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इतिहास: स्वामी और संघर्ष

भारत को ऋषि और कृषि परंपरा का देश माना गया है। यह मान्यता किसी पुरातन समझ की देन नहीं है बल्कि देश में किसान आंदोलनों के इतिहास को जब हम समझने की कोशिश करते हैं तो यह समझ और पुख्ता होती है।

Author Updated: January 13, 2021 8:34 AM
farmer leaderस्‍वामी सहजानंद सरस्‍वती।फाइल फोटो।

यहां हम चर्चा कर रहे हैं एक ऐसे संन्यासी की जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में जहां एक तरफ किसानों को संगठित किया, वहीं दूसरी तरफ कृषक समाज को अपने सरोकारों के प्रति जागरूक और संगठित होना सिखाया। इस क्रांतिकारी संन्यासी का नाम था स्वामी सहजानंद सरस्वती।

उनके बारे में इतिहासकार डॉ रामशरण शर्मा ने टिप्प्णी करते हुए कहा था कि उन्होंने किसानों के जरिए देश के निचले तबके में जो जागरूकता पैदा की, उसकी तरंगें हम भारत में नब्बे के दशक में सत्ता और व्यवस्था में हिस्सेदारी के नाम पर हुए सामाजिक न्याय के संघर्ष तक महसूस कर सकते हैं। उनके शब्द हैं ‘आज सामाजिक न्याय की जिन ताकतों को हम बिहार में सत्तारूढ़ देखते हैं वो कतई संभव न होता यदि स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में क्रांतिकारी किसान आंदोलन न चला होता।’

ऐसे किसान हितैषी महात्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के देवा ग्राम में 1889 में महाशिवरात्रि के दिन हुआ था। घर वालों ने नाम रखा था नौरंग राय। पिता बेनी राय सामान्य किसान थे। मेधावी नौरंग राय ने मिडिल परीक्षा में पूरे उत्तर प्रदेश, जो तब संयुक्त प्रांत कहलाता था, में सातवां स्थान प्राप्त किया।

सरकार से छात्रवृत्ति मिली तो आगे की पढ़ाई आसान हो गई। पढ़ाई के दौरान ही उनका मन अध्यात्म में ज्यादा रमने लगा। घर वालों को बच्चे की प्रवृत्ति देख डर हुआ तो जल्दी ही शादी करा दी। लेकिन साल भर के भीतर ही पत्नी चल बसी। दूसरे विवाह की बात चली तो वे घर से भागकर काशी चले गए।

काशी प्रवास ने उनके जीवन की राह बदल दी। 1909 में उन्होंने काशी में स्वामी अद्वैतानंद से दीक्षा ग्रहणकर दंड धारण किया। अब उनका नाम हो गया दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती। वे ऐसे संन्यासी थे जो सामाजिक सुधार के कई अभिक्रमों के साथ जुड़े। गांधीजी का असहयोग आंदोलन जब बिहार में जोर पकड़ा तो स्वामीजी उसके केंद्र में थे।

उन्होंने गांव-गांव घूमकर फिरंगी हुकूमत के खिलाफ लोगों को खड़ा किया। इस दौरान उन्होंने ग्रामीण समस्याओं को नजदीक से देखा-जाना। लोग यह देख हैरत में पड़ जाते थे कि यह कैसा संन्यासी है, जो मठ में जप-तप, साधना करने के बजाए दबे-कुचले मजदूरों-किसानों की बस्तियों में घूम रहा है, उनके दुख-दर्द को समझने में अपनी ऊर्जा को खपा रहा है।

स्वाधीनता आंदोलन ने उन्हें एक कारुणिक अनुभव से भर दिया। उन्होंने पाया कि फिरंगी हुकूमत की आड़ में जमींदार और उनके लोग गरीब खेतिहर किसानों पर जुल्म ढा रहे हैं। गरीब लोग तो अंग्रेजों से ज्यादा उनके दलालों से आतंकित हैं। किसानों की हालत तो गुलामों से भी बदतर है।

युवा संन्यासी का मन एक नए संघर्ष की ओर उन्मुख हुआ। उन्होंने किसानों को गोलबंद करना शुरू किया। 1928 में सोनपुर में बिहार प्रांतीय किसान सभा का उनको अध्यक्ष चुना गया। इसी मंच से उन्होंने किसानों की कारुणिक स्थिति को उठाया। उन्होंने कांग्रेस के मंच से जमींदारों के शोषण से मुक्तिदिलाने और जमीन पर रैयतों का मालिकाना हक दिलाने की मुहिम शुरू की। करीब आठ साल बाद 1936 में कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में उनके ही सभापतित्व में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई।

स्वामी सहजानंद सरस्वती को भारत में संगठित किसान आंदोलन का जनक माना जाता है। उन्होंने ब्रितानी शासन के दौरान शोषण से कराहते किसानों को संगठित किया और उन्हें जमींदारों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया, लेकिन बिल्कुल अहिंसक तरीके से। उनकी अहिंसा में किसान मन की क्रांतिकारी अडिगता थी।

उनका कहना था- ‘कैसे लोगे मालगुजारी, लठ हमारा जिंदाबाद। स्वामीजी ने एक नारा दिया, जो किसान आंदोलन के दौरान खासा चर्चित हुआ-जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनाएगा यह भारतवर्ष उसी का है, अब शासन भी वही चलाएगा।

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