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सुषमा स्वराज का ‘गीता-पाठ’ विपक्ष को नहीं आया रास

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भगवद्गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की हिमायत करके बेवजह ही टकराव मोल ले लिया है। वे विपक्ष और सहयोगी पीएमके के निशाने पर आ गईं हैं। इन पार्टियों के नेताओं का कहना है कि ऐसा करना अनुचित है क्योंकि बहु-आस्था वाले देश में सरकार को सभी धर्मों के साथ समान […]

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भगवद्गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की हिमायत करके बेवजह ही टकराव मोल ले लिया है

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भगवद्गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की हिमायत करके बेवजह ही टकराव मोल ले लिया है। वे विपक्ष और सहयोगी पीएमके के निशाने पर आ गईं हैं। इन पार्टियों के नेताओं का कहना है कि ऐसा करना अनुचित है क्योंकि बहु-आस्था वाले देश में सरकार को सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। भाजपा ने हालांकि सुषमा की बात का बचाव करते हुए कहा कि उनकी टिप्पणी में कुछ गलत नहीं है।

उनके इस बयान पर कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने सवाल किया कि एक बहु-आस्था वाले देश में किसी एक पवित्र पुस्तक को सबसे पवित्र कैसे कहा जा सकता है। उन्होंने संसद भवन के बाहर संवाददाताओं से कहा कि मैं भी एक हिंदू हूं। लेकिन हमारे धर्म में केवल एक पवित्र पुस्तक नहीं है बल्कि कई पुस्तकें हैं। अगर आप गीता को लेते हैं तो वेदों का क्या होगा? उपनिषदों का क्या होगा? यहां कई तरह के विचार हैं। हम केवल यह नहीं कह सकते कि कोई पुस्तक किसी अन्य से अधिक पवित्र है।

उन्होंने इस बात भी हैरानी जताई कि जब देश में कई सारे धर्मों को माना जाता है तब किसी एक राष्ट्रीय पवित्र ग्रंथ के बारे में कैसे बात की जा सकती है? मेरा विचार है कि सरकार का इस तरह की बातें करना सही नहीं है। उधर सत्ता में आने के बाद से नरेंद्र मोदी सरकार पर भाषा और संस्कृति थोपने और कोई भी सराहनीय योजना लागू नहीं करने का आरोप लगाते हुए पीएमके के संस्थापक एस रामदास ने कहा कि किसी एक वर्ग के विचार को पूरे देश के लोगों पर थोपने का सुषमा स्वराज का यह कदम निंदनीय है। स्वराज के इस बयान पर कि गीता में हर वर्ग के लोगों की समस्याओं का हल है, उन्होंने कहा कि इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि गीता में महान मूल्य हैं। लेकिन पवित्र कुरान और पवित्र बाइबिल में भी यही मूल्य हैं। ऐसे में यह प्रयास इस बहस को बल देता है कि मोदी सरकार भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का प्रयास कर रही है।

स्वराज के बयान की आलोचना करते हुए द्रमुक नेता करुणानिधि ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और इसका संविधान में स्पष्ट उल्लेख है। केंद्र सरकार को सभी धर्मों से समान व्यवहार करना चाहिए और बहुलतावाद को बढ़ावा देना चाहिए। बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि भारत में सिर्फ एक ही धर्म को मानने वाले लोग नहीं रहते हैं। लोगों की विविध धार्मिक आस्थाएं हैं, इसलिए ऐसी टिप्पणियां करने से अन्य धर्मों के लोग भी अपनी आवाज उठाएंगे कि उनकी धार्मिक पुस्तकों को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाया जाए।

भाकपा नेता डी राजा ने भी इस बाबत अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि उन्होंने इस मामले को राज्यसभा में उठाने के लिए नोटिस दिया है, जबकि आम आदमी पार्टी के मनीष सिसोदिया ने कहा कि सुषमा स्वराज का यह आह्वान ग्रंथ का अपमान है। जद (एकी) नेता शरद यादव ने कहा कि गीता मोदी सरकार से कहीं अधिक प्राचीन है और हिंदुओं के पवित्र ग्रंथों को किसी की पैरवी की जरूरत नहीं है। राकांपा ने भी सुषमा के सुझाव की आलोचना करते हुए कहा कि यह संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के खिलाफ है।

राकांपा नेता जितेंद्र अवहाद ने नागपुर में संवाददाताओं से कहा कि मैं एक हिंदू हूं और मुझे अपने धर्म की समृद्ध विरासत पर गर्व है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे अन्य धर्मों की भावनाओं को चोट पहुंचाने का हक है। सभी धर्माें के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। भाजपा इस तरह की टिप्पणी करके अन्य धर्म के लोगों को उकसाने की कोशिश कर रही है। हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं। और यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा ने हमारे संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बदलने की तरफ पहला कदम बढ़ाया है।

समाजवादी पार्टी की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष अबू आजमी ने भी सुषमा के सुझाव की आलोचना करते हुए कहा कि अगर एक धर्म की पुस्तक को राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा दिया जाएगा तो अन्य धर्मों की पुस्तकों को भी दिया जाना चाहिए। गीता एक धार्मिक पुस्तक है। अगर आप इसे राष्ट्रीय महत्त्व देते हैं तो आप कुरान और बाइबल के लिए भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते? यह एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। हमें सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए , लेकिन हम किसी पुस्तक को राष्ट्रीय दर्जा नहीं दे सकते।

 

 

 

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