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गीता का मुद्दा: विपक्षी दलों ने कहा, संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदलने की कोशिश

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के भगवद् गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित करने की मांग संबंधी बयान की आलोचना करते हुए मंगलवार को राज्यसभा में विपक्षी दलों के सदस्यों ने दावा किया कि यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदलने की भयावह कोशिश है। शून्यकाल में भाकपा के डी राजा ने यह मुद्दा उठाते हुए मांग […]

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के भगवद् गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित करने की मांग संबंधी बयान की आलोचना करते हुए मंगलवार को राज्यसभा में विपक्षी दलों के सदस्यों ने दावा किया कि यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदलने की भयावह कोशिश है। शून्यकाल में भाकपा के डी राजा ने यह मुद्दा उठाते हुए मांग की कि सदन को विदेश मंत्री की यह मांग सिरे से खारिज कर देनी चाहिए। हालांकि सरकार ने सुषमा का बचाव करते हुए कहा कि गीता धर्म ग्रंथ नहीं बल्कि कर्म ग्रंथ है। संसदीय कार्य राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि गीता धर्म ग्रंथ नहीं है। यह कर्म ग्रंथ है।

उन्होंने कहा कि जब भी ‘संस्कृति और संस्कार’ की बात होती है तो कुछ लोगों को लगता है कि धर्मनिरपेक्षता खतरे में है। उन्होंने कहा कि भगवद् गीता पर पूरे देश को गर्व है। इससे पहले राजा ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा -आप एक पवित्र पुस्तक को राष्ट्रीय पुस्तक के तौर पर थोप नहीं सकते। उन्होंने कहा कि भारत बहु धर्मी और बहुभाषी देश है जहां विभिन्न वर्ग विभिन्न धर्म ग्रंथों को पवित्र मानते हैं। राजा ने कहा कि सुषमा स्वराज का बयान कोई ऐसा अकेला बयान नहीं है और इसे भाजपा व आरएसएस नेताओं की टिप्पणियों के संदर्भ में देखा जााना चाहिए। यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदलने का भयावह प्रयास है।

भाकपा नेता ने सवाल किया कि सरकार तमिल जैसी अन्य भारतीय भाषाओं की कीमत पर संस्कृत को स्कूली शिक्षा में क्यों विशेष महत्व दे रही है जबकि तमिल भी एक प्राचीन भाषा है। उन्होंने कहा कि सुषमा का बयान आपत्तिजनक है और पूरे सदन को इसे गंभीरता से लेना चाहिए और इसे खारिज कर देना चाहिए। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने कहा कि वे सुषमा के बयान की निंदा करते हैं। माकपा के सीताराम येचुरी ने कहा कि भारत के लिए पवित्र पुस्तक उसका संविधान है जो सबको समानता का अधिकार देता है। वाम, कांग्रेस और तृणमूल के कई सदस्यों ने स्वयं को इस मुद्दे पर राजा से संबद्ध किया।

शून्यकाल में ही माकपा के पी राजीव ने केंद्रीय विद्यालयों में छठी से आठवीं कक्षा के बच्चों के लिए संस्कृत को अनिवार्य बनाए जाने के सरकार के निर्णय का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सत्र के बीचों बीच इस तरह का फैसला छात्रों के हित में नहीं है। उन्होंने कहा कि इससे केंद्रीय विद्यालय के हजारों छात्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

इसी मुद्दे पर कार्य स्थगन प्रस्ताव का एक अन्य नोटिस देने वाले आरएसपी के एनके रामचंद्रन ने कहा कि सरकार ने 14 नवंबर और 14 दिसंबर को तेल के दामों से संंबंधित दो -दो अधिसूचनाएं जारी कीं। लेकिन उसने इनके बारे में संसद को जानकारी नहीं देकर उसकी उपेक्षा की है।

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