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विवेकानंद जयंती: जब स्वामी विवेकानंद ने सड़क किनारे बैठकर पिया गांजा, पढ़ें 5 रोचक प्रसंग

स्वामी विवेकानंद को पूरी दुनिया में उनके ज्ञान, वक्तृता और स्मरणशक्ति के लिए जाना जाता है लेकिन वो बीए की परीक्षा सेकंड डिविजन में पास हुए थे।

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। मात्र 39 वर्ष की आयु में चार अप्रैल 1902 को हुआ।

भारत में हर साल 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। भारत सरकार ने 1984 में स्वामी विवेकानंद की जयंती पर इसे मनाने की घोषणा की थी। स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में हुआ था। संन्यास लेने से पहले उनका नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट में वकील थे। उनकी मां भुनवेश्वरी देवी गृहिणी थीं। विवेकानंद के दादा दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और फ़ारसी के ज्ञाता थे। रामकृष्ण परमहंस से संपर्क में आने के बाद नरेंद्रनाथ ने करीब 25 साल की उम्र में संन्यास ले लिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के देहांत के बाद स्वामी विवेकानंद ने पूरे देश में रामकृष्ण मठ की स्थापना की थी। विवेकानंद को पूरी दुनिया में भारतीय दर्शन और वेदांत का सर्वप्रमुख विचारक और प्रचारक माना जाता है। महज 39 वर्ष की उम्र में चार जुलाई 1902 को उनका देहांत हो गया। विवेकानंद की जयंती पर पढ़िए उनके जीवन से जुड़े पांच रोचक प्रसंग।

1- सड़क किनारे गांजा पीना-  बात 1888 की है। स्वामी विवेकानंद भारत भ्रमण पर थे। आगरा और वृंदावन के बीच एक जगह विवेकानंद को एक व्यक्ति सड़क किनारे चिलम में गांजा पीता दिख गया। उन्होंने उस व्यक्ति के पास जाकर कहा कि वो भी गांजा पिएंगे। उस व्यक्ति ने स्वामीजी से कहा कि आप साधु हैं और मैं भंगी हूं। उसकी बात सुनकर पहले तो स्वामीजी  उठकर खड़े हो गये लेकिन तुरंत उनके ज़हन में ख्याल आया कि वो संन्यासी हैं और उनका किसी जाति और परिवार से संबंध नहीं रह गया है। उसके बाद विवेकानंद ने उस व्यक्ति के साथ बैठकर आराम से चिलम पी। विवेकानंद ने बाद में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा है, “किसी इंसान से घृणा मत करो। सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं।”

2- सेकंड डिविजन वाले विद्यार्थी- स्वामी विवेकानंद को पूरी दुनिया में उनके ज्ञान, वक्तृता और स्मरणशक्ति के लिए जाना जाता है। आपको ये जानकर हैरानी हो सकती है कि यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में उन्हें महज 47 प्रतिशत अंक मिले थे। वहीं एफए (बाद में इंटरमीडिएट) में उन्हें 46 प्रतिशत और बीए में 56 प्रतिशत अंक मिले थे।

3- मूर्तिपूजा का औचित्य-  1891 में अलवर (राजस्थान की एक रियासत) के दीवान ने विवेकानंद को राजा मंगल सिंह से मुलाकात के लिए बुलावा भेजा। मंगल सिंह ने विवेकानंद से कहा कि “स्वामीजी ये सभी लोग मूर्तिपूजा करते हैं। मैं मूर्तिपूजा में यकीन नहीं करता। मेरा क्या होगा?” पहले तो स्वामीजी ने कहा कि “हर किसी को उसका विश्वास मुबारक।” फिर कुछ सोचते हुए स्वामीजी ने राजा का चित्र लाने के लिए कहा। जब दीवार से उतारकर राजा का तैल चित्र लाया गया तो स्वामीजी ने दीवान से तस्वीर पर थूकने के लिए कहा। दीवान उनकी बात से हक्काबक्का रह गया। उसे हिचकाचते देख स्वामीजी ने कहा कि ये तस्वीर तो महज कागज है राजा नहीं फिर भी आप लोग इस पर थूकने से हिचक रहे हैं क्योंकि आप सबको पता है कि ये आप के राजा का प्रतीक है? स्वामीजी ने राजा से कहा, “आप जानते हैं कि ये केवल चित्र है फिर भी इस पर थूकने पर आप अपमानित महसू करेंगे। यही बात उन सभी लोगों पर लागू होती है जो लकड़ी, मिट्टी और पत्थर से बनी मूर्ति की पूजा करते हैं। वो इन धातुओं की नहीं बल्कि अपने ईश्वर के प्रतीक की पूजा करते हैं।”

vivekanand, swami vivekanand, Chicago, usa, world religion confrence, अमेरिका के शिकागो में हुई विश्व धर्म संसद में शामिल होने वाले गए विवेकानंद। (तस्वीर- विकीकॉमंस)

4- एक दशक से ज्यादा लम्बी मुकदमेबाजी- विवेकानंद के मामा तारकनाथ के देहांत के बाद उनकी मामी ने विवेकानंद के परिवार को पारिवारिक घर से बाहर करते हुए उन पर मुकदमा कर दिया। विवेकानंद करीब 14 सालों तक ये मुकदमे लड़ते रहे। अपनी मृत्यु से करीब एक हफ्ते पहले ही उन्होंने  अदालत से बाहर समझौता करके मुकदमे का अंत किया।

5- मठ में औरतों के प्रवेश पर रोक- स्वामी विवेकानंद के मठ में किसी भी औरत का प्रवेश निषिद्ध था। एक बार जब विवेकानंद को तेज बुखार था तो उनके शिष्यों ने उनकी माँ को उन्हें देखने के लिए मठ के अंदर आने दिया। विवेकानंद इस बात से नाराज हो गए। विवेकानंद ने अपने शिष्यों को डांटते हुए कहा, “तुम लोगों ने एक महिला को अंदर क्यों आने दिया? मैंने ही नियम बनाया और मेरे लिए ही नियमों को तोड़ा जा रहा है!” विवेकानंद ने शिष्यो से साफ कह दिया कि मठ के किसी नियम को उनके लिए भी न तोड़ा जाए।

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