पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता में आए आज यानी रविवार को 100 दिन पूरे हो गए या फिर कहें कि शुभेंदु ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने 100 दिन पूरे कर लिए। 9 मई, 2026 को शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। पश्चिम बंगाल की सत्ता की तीन बार कमान संभालने वाली टीएमसी चीफ ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर दिया था। जिसके बाद से टीएमसी की राजनीतिक जनाधार लगातार गिरता जा रहा है। उन्हीं की अपनी पार्टी के कई विधायक और सांसद उनका साथ छोड़ चुके हैं।

ऐसे में शुभेंदु सरकार के 100 दिन पूरे होने पर बात करना जरूरी हो जाता है कि उनके सत्ता में आने के बाद से अब तक पश्चिम बंगाल में क्या कुछ बदला है। हालांकि, इन 100 दिनों की उपलब्धियों को यह गिनकर नहीं समझा जा सकता कि सरकार ने कितने फैसले लिए। बंगाल में असली बदलाव उन चीजों में भी दिखाई दे रहा है जो सरकार की राजनीतिक पहचान बनाती हैं। कभी लाल बंगाल की पहचान थी फिर ममता बनर्जी के दौर में सरकारी इमारतों, स्कूलों और शहर की कई जगहों पर नीला-सफेद रंग दिखाई देने लगा। अब भाजपा की सरकार बनने पर केसरिया रंग दिखाई दे रहा है।

नबन्ना के साइनबोर्ड का रंग नीले से केसरिया कर दिया गया है। विधानसभा और राइटर्स बिल्डिंग भी केसरिया रोशनी में नजर आईं। वहीं, अकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स के एक कमरे को केसरिया रंगे जाने पर सांस्कृतिक जगत में विवाद छिड़ गया। स्कूलों में वंदे मातरम को अनिवार्य किया गया है, जबकि ममता बनर्जी सरकार के ‘खेला होबे दिवस’ की जगह अब ‘आयुष्मान दिवस’ मनाने का फैसला लिया गया है।

यानी बंगाल में केवल सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है, बल्कि नई सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सत्ता के साथ-साथ राज्य की सरकारी, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान भी एक नए स्वरूप में ढाली जा रही है।

पहले समझिए रंग की राजनीति

साल 2011 में जब ममता बनर्जी सत्ता में आईं, तब बंगाल की सरकारी इमारतों, पुलों, सरकारी परिसरों और सार्वजनिक ढांचों पर नीले और सफेद रंग का वर्चस्व तेजी से बढ़ने लगा। यह रंग संयोजन केवल सौंदर्य का हिस्सा नहीं था, बल्कि धीरे-धीरे तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान का प्रतीक भी बना। अब बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।

मई में नई सरकार के शपथ ग्रहण के बाद विधानसभा और ऐतिहासिक राइटर्स बिल्डिंग को केसरिया रोशनी से सजाया गया। राइटर्स बिल्डिंग का महत्व इसलिए भी खास है क्योंकि दशकों तक यही पश्चिम बंगाल की सत्ता का केंद्र रही। ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र नबन्ना बन गया था। अब नई सरकार राइटर्स बिल्डिंग को फिर से प्रशासनिक महत्व देने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। हालांकि, इन घटनाओं को केवल “भगवाकरण” के नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

जुलाई में नबन्ना भवन के शीर्ष पर लगे प्रतीकों और साइनबोर्ड का रंग नीले से बदलकर केसरिया कर दिया गया। इस पर राजनीतिक बहस छिड़ी, लेकिन राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे भवन के रखरखाव और सौंदर्यीकरण का हिस्सा बताया।

अधिकारी के मुताबिक, पूरे नबन्ना भवन को दोबारा रंगने का कोई आधिकारिक आदेश नहीं दिया गया है। यानी भवन का मूल नीला-सफेद स्वरूप जस का तस बना हुआ है, जबकि केवल ऊपरी हिस्से के प्रतीकों और साइनबोर्ड का रंग बदला गया है। फिर भी, राजनीति में प्रतीकों का अपना महत्व होता है। इसलिए नबन्ना के साइनबोर्ड से लेकर विधानसभा और राइटर्स बिल्डिंग की केसरिया रोशनी तक, इन बदलावों को केवल रंग परिवर्तन नहीं बल्कि बंगाल की बदलती राजनीतिक पहचान के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

राइटर्स बिल्डिंग में क्या बदला?

राइटर्स बिल्डिंग सिर्फ एक सरकारी दफ्तर नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की सत्ता, प्रशासन और राजनीतिक विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। ब्रिटिश काल से लेकर वाम मोर्चा शासन तक, यही इमारत राज्य के प्रशासनिक केंद्र के रूप में पहचान रखती रही।

लेकिन 2011 में ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र धीरे-धीरे नबन्ना की ओर स्थानांतरित होने लगा। इसके साथ ही राइटर्स बिल्डिंग का महत्व पूरी तरह खत्म तो नहीं हुआ, लेकिन वह सत्ता के रोजमर्रा के संचालन के केंद्र से काफी हद तक बाहर हो गई।

अब भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद राइटर्स बिल्डिंग को फिर से राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतीक के रूप में उभारने की कोशिश दिखाई दे रही है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, नई सरकार के शपथ ग्रहण के बाद इस ऐतिहासिक इमारत को केसरिया रोशनी से सजाया गया। साथ ही, यहां से सरकारी कामकाज बढ़ाने और इसे दोबारा प्रशासनिक गतिविधियों का अहम केंद्र बनाने की योजना पर भी काम हो रहा है।

राजनीतिक तौर पर इसका संदेश स्पष्ट माना जा रहा है। यह केवल किसी इमारत के उपयोग का मामला नहीं है, बल्कि सत्ता के प्रतीकों को फिर से परिभाषित करने की कोशिश भी है। जहां ममता बनर्जी के दौर में नबन्ना प्रशासनिक शक्ति का नया केंद्र बनकर उभरा था, वहीं बीजेपी सरकार राइटर्स बिल्डिंग को फिर से बंगाल की सत्ता और शासन की पहचान के रूप में स्थापित करना चाहती है। इससे यह संकेत भी जाता है कि नई सरकार प्रशासनिक ढांचे के साथ-साथ राजनीतिक प्रतीकों की भी नई व्याख्या गढ़ने का कोशिश कर रही है।

ललित कला अकादमी का छोटा कमरा बड़ा राजनीतिक विवाद कैसे बन गया?

कोलकाता की ललित कला अकादमी में जुलाई की शुरुआत में एक कमरे को केसरिया रंग से रंगे जाने के बाद विवाद खड़ा हो गया। अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, यह कमरा पहले टिकट काउंटर और बाद में सुरक्षा कक्ष के रूप में इस्तेमाल होता था। 5-6 जुलाई के बीच इसे केसरिया रंग दिया गया और कुछ समय के लिए वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पोस्टर भी लगाए गए थे, जिन्हें बाद में हटा लिया गया।

इसके बाद कलाकारों, रंगकर्मियों और सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक विवाद इतना बढ़ा कि कुछ ही हफ्तों में कमरे का रंग कई बार बदला गया। पहले टेराकोटा, फिर केसरिया, उसके बाद सफेद और फिर दोबारा केसरिया रंग किया गया। इस वजह से यह छोटा-सा कमरा बंगाल में रंगों की राजनीति और सांस्कृतिक पहचान की बहस का प्रतीक बन गया।

हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि कमरे को केसरिया रंग करने का फैसला सीधे राज्य सरकार के किसी आधिकारिक आदेश के तहत लिया गया था, लेकिन इस पूरे विवाद ने यह जरूर दिखाया कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में सार्वजनिक भवनों, सांस्कृतिक संस्थानों और उनके रंग-रूप तक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में ललित कला अकादमी का यह छोटा कमरा एक बड़े राजनीतिक और सांस्कृतिक विवाद का केंद्र बन गया।

सिर्फ रंग नहीं, ममता की पहचान वाली योजनाओं में भी बदलाव

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद बदलाव सिर्फ सरकारी इमारतों और प्रतीकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ममता बनर्जी सरकार की पहचान मानी जाने वाली कल्याणकारी योजनाओं में भी बड़े बदलाव किए गए हैं।

ममता सरकार की सबसे चर्चित योजनाओं में से एक ‘लक्ष्मी भंडार’ थी, जिसके तहत महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती थी। सत्ता में आने के बाद बीजेपी सरकार ने इस योजना को बंद कर उसकी जगह ‘अन्नपूर्णा योजना’ शुरू करने का फैसला किया। सरकार का तर्क था कि लक्ष्मी भंडार योजना में लाभार्थियों के चयन और सत्यापन को लेकर अनियमितताएं थीं।

जून में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया था कि लक्ष्मी भंडार के लाभार्थियों की सूची में करीब तीन लाख पुरुष भी शामिल थे। इसके बाद सरकार ने योजना की समीक्षा करते हुए इसे बंद करने और लाभार्थियों को नई अन्नपूर्णा योजना में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की।

राज्य सरकार की अधिसूचना के अनुसार, अन्नपूर्णा योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपये सीधे उनके बैंक खातों में दिए जाएंगे। 3 जून को योजना का पहला चरण शुरू किया गया और सरकार ने 28 लाख 25 हजार 769 महिलाओं को सहायता राशि देने की घोषणा की।

हालांकि, बदलाव सिर्फ सहायता राशि या योजना के नाम तक सीमित नहीं है। नई सरकार ने योजना की ब्रांडिंग, लाभार्थियों की पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया में भी बदलाव किए हैं। सरकार का कहना है कि पुराने लाभार्थियों का बड़े पैमाने पर पुनः सत्यापन किया जा रहा है ताकि केवल पात्र लोगों को ही लाभ मिले।

यही वजह है कि इस बदलाव को केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बंगाल की राजनीति में कल्याणकारी योजनाएं लंबे समय से चुनावी और राजनीतिक पहचान का प्रमुख आधार रही हैं। ऐसे में लक्ष्मी भंडार से अन्नपूर्णा योजना तक का सफर सिर्फ नीति परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक प्राथमिकताओं में आए बदलाव का भी संकेत माना जा रहा है।

खेला होबे दिवस से आयुष्मान दिवस तक

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक प्रतीकों और सरकारी कार्यक्रमों की प्राथमिकताओं में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। इसका एक प्रमुख उदाहरण 16 अगस्त से जुड़ा है।

ममता बनर्जी सरकार ने 2021 में 16 अगस्त को ‘खेला होबे दिवस’ के रूप में मनाना शुरू किया था। यह नारा विधानसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक अभियान का प्रमुख हिस्सा बना था और बाद में इसे सरकारी स्तर पर भी पहचान मिली।

लेकिन बीजेपी सरकार ने अब इसी तारीख को ‘आयुष्मान दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया है। इसके जरिए सरकार पश्चिम बंगाल में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को प्रमुखता से सामने ला रही है।

केंद्र सरकार के अनुसार, ममता सरकार के कार्यकाल में पश्चिम बंगाल ने आयुष्मान भारत योजना को लागू नहीं किया था और राज्य अपनी अलग स्वास्थ्य बीमा योजना चला रहा था। सत्ता परिवर्तन के बाद जून 2026 में पश्चिम बंगाल सरकार ने योजना के कार्यान्वयन के लिए केंद्र के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।

प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) के मुताबिक, आयुष्मान भारत योजना लागू होने से राज्य के लगभग 1.43 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य बीमा से जुड़े लाभ मिल सकते हैं।

इस बदलाव को केवल एक स्वास्थ्य योजना के विस्तार के रूप में नहीं देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 16 अगस्त को ‘खेला होबे दिवस’ की जगह ‘आयुष्मान दिवस’ के रूप में स्थापित करना नई सरकार की उस कोशिश का हिस्सा है, जिसके जरिए वह तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक प्रतीकों और नारों की जगह केंद्र की प्रमुख योजनाओं और अपनी राजनीतिक पहचान को आगे बढ़ाना चाहती है।

शिक्षा-व्यवस्था में बदलाव

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन का असर शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों की प्रतीकात्मक पहचान पर भी दिखाई दे रहा है। ममता बनर्जी सरकार के दौरान 2022 से सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में नीले-सफेद रंग की यूनिफॉर्म और ‘बिस्व बांग्ला’ लोगो को बढ़ावा दिया गया था। यह व्यवस्था राज्य सरकार की ब्रांडिंग और एक समान पहचान की नीति का हिस्सा मानी जाती थी।

अब बीजेपी सरकार ने इस व्यवस्था की समीक्षा शुरू कर दी है। जुलाई में आई रिपोर्टों के अनुसार, स्कूलों में पहले प्रचलित विभिन्न रंगों की यूनिफॉर्म और संस्थागत प्रतीकों को लेकर सर्वे कराया गया है। इससे संकेत मिलता है कि ममता सरकार के समय लागू की गई एकरूप यूनिफॉर्म व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जा रहा है।

इसके साथ ही सरकार ने एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया है। सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में मॉर्निंग असेंबली के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य कर दिया गया है। बाद में यह निर्देश मदरसों तक भी विस्तारित किया गया।

सरकार का कहना है कि यह कदम छात्रों में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव बीजेपी की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह बंगाल में क्षेत्रीय पहचान के साथ-साथ राष्ट्रीय पहचान को भी अधिक प्रमुखता देना चाहती है। इस तरह स्कूलों की यूनिफॉर्म, प्रतीकों और प्रार्थना सभा से जुड़े फैसले केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं रह गए हैं, बल्कि वे राज्य में पहचान, संस्कृति और राजनीति के व्यापक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं।

भाजपा के 100 दिन में प्रशासनिक दिशा क्या बदली?

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार ने अपने पहले 100 दिनों के दौरान प्रशासनिक प्राथमिकताओं को सुशासन, सुरक्षा और विकास के तीन प्रमुख स्तंभों के रूप में पेश किया है। सरकार का दावा है कि उसका फोकस प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने, कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और केंद्र की योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन पर है।

सरकार के पहले बड़े फैसलों में भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी के अधूरे काम को आगे बढ़ाने का निर्णय शामिल था। पहली कैबिनेट बैठक में सीमा सुरक्षा बल (BSF) को आवश्यक जमीन उपलब्ध कराने का फैसला लिया गया और सरकार ने 45 दिनों के भीतर भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी करने का लक्ष्य रखा।

इसके साथ ही भ्रष्टाचार, सिंडिकेट और कथित माफिया नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई को भी सरकार ने अपनी प्राथमिकता बताया। राज्य सरकार का दावा है कि विभिन्न विभागों में पारदर्शिता बढ़ाने और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए विशेष अभियान चलाए गए हैं। जनसुनवाई को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री ने जनता दरबार की शुरुआत भी की।

केंद्र और राज्य के संबंधों में भी बदलाव देखने को मिला है। नई सरकार ने कई केंद्रीय योजनाओं के साथ तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया है। इसी क्रम में पश्चिम बंगाल ने पीएम श्री स्कूल योजना के क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार के साथ समझौता किया। यह योजना पिछली सरकार के दौरान लागू नहीं हो सकी थी।

महिलाओं के लिए बड़ा दावा

पश्चिम बंगाल बीजेपी सरकार अपनी शुरुआती उपलब्धियों में अन्नपूर्णा योजना को प्रमुखता से पेश कर रही है। सरकार का दावा है कि इस योजना के जरिए पात्र महिलाओं को पहले की तुलना में अधिक आर्थिक सहायता दी जा रही है और कल्याणकारी योजनाओं को अधिक पारदर्शी बनाया जा रहा है।

हालांकि, योजना की पात्रता और लाभार्थियों के सत्यापन को लेकर विवाद भी सामने आया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि लक्ष्मी भंडार योजना के लगभग 30 लाख लाभार्थी या तो पात्रता मानकों पर खरे नहीं उतरे या सत्यापन के दौरान उनकी स्थिति में बदलाव पाया गया। इसके बाद लाभार्थियों की सूची की व्यापक समीक्षा और पुनः सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की गई।

विपक्षी दलों और आलोचकों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। कुछ मामलों में इसे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और नागरिकता से जुड़े व्यापक राजनीतिक विमर्श के साथ भी जोड़ा गया। वहीं सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी सहायता सही और पात्र लोगों तक ही पहुंचे।

अल्पसंख्यक नीतियों में भी साफ बदलाव

राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद अल्पसंख्यक कल्याण और मदरसा शिक्षा से जुड़ी नीतियों में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले। नई बीजेपी सरकार ने धर्म आधारित वित्तीय सहायता योजनाओं की समीक्षा करते हुए कई व्यवस्थाओं में बदलाव का फैसला किया है।

सबसे बड़ा बदलाव बजटीय आवंटन में दिखाई देता है। वर्ष 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक मामले एवं मदरसा शिक्षा विभाग के लिए 2,175.43 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया, जबकि अंतरिम बजट में इस मद के लिए 5,713.61 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए थे। यानी विभाग के आवंटन में लगभग 62 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

सरकार का तर्क है कि उसकी प्राथमिकता धर्म या समुदाय के आधार पर नहीं, बल्कि पात्रता और समान अवसर के आधार पर कल्याणकारी योजनाएं लागू करना है। सरकार इन बदलावों को “समानता आधारित” और “भेदभाव-मुक्त जनकल्याण” की नीति का हिस्सा बताती है। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि इससे अल्पसंख्यक समुदायों के लिए चलने वाले कल्याणकारी कार्यक्रम प्रभावित होंगे।

इसी क्रम में राज्य सरकार ने मदरसों का व्यापक सर्वेक्षण भी शुरू कराया। सरकार का कहना है कि इस सर्वे का उद्देश्य राज्य में संचालित संस्थानों का अद्यतन डेटाबेस तैयार करना, वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं की पहचान करना तथा शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का आकलन करना है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि सर्वेक्षण का उद्देश्य तत्काल किसी मदरसे को बंद करना नहीं है। हालांकि, विपक्ष और अल्पसंख्यक संगठनों ने इस कदम को लेकर आशंकाएं जताई हैं और इसे समुदाय विशेष को निशाना बनाने की कोशिश बताया है।

शुभेंदु अधिकारी सरकार के आर्थिक दावे

शुभेंदु अधिकारी सरकार ने अपने पहले बजट में 2026-27 के लिए 4.39 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है और इसे बंगाल की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाला बजट बताया है।

बजट में एक लाख सरकारी नौकरियों पर भर्ती, सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी, नए एयरपोर्ट का निर्माण, पूर्वी मेदिनीपुर में गहरे समुद्र के बंदरगाह की स्थापना, हर विधानसभा क्षेत्र में मिनी इंडोर स्टेडियम और उत्तर बंगाल में IIT तथा IIM जैसे संस्थानों की स्थापना जैसे बड़े ऐलान किए गए हैं।

हालांकि, यह जरूर कहा जा सकता है कि सत्ता संभालने के बाद बीजेपी सरकार ने साफ संकेत दिया है कि वह केवल प्रशासनिक बदलाव तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि राज्य की राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रतीक व्यवस्था को भी नए सिरे से परिभाषित करना चाहती है।

‘ये काम मैं जरूर करूंगा…’, पश्चिम बंगाल में यूसीसी के बाद धर्मांतरण और जमीन की खरीद-बिक्री के लिए कानून लाने की तैयारी

पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के साथ ही दो और अहम कानूनों को लाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। ये कानून- धर्मांतरण विरोधी और जमीन की खरीद-बिक्री या लेन-देन से जुड़े हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि यूसीसी के बाद ये दोनों कानून सरकार के एजेंडे में हैं। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने कहा, “हमने सीमा पर जमीन (बीएसएफ को) दे दी है। हमने अवैध ओबीसी सूची रद्द कर दी है। हमने इमामों और मुअज्जिनों के भत्ते रद्द कर दिए हैं। इस मुहर्रम में कोई हथियार बाहर नहीं आया। हमने गायों के सम्मान की रक्षा की है। कुछ दिनों बाद यूसीसी लागू होगा… मेरे पास दो काम बचे हैं। पहला, धर्मांतरण के खिलाफ और दूसरा जमीन की खरीद-बिक्री पर कानून लाना। ये काम मैं जरूर करूंगा।” पढ़ें पूरी खबर।