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अलविदा 2016: केंद्र सरकार का न्यायपालिका के साथ तल्ख रिश्तों का साल

मोदी सरकार के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने तो आपातकाल के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को निराशाजनक कहा।

Author नई दिल्ली | December 28, 2016 13:14 pm
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फाइल फोटो)

उच्च न्यायपालिका और केंद्र सरकार के बीच तल्ख रिश्तों भरा रहा यह साल। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर उच्च न्यायालयों में जजों की कमी का वास्ता देते हुए सरकार पर नियुक्तियों में देरी का दोष खुलेआम मढ़ते रहे तो दूसरी तरफ सरकार ने भी बेशक लक्ष्मण रेखा में रहते हुए ही सही, उच्च न्यायपालिका को नसीहतें कम नहीं दीं। मोदी सरकार के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने तो आपातकाल के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को निराशाजनक कहा। ऊपर से संसद में उच्च न्यायपालिका पर जजों की नियुक्ति में मनमानी की तोहमत भी कम नहीं लगाई।

जजों की नियुक्ति न करने का मुद्दा:
जहां तक मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर का सवाल है, वे उच्च न्यायपालिका में जम्मू कश्मीर का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। हाईकोर्ट जज वे वहीं में बने थे। साख और कानूनी समझ के मामले में कोई उन पर उंगली नहीं उठा सकता पर अपने भावुक सलीके और विवादास्पद बयानों के कारण वे सुखिर्यों में जरूर रहे। मसलन एक बार तो न्यायपालिका के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में उनकी आंखों से आंसू बह निकले थे। उन्होंने अफसोस जता दिया कि सरकार उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्तियों को लटका रही है। जिससे अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा है। मुकदमे तय होने में देरी का मतलब है लोगों को न्याय पाने के उनके अधिकार से वंचित करना।

इस साल सरकार को लगे दो झटके:
बहरहाल 2016 में सरकार को सुप्रीम कोर्ट से दो बड़े झटके लगे। दल-बदल के बूते कांग्रेस की दो सरकारों को अपदस्थ करने के अपने एजंडे में मोदी सरकार मात खा गई। मात उसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने दी। शायद इसी वजह से तोड़फोड़ कर विपक्षी सरकारों को गिराने का अपना मिशन वह हिमाचल प्रदेश में आगे नहीं बढ़ा पाई। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से सरकार की किरकिरी खूब हुई।

मामले लंबित:
3 करोड़ के करीब मामले लंबित हैं देश की छोटी बड़ी अदालतों में
2.80 करोड़ जिला मामले स्तर की निचली अदालतों में हैं, जिनमें 22 लाख तो 10 साल से भी ज्यादा पुराने हैं

तल्ख रिश्तों की शुरुआत: 2015 में ही तल्खी आ गई थी। जजों के लिए मोदी सरकार के राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। इस आयोग के खिलाफ कई याचिकाएं दायर हुई थीं, जिनमें आशंका जताई गई थी कि सरकार अपना हस्तक्षेप चाहती है।

एमपीओ का पेच: सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आयोग को अंसवैधानिक ठहराते हुए अपने फैसले में एक प्रावधान जोड़ दिया कि सरकार अदालत की सलाह से नियुक्तियों के लिए एक मेमौरेंडम आॅफ प्रोसिजर (एमओपी) बनाएगी। सारा झगड़ा अब इसी प्रस्तावित एमओपी को लेकर फंसा है।

मुख्य न्यायाधीश ने कई बार उठाया मुद्दा:
* सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच तल्खी का असली मुद्दा ये नियुक्तियां ही हैं। मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने मई में प्रधानमंत्री की मौजूदगी में यह मुद्दा पहली बार सार्वजनिक तौर पर उठाया था।
* फिर सितंबर में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के कार्यक्रम में इसे प्रधानमंत्री की मौजूदगी में दोहराया।
* अक्तूबर में सरकार को एक तरह से लताड़ा कि वह जजों की नियुक्ति को मूंछ का सवाल न बनाए।
* इस बीच विज्ञान भवन में हुए एक कार्यक्रम में मंच पर आधा घंटा साथ-साथ बैठने पर भी प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश में कोई संवाद नहीं हुआ तो यह मीडिया की सुर्खी बनना ही था।

2017 : दो मुख्य न्यायाधीश
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर नए साल में तीन जनवरी को रिटायर हो जाएंगे। उनकी जगह वरिष्ठतम जज न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ को नया मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जा चुका है। नए साल में न्यायपालिका और सरकार के रिश्तों की धुरी बनेंगे न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहड़, जो सार्वजनिक तौर पर बेशक कम बोलते हैं पर न्यायपालिका की स्वायत्तता, निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा व लक्ष्मण रेखा को भलीभांति जानते समझते हैं। न्यायमूर्ति ठाकुर को बतौर मुख्य न्यायाधीश पूरे 25 महीने का कार्यकाल मिला है जबकि उनके उत्तराधिकारी को इस पद पर महज आठ महीने से भी कम का मौका मिलेगा। नए साल में देश की सबसे बड़ी अदालत को दो मुखिया मिलेंगे। न्यायमूर्ति खेहड़ के बाद उनकी कुर्सी न्यायमूर्ति दीपक मिश्र संभालेंगे।

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