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गोंडा के कृष्‍णपाल स‍िंह कैसे बन गए स्वामी चिन्मयानंद: सुखदेवानंद की व‍िरासत और आडवाणी की ताकत का रहा है बड़ा हाथ

स्वामी चिन्मयानंद के राजनीतिक रसूख की विरासत काफी पुरानी है। जेपी आंदोलन से लेकर राम मंदिर आंदोलन में इनकी भूमिका अहम रही है। बाबरी मस्जिद विध्वंस में ये आरोपी भी थे।

Author Updated: September 20, 2019 3:41 PM
स्वामी चिन्मयानंद (फोटो सोर्स: स्वामी चिन्मयानंद Facebook Page)

उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर यौन शोषण मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता स्वामी चिन्मयानंद को एसआईटी की टीम ने गिरफ्तार कर लिया है। उन पर लॉ की एक छात्रा ने यौन शोषण का आरोप लगाया है। छात्रा उसी कॉलेज में पढ़ती है, ज‍िसके चेयरमैन चिन्मयानंद हैं। वह काफी प्रभाव वाले बीजेपी नेता हैं। जिस बुनियाद पर चिन्मयानंद ने अपनी समाजिक तथा राजनैतिक शक्ति का किला तैयार किया, उसकी शुरुआत 1940 से शुरू होती है और यह शुरुआत स्वामी सुखदेवानंद करते हैं

सुखदेवानंद और उनकी विरासत: उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से संबंध रखने वाले सुखदेवानंद  को हिंदू संस्कृति को उभारने का ख्याल काफी प्रबल हुआ। दरअसल, जब देश आजाद हुआ तब शाहजहांपुर में 1947 के दौरान ‘गांधी फैज-ए-आजम’ नाम से एक कॉलेज स्थापित हुआ। सुखदेवानंद को यह कॉलेज मुस्लिम परस्त जान पड़ा और इसकी प्रतिक्रिया में ही उन्होंने ‘दैवी संपाद संस्कृति महाविद्याय’ की स्थापना की। इसके बाद 1951 में श्री दैवी संपाद इंटर कॉलेज और 1964 में स्वामी सुखदेवानंद पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज अस्तीत्व में आया। छात्रों का संस्कृत में विशेष रुचि नहीं होते देख इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज के छात्रों को गणित, विज्ञान, आर्ट और अंग्रेजी की शिक्षा दी जाने लगी। सुखदेवानंद के आश्रम हरिद्वार, ऋषिकेश और शाहजहांपुर में स्थित थे। उनके देहांत के बाद उनके नाम पर ट्स्ट भी बना, जिसकी जिम्मेदारी स्वामी धर्मानंद ने संभाली। धर्मानंद स्वामी सुखदेवानंद के शिष्य थे और उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर के रहने वाले थे। स्वामी धर्मानंद ने भी अपने समय में शिक्षा के माध्यम से हिंदू संस्कृति को लेकर काम किया।

धर्मानंद का देहांत और चिन्मयानंद का उभार: 1991 में धर्मानंद के देहांत के बाद ट्रस्ट की जिम्मेदारी गोंडा जिले में जन्मे स्वामी चिन्मयानंद के कंधों पर आई। 44 साल की उम्र में आश्रमों और ट्रस्ट के तमाम शाखाओं का कार्यभार संभालने वाले चिन्मयानंद की उम्र तब 44 साल थी। जानकारी के मुताबिक चिन्मयानंद का बचपन में नाम कृष्णपाल सिंह था और उन्होंने 20 साल की आयु में घर का त्याग कर दिया। इसके बाद उन्होंने हरिद्वार, वाराणसी और गुवाहाटी से धार्मिक अध्ययन किया। 90 के दशक से पहले चिन्मयानंद ने बिहार में जेपी आंदोलन में भाग लिया। इसके साथ ही 1964 में स्थापित विश्व हिंदू परिषद (VHP) के साथ भी उनका गहरा नाता था। वीएचपी के अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल के साथ उनकी काफी अच्छी दोस्ती थी। यही वजह रही जब देश में हिंदुत्व वाली राजनीति की लहर चली, तब चिन्मयानंद विश्व हिंदू परिषद के साथ-साथ बीजेपी के एक कद्दावर साथी थे।

चिन्मयानंद की राजनीतिक शुरुआत: 1980 के आखिर में स्वामी चिन्मयानंद को राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया। उन्हें के नेतृत्व में संघर्ष समिति को फैलाव देने का काम किया गया। मंदिर आंदोलन के साथ-साथ वह शाहजहांपुर में शिक्षण संस्थानों का भी लगातार विकास कर रहे थे। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान ही उनकी नजदीकी बीजेपी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी से बढ़ी। तब हिंदुत्व का पताका लहराने के लिए बेचैन बीजेपी ने तमाम साधुु-संतोंं को संसद में एंट्री दिलानी शुरू की। जब वीपी सिंह की सरकार गिरी, तब 1991 में चिन्मयानंद को शरद यादव के खिलाफ बदायूं से टिकट दिया गया। उन्होंने शरद यादव को 15,000 वोटों से पटखनी दे दी।

बाबरी विध्वंस और चिन्मयानंद: 1992 में जब बाबरी मस्जिद ढहाई गई तब स्वामी चिन्मयानंद भी वहां मौजूद थे। लिब्राहन आयोग ने जिन लोगों को आरोपी माना था, उसमें चिन्मयानंद का भी नाम शामिल था। बाबरी मस्जिद ढहाये जाने से 9 दिन पहले चिन्मयानंद ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उत्तर प्रदेश द्वारा दायर एफिडेविट में बताया था कि 6 दिसंबर, 1992 को सिर्फ कारसेवा की जाएगी और अयोध्या में यह किसी तरह कानून-व्यस्था के लिए ख़तरा नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बातों पर विश्वास भी किया। लेकिन, आगे की हकीकत पूरी दुनिया ने देखी। 2009 में लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कारसेवा के बहाने मस्जिद गिराने का प्लान पहले से तय था और इसकी भूमिका में परमहंस रामचंदर दास, अशोक सिंघल, विनय कटियार, चंपत राय, आचार्य गिरिराज, बीपी सिंघल, एससी दिक्षित और चिन्मयानंद शामिल थे।

चिन्मयानंद बतौर समाजसेवी और राजनेता: 90 के दशक में स्वामी चिन्मयानंद अपना रसूख राजनीतिक रूप से काफी मजबूत कर चुके थे। साथ-साथ सामाज में हिदुत्व के नायकों में से एक गिने जाने लगे थे। 12वीं लोकसभा (1998) में उन्होंने आपने आपको ‘सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता और धार्मिक गुरु’ बताया था। उनकी वेबसाइट के मुताबिक वह 30 से अधिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थाओं के साथ जुड़े हैं। इसके अलावा शाहजहांपुर, वृंदावन, हरिद्वार, मैनपुरी और ऋषिकेश समेत दर्जनों आश्रम समेत अस्पताल और अन्य छोटे चिकित्सा केंद्रों की भी जिम्मेदारी देखते हैं। बतौर सांसद वह संसद भवन में हमेशा राम मंदिर के लिए आवाज उठाते रहे। उनके कथन रहे हैं कि रामंदिर का निर्माण संसद दायित्व होना चाहिए। सन् 2000 में संसद में बोलते हुए उन्होंने कहा था, “वहां हमेशा से मंदिर रहा है, वहां अभी भी मंदिर है और वहां सिर्फ मंदिर ही हो सकता है।”

चिन्मयानंद और योगी आदित्यनाथ का रिश्ता: उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ स्वामी चिन्मयानंद के रिश्ते का भी एक इतिहास है। 1980 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने योगी आदित्यनाथ के गुरु मंहत अवैद्यनाथ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। दोनों ने मिलकर राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति की स्थापना भी की थी। आगे चलकर चिन्मयानंद ने योगी आदित्यनाथ के भगवा दस्ता हिंदू युवा वाहिना का शाहजहांंपुर में भी कामकाज देखा। आदित्यनाथ ने ही उनके कॉलेज में एक ऑडिटोरियम का उद्घाटन भी किया था।

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