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Surgical Strike: कानों से होकर गुजर रही थीं पाकिस्तानी गोलियां, लैंड माइंस पर पैर पड़ते ही हुआ धमाका…

Surgical Strike: ऑफिसर टैंगो का स्वागत कर रहे अधिकारी ने ग्लास लाने वाले शख्स से कहा, "अरे तुम ग्लास क्यों लेकर आए...स्पेशल फोर्सेज वाले ग्लास खा जाते हैं। अफसर ने कहा कि इनको तो हम सीधा बोतल से पिलाएंगे।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (पीटीआई फाइल फोटो)

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद दुश्मन की जमीन से सुरक्षित वापस लौटना भारतीय सैनिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। 28 सितबंर की रात लगभग 12 बजे से लेकर सुबह तक पाक अधिकृत कश्मीर में सैकड़ों गोलियां चलीं, बंकर ध्वस्त किये गये, रॉकेट लॉन्चरों की आवाज से घाटी का सन्नाटा जाता रहा। अब तक पाकिस्तान सेना को भारतीय हमले की खबर लग चुकी थी। बीबीसी अपनी एक रिपोर्ट में ऑपरेशन को अंजाम देने वाले एक ऑफिसर माइक टैंगो (खुफिया नाम) से बात करने वाले एक पत्रकार के हवाले से लिखता है, “अगर मैं कुछ इंच और लंबा होता तो आज आपके पास बैठकर बातचीत नहीं कर रहा होता।” ऑफिसर माइक टैंगो भारतीय सीमा में लौटने के लिए एक लंबा रुट लिया। वे अपने पाक सीमा में आगे बढ़े फिर सुरक्षित रास्ता लेकर वापस लौटे। भारतीय सेना चाहती थी कि जितने जवान ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए गये थे उतने ही वापस आएं और अपने पैरों पर चलकर आएं, और दुनिया के सबसे बेहतरीन सिपाहियों में गिने जाने वाले स्पेशल फोर्सेज के जवानों ने आखिरकार यहीं किया।

माइक टैंगो के मुताबिक लौटते वक्त गोलियां कान के पास से गुजर रही थीं। यू लगता हर वक्त मौत से वास्ता है। सर्जिकल स्ट्राइक में शिरकत करने वाले कई जवानों ने न्यूज चैनल इंडिया न्यूज से बात की। एक जवान ने बताया कि भारत ने पूरे इत्मीनान से ऑपरेशन को अंजाम दिया। यहां तक ग्रेनेड लॉन्चर के निशान भी भारत ने वहां नहीं छोड़े। एक जवान कहते हैं लौटते वक्त एक जवान का पैर जगंलों में बिछे लैंड माइंस के संपर्क में आ गया था। एक घमाका हुआ और एक जवान घायल हो गया। जवान ने बताया कि प्लानिंग के वक्त एक रिजर्व स्क्वैड रखा गया था, जो सिर्फ इस काम के लिए था कि अगर किसी को चोट लगे तो उसे वापस ले जा सके। लेकिन तब तक रिजर्व स्क्वैड आगे निकल चुका था। इसके बाद उस स्क्वैड से स्ट्रैचर लेकर एक शख्स को नीचे बुलाया गया।

लेकिन वापस जाना बेहद खतरनाक था। पहाड़ की चढ़ाई ऐसी थी कि जवान को स्ट्रेचर पर ले जाना मुश्किल था, यही नहीं स्ट्रेचर पर ले जाने के लिए ज्यादा मैनपावर की भी जरूरत होती। गोलियां चल रही थी। सबसे पहले घायल जवान के वार लोड को सबमें बांटा गया। इसके बाद सभी जवान आपसी सहयोग से घायल सैनिक को ऊपर ले गये। ऑपरेशन की निगरानी कर रहे कमांडर ने इस घटना की जिम्मेदारी भारतीय सीमा में अधिकारियों को पहले दे दी थी। जवान बताते हैं कि इस घटना के बावजूद किसी जवान के हौसले पर कोई असर नहीं पड़ा था। ये जवान जब इंडियन कैंप से एक से डेढ़ किलोमीटर पहले थे तब तक ऊपर से एक भारतीय टीम नीचे आ चुकी थी। इस टीम ने जवान का तुरंत इलाज किया। घायल जवान को कैंप में ले जाया गया। कुछ ही मिनटों में एक हेलिकॉप्टर आया और घायल शख्स को बेहतर इलाज के लिए ले गया।

जवानों के मुताबिक 29 सितंबर को सुबह 11.30 बजे तक जवान अपने बेस कैंप पहुंच चुके थे। इस दौरान भारतीय सैनिकों पर लगातार फायरिंग होती रही। लेकिन ये इलाका इतना घना था, वहां कवर इतना ज्यादा था कि पाकिस्तानी भारतीय फौज को छू भी नहीं सके। जवान कहते हैं कि जब वे अपने कैंप पर पहुंचे तो उनके साथियों ने उन्हें बधाईयां दी, सेना के कमांडर व्यक्तिगत रुप से उनसे मिलने को आए। 2 बजते बजते ये जवान भारतीय पोस्ट तक पहुंच गये। तब तक ये खबर मीडिया में ब्रेक हो चुकी। दिल्ली की रायसीना हिल्स से पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हड़कंप मच चुका था। सेना अलर्ट मोड भी और पाकिस्तान की प्रतिक्रिया का इंतजार था।

जवान बताते हैं 24 घंटे बाद उन्हें अपना काम की अहमियत का अंदाजा हुआ। जवान बताते हैं कि उन्हें भी इस घटना के स्कोप और स्केल का अंदाजा नहीं था। हमले में शामिल जवान बताते हैं कि उन्हें पाकिस्तानी एजेंसियों से सर्विलांस का खतरा था लिहाजा उन्होंने 48 घंटे तक अपने मोबाइल फोन स्वीच ऑफ रखे। इधर माइक टैंगो को हेलिकॉप्टर से 15 कोर के मुख्यालय ले जाया गया। यहां पर उनका शानदार स्वागत किया गया। ऑफिसर टैंगो जैसे ही वहां पहुंचे एक शख्स ट्रे में उनके लिए ब्लैक लेबल और खाली ग्लास लेकर आया। बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक ऑफिसर टैंगो का स्वागत कर रहे अधिकारी ने ग्लास लाने वाले शख्स से कहा, “अरे तुम ग्लास क्यों लेकर आए…स्पेशल फोर्सेज वाले ग्लास खा जाते हैं। अफसर ने कहा कि इनको तो हम सीधा बोतल से पिलाएंगे। इसके बाद अफसर ने टैंगो को सीधा बोतल से ही ब्लैक लेबल पिलाया। यही नहीं माइक टैंगो ने भी अपने ऑफिसर को बोतल से ब्लैक लेबल पिलाया।

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