Suvendu Adhikari CM Oath: पश्चिम बंगाल में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी ने राज्य के अगले और बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं। उनका मुख्यमंत्री बनना बीजेपी में दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को मुख्यमंत्रियों की निरंतरता का संकेत है। कई राज्यों में हाल ही में बीजेपी ने कुछ ऐसा ही किया है।
हालांकि, बीजेपी आम तौर पर प्रमुख राज्यों में अपने अनुभवी नेताओं या कार्यकर्ताओं में से ही किसी नेता को मुख्यमंत्री का चयन करती है। वहीं पार्टी पारंपरिक रूप से कमजोर राज्यों में अन्य पार्टियों के नेताओं को शामिल करके अपने संगठन का विस्तार करती है और फिर पार्टी के विस्तार में अहम भूमिका निभाने वाले नेताओं को सत्ता की सुप्रीम पद दिया जाता है।
सम्राट चौधरी हैं अपवाद
दूसरी ओर, जिन राज्यों में बीजेपी और संघ का संगठन काफी मजबूत है, वहां भी दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को अपने साथ तो ले लेती है लेकिन उन्हें शीर्ष नेतृत्व बहुत कम मिलता है। लंबे समय से पार्टी के अंदरूनी लोगों के लिए ही शीर्ष पद आरक्षित हो जाते हैं। वर्तमान में बिहार इस मामले में एक अपवाद है, जहां आरजेडी से आए सम्राट चौधरी को जातीय समीकरण के कारण सीएम की कुर्सी दी गई है।
शुभेंदु अधिकारी का BJP में प्रमोशन
BJP की पश्चिम बंगाल में पहली बार जीत के बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले शुभेंदु अधिकारी पहले ममता बनर्जी की टीएमसी में शामिल थे, और ममता बनर्जी के सबसे करीबी सहयोगी माने जाते थे। 2020 में शुभेंदु बीजेपी में शामिल हुए थे, जब उन्हें यह समझ आया था, कि टीएमसी में उन्हें प्रमोट नहीं किया जाएगा। इसके बाद शुभेंदु ने साल 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हराया था।
वहीं 2026 के चुनाव ने शुभेंदु ने ही नंदीग्राम और ममता के गढ़ भवानीपुर सीट से भी जीत दर्ज कर टीएमसी को बड़ा झटका दिया था। बंगाल में बीजेपी ने 2011 के विधानसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं जीती थी। वहीं इस बार के 2026 के चुनाव में शुभेंदु के नेतृत्व में बीजेपी ने 207 सीटें जीती हैं। इसीलिए बीजेपी ने टीएमसी से आए शुभेंदु अधिकारी को पार्टी का विस्तार करने के तौर पर सीएम की कुर्सी के लिए प्रमोट किया है।
हिमंता बिस्वा सरमा कांग्रेस से आकर बने मुख्यमंत्री
शुभेंदु अधिकारी से पहले बीजेपी ने असम में भी कुछ ऐसा ही किया था। असम के मुख्यमंत्री और BJP नेता हिमंता बिस्वा सरमा 2014 तक कांग्रेस में थे, और राज्य की तत्कालीन तरुण गोगोई सरकार में मुख्यमंत्री थे। 2011 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने जलुकबारी से प्रोद्युत बोरा को भारी अंतर से हराया था जो 2009 के लोकसभा चुनावों के लिए एलके आडवाणी की प्रचार टीम के एक प्रमुख व्यक्ति थे। हिमंता बिस्वा सरमा को 72.1% वोट मिले, जबकि बोरा को 12.6% वोट मिले।
हिमंता बिस्वा सरमा ने तरुण गोगोई से मतभेदों के कारण 2015 में अचानक कांग्रेस छोड़ दी थी। खबरों के मुताबिक उन्होंने अपने लिए बेहतर समझौता करने के आखिरी प्रयास में राहुल गांधी से मुलाकात भी की थी, लेकिन उनका दावा था कि गांधीजी उनकी चिंताओं को सुनने के बजाय “कुत्ते को बिस्कुट खिलाने” जैसा व्यवहार कर रहे थे, जिससे वे नाराज हो गए। बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने असम में पार्टी के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2016 से पहले बीजेपी असम में एक बेहद छोटी पार्टी थी, लेकिन हिमंता बीजेपी में शामिल हुए तो पार्टी के संगठन में अभूतपूर्व विस्तार हुआ। नतीजा ये कि 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी एजीपी के साथ गठबंधन के तहत सरकार में आ गई। उस दौरान बीजेपी ने संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले सर्वानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री बनाया था। वहीं 5 साल में बीजेपी मजबूत हुई तो हिमंता को बेहतरीन प्रदर्शन के लिए असम का मुख्यमंत्री बना दिया, जबकि सोनेवाल को केंद्रीय मंत्री बनाकर केंद्र में भेज दिया।
पेमा खांडू को बनाया मुख्यमंत्री
अरुणाचल प्रदेश में 2016 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री पेमा खांडू के नेतृत्व में कांग्रेस के 44 विधायकों में से 43 ने एनडीए के उत्तर-पूर्वी लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए) की सहयोगी पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (पीपीए) में शामिल हो गए। दो महीने बाद, खांडू ने पीपीए को तोड़ दिया और 32 विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल हो गए। पेमा खांडू मुख्यमंत्री बने रहे और इस दौरान वे कमजोर कांग्रेस का फायदा उठाकर बीजेपी को मजबूत करते रहे, जबकि बीजेपी पारंपरिक तौर पर अरुणाचल में काफी कमजोर पार्टी थी।
एन बीरेन सिंह को मणिपुर में दी थी जिम्मेदारी
मणिपुर में पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह, पहले कांग्रेस के नेता थे और कांग्रेस की सरकार में मंत्री थे। वे 2016 में बीजेपी में शामिल हुए थे। 2017 में बीजेपी ने राज्य में अपनी सरकार बनाई और सिंह को मुख्यमंत्री के पद पर पदोन्नत किया। मणिपुर एक ऐसा राज्य भी है जहां पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी का प्रभाव बढ़ा है।
मानिक साहा को भी दिया प्रमोशन
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा का भी कांग्रेस से संबंध रहा है। वे 2016 में बीजेपी में शामिल होकर 2020 से 2022 तक राज्य इकाई के अध्यक्ष का पद संभाला था। 2022 में विधायक चुने जाने के बाद पार्टी नेता बिप्लब कुमार देब के पद छोड़ने पर साहा उसी वर्ष मुख्यमंत्री बने। त्रिपुरा में इससे पहले 25 वर्षों तक CPI (M) की सरकार रही थी, लेकिन 2018 में बीजेपी ने जबरदस्त सफलता हासिल की थी।
सम्राट चौधरी को बिहार की जिम्मेदारी
बिहार में बीजेपी के नेतृत्व में चल रही सरकार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी है। हालांकि, गठबंधन में जेडीयू, एलजेपी जैसी पार्टियां भी हैं। सम्राट 2017 में बीजेपी में शामिल हुए थे। इससे पहले वे जेडीयू में थे, जबकि जेडीयू से पहले आरजेडी में भी रहे हैं। वे राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री भी रहे हैं। सम्राट चौधरी दूसरी पार्टियों से बीजेपी में आकर मुख्यमंत्री बने लेकिन वे एक अपवाद है, क्योंकि बीजेपी बिहार में काफी मजबूत है, इसके बावजूद बीजेपी ने उन्हें अपवाद स्वरूप मुख्यमंत्री बना दिया है।
सम्राट के अपवाद बनने के कई कारण हैं क्योंकि बीजेपी कुशवाहा जाति से आते हैं, जो कि जातिगत लिहाज से बीजेपी के लिए सबसे अहम है। ऐसे में बीजेपी के पास सम्राट के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इतना ही नहीं, कहा ये भी गया है कि पूर्व सीएम नीतीश कुमार ने इसी शर्त पर सीएम की कुर्सी छोड़ी, कि उनके उत्ताधिकारी के तौर पर मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्राट चौधरी को ही सीएम बनाया जाएगा। इसीलिए सम्राट बीजेपी की नीतियों में एक अपवाद माने जाते हैं।
शुभेंदु अधिकारी बने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री, जानिए किस-किस नेता ने ली मंत्री पद की शपथ
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज 9 मई 2026 शनिवार को बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब राज्य में एक नए राजनीतिक घटनाक्रम के तहत भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। नंदीग्राम से विधायक और लंबे समय तक विपक्ष के नेता रहे शुभेंदु अधिकारी ने इस शपथ के साथ राज्य की कमान संभाल ली। शपथ ग्रहण के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनडीए के अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर उनका आभार जताया। पढ़िए पूरी खबर…
