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एससी-एसटी कानून: सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश वापस लिए

अदालत ने 20 मार्च, 2018 के फैसले में गिरफ्तारी के प्रावधानों को हल्का करने संबंधी अपने निर्देश वापस ले लिए। इस कानून के प्रावधानों के दुरुपयोग और झूठे मामले दायर करने के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि यह जाति व्यवस्था की वजह से नहीं, बल्कि मानवीय विफलता का नतीजा है। पीठ ने इस कानून के तहत गिरफ्तारी के प्रावधान और कोई भी मामला दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच करने के निर्देशों को अनावश्यक करार दिया और कहा कि अदालत को अपने पूर्ण अधिकार का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था। पीठ ने कहा कि संविधान के तहत इस तरह के निर्देश देने की अनुमति नहीं है।

Author नई दिल्ली | Published on: October 2, 2019 3:47 AM
पीठ ने अदालत की दो सदस्यीय पीठ के 20 मार्च, 2018 के फैसले पर टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया था कि क्या संविधान की भावना के खिलाफ कोई फैसला सुनाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और जनजाति (उत्पीड़न से संरक्षण) कानून के तहत गिरफ्तारी के प्रावधानों को हल्का करने संबंधी अपने 20 मार्च, 2018 के फैसले में दिए गए निर्देश मंगलवार को वापस ले लिए। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति बीआर गवई के पीठ ने केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर यह फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि समाज में समानता के लिए अनुसूचित जाति और जनजातियों का संघर्ष देश में अभी खत्म नहीं हुआ है।

अदालत ने कहा कि इन वर्गों के लोग आज भी अस्पृश्यता का सामना कर रहे हैं और वे बहिष्कृत जीवन गुजारते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत अजा-अजजा वर्ग के लोगों को संरक्षण प्राप्त है, लेकिन इसके बावजूद अभी तक उनके साथ भेदभाव हो रहा है।

पीठ ने 18 सितंबर को इस पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई पूरी की थी। पीठ ने अदालत की दो सदस्यीय पीठ के 20 मार्च, 2018 के फैसले पर टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया था कि क्या संविधान की भावना के खिलाफ कोई फैसला सुनाया जा सकता है। पीठ ने कानून के प्रावधानों के अनुरूप समानता लाने के लिए कुछ निर्देश देने का संकेत देते हुए कहा था कि आजादी के 70 साल बाद भी देश में अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों के साथ भेदभाव और अस्पृश्यता बरती जा रही है।

यही नहीं अदालत ने हाथ से मलबा उठाने की कुप्रथा और सीवर व नालों की सफाई करने वाले इस समुदाय के लोगों की मृत्यु पर गंभीर रुख अपनाते हुए कहा था कि दुनिया में कहीं भी लोगों को ‘मरने के लिए गैस चैंबर’ में नहीं भेजा जाता है। पीठ ने कहा था-यह संविधान की भावना के खिलाफ है। क्या किसी कानून और संविधान के खिलाफ सिर्फ इस वजह से ऐसा कोई आदेश दिया जा सकता है कि कानून का दुरुपयोग हो रहा है? क्या किसी व्यक्ति की जाति के आधार पर किसी के प्रति संदेह व्यक्त किया जा सकता है? सामान्य वर्ग का व्यक्ति भी फर्जी प्राथमिकी दायर कर सकता है।

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना था कि 20 मार्च, 2018 का शीर्ष अदालत का फैसला संविधान की भावना के अनुरूप नहीं था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि आजादी के 70 साल बाद भी अनुसूचित जाति और जनजातियों के लोगों को सरकार संरक्षण प्रदान नहीं कर सकी है और अभी तक उनके साथ भेदभाव और अस्पृश्यता का व्यवहार किया जाता है।

अदालत के 20 मार्च, 2018 के फैसले के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में जबर्दस्त हिंसक विरोध प्रदर्शन हुआ था। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं जनजाति (उत्पीड़न की रोकथाम) कानून के कठोर प्रावधानों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग होने का जिक्र करते हुए कहा था कि इस कानून के तहत दायर किसी भी शिकायत पर तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

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