की तरह चाटकर नष्ट करने का आरोप लगाया है। वे हरिद्वार के उपनगर कनखल में स्थित शंकराचार्य मठ में पत्रकारों से बात कर रहे थे। इस्कान संस्था को आड़े हाथों लेते हुए शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि इससे जुडे़ लोग गीता की उल्टी-सीधी व्याख्या कर नए-नए विवादों को जन्म दे रहे हैं। शंकराचार्य ने कहा कि गीता में भगवान कृष्ण ने कहा कि रुद्रों में मैं शंकर हूं और इस्कान के लोग भगवान शंकर को भगवान ही नहीं मानते हैं। वे केवल कृष्ण को ही भगवान मानते हैं, ऐसा करके वे विवादों को जन्म दे रहे हैं। हिंदू धर्म के खिलाफ काम कर रहे हैं। गीता को लेकर वे अर्थ का अनर्थ कर रहे हैं। सनातन धर्म की मूल भावना के खिलाफ काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि इस्कान वाले भगवान श्री कृष्ण को लेकर अलग ही संप्रदाय खड़ा कर रहे हैं। उन्होंने वृंदावन में श्री कृष्ण भगवान का मंदिर बनाया है जबकि वहां पहले से ही राधा-कृष्ण के कई प्राचीन मंदिर विद्यमान हैं। इस्कान वाले उन आदिवासी क्षेत्रों में मंदिर बनाएं, जहां ईसाई मिशनरियां आदिवासियों का धर्मांतरण करवाकर उन्हें ईसाई बना रही है। वे ऐसा नहीं करते हैं। वृंदावन में इस्कान वालों को मंदिर बनाने की क्या जरूरत पड़ी थी।उन्होंने कहा कि इस्कान संस्था अमेरिका में जन्मी थी। इस संस्था के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद ने इसका पंजीकरण अमेरिका में कराया था।

ये स्वयं को कृष्ण का उपासक बताते हैं, परंतु गीता का उल्टा-पुल्टा अर्थ निकाल कर अनर्थ कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस्कान वाले दीक्षित हुए बिना ही दंड धारण कर रहे हैं जबकि दंड धारण करने का अधिकार केवल आदि जगदगुरु शंकराचार्य की दशनामी संन्यासी परंपरा वालों को होता है। इस तरह इस्कान सनातन धर्म की परंपरा के खिलाफ काम कर रहा है। वे दीक्षा दे रहे हैं, जबकि उन्हें दीक्षा देने का अधिकार नहीं है। सनातन धर्म का विनाश करने में तुले हैं ये लोग। शंकराचार्य की परंपरा में दंड धारण करने का अधिकारी दंडी स्वामी ही है। जैसे सार्इं बाबा के अनुयायी सनातन धर्म के विरोध में काम कर रहे हैं, वैसा ही आचरण इस्कान वालों का है।

 

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