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सुप्रीम कोर्ट का फैसला- हाई कोर्ट के जज हवाईअड्डे पर कराएं अपनी सुरक्षा जांच, इसे प्रतिष्ठा का सवाल मत बनाएं

शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाई कोर्ट के 11 साल पुराने आदेश को रद्द करते हुए सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान हाई कोर्ट ने मामले में खुद नोटिस लेकर अपनी पावर अॉफ रिविजन का अतिक्रमण किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाई कोर्ट के जजों को भी एयरपोर्ट्स पर सुरक्षा जांच से गुजरना होगा। शीर्ष अदालत ने 11 साल पुराने राजस्थान हाई कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि सुरक्षा जांच पद या प्रतिष्ठा का मुद्दा नहीं हो सकती। हाई कोर्ट ने खुद नोटिस लेकर कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार में दखल दिया है। मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और एल नागेश्वर राव की बेंच ने कहा कि कानून के शासन पर आधारित लोकतंत्र में सरकार विधायिका के प्रति जवाबदेह है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय फैसला करने वाले किसी व्यक्ति की समझ पर निर्भर नहीं करता। जजों से उम्मीद की जाती है कि वे संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित उद्देश्य परक और कानून में बताए गए मानकों को लागू करेंगे।

आपको बता दें कि राजस्थान हाई कोर्ट ने श्रीनगर एयरपोर्ट पर सुरक्षा चूक के एक मामले में खुद नोटिस लेते हुए सुनवाई शुरू की थी। हाई कोर्ट ने 13 मई, 2005 को सरकार को आदेश दिया था कि वह हवाई अड्डों में सुरक्षा जांच से छूट देने वाली सूची में हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों को भी शामिल करे।

इतना ही नहीं सरकार को नेशनल सिक्योरिटी पालिसी पर भी विचार करने का आदेश दिया था। भारत सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत में ही 20 जनवरी 2006 को हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। हालांकि इस बीच सरकार ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को सुरक्षा जांच से छूट की सूची में शामिल कर लिया है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हाई कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा, हाई कोर्ट ने ऐसा आदेश पारित कर अपनी न्यायिक पुनरीक्षण शक्तियों (पावर अॉफ रिविजन) का अतिक्रमण किया है। सुरक्षा का मुद्दा उन सरकारी एजेंसियों को तय करने दिया जाना चाहिए, जिनका ये दायित्व है। खुफिया सूचना जमा कर आंतरिक और बाहरी खतरे का आकलन करते हुए सुरक्षा नीति तय करने में न्यायपालिका की विशेषज्ञता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा नीति बनाने के आदेश को भी न्यायिक समीक्षा के अधिकार का अतिक्रमण करार दिया।

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