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अयोध्या पर फैसले ने मथुरा-काशी जैसे विवादों के लिए बंद किए कोर्ट के रास्ते? जानें क्या है Places of Worship Act

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस 'सुप्रीम' फैसले के बाद ऐसे धार्मिक स्थलों में बदलाव के लिए याचिकाओं के कोर्ट तक पहुंचने पर ही लगाम लग गई है।

प्रतीकात्मक तस्वीर , फोटो सोर्स, इंडियन एक्सप्रेस

Ayodhya Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद को खत्म करने के लिए जो फैसला दिया है, उसने कई विवादों के अदालत तक पहुंचने पर भी संभावित रोक लगा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक एक हजार से ज्यादा पेज के फैसले में कोर्ट ने ‘प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ का भी विशेष तौर पर जिक्र किया है। इसके तहत वाराणसी काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी मस्जिद के साथ-साथ मथुरा में जन्मभूमि और इसके पास स्थित मस्जिद जैसे तमाम धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों पर बड़ा संदेश दिया है।

क्या है प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट?: मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस ‘सुप्रीम’ फैसले के बाद ऐसे धार्मिक स्थलों में बदलाव के लिए याचिकाओं के कोर्ट तक पहुंचने पर ही लगाम लग गई है। दरअसल कोर्ट ने अपने फैसले में देश की आजादी के दौरान मौजूद धार्मिक स्थलों के जस के तस स्थिति में संरक्षण पर जोर दिया। गौरतलब है कि यह कानून किसी भी धार्मिक स्थल में जबरन बदलाव करने और ऐसे विवादों को उठाने की अनुमति नहीं देता है जिन्हें लोग भूल चुके हैं। बता दें कि सोशल मीडिया पर देश के कई धार्मिक स्थलों के अस्तित्व को लेकर अक्सर बहस छिड़ती रहती है।

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24 बार हुआ ‘सेक्युलरिज्म’ का जिक्रः सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में करीब 24 बार सेक्युलरिज्म यानी धर्म निरपेक्षता शब्द का जिक्र किया है। इसके जरिये कोर्ट ने देश और संविधान के धर्म निरपेक्षता के सिद्धांत को समझाया है और कहा कि सभी धर्मों की समानता और सम्मान से देश का यह चरित्र मजबूत होता है।

मैराथन सुनवाई के बाद आया फैसलाः 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी विध्वंस को अंजाम दिया गया था। इसके बाद देश में सांप्रदायिक हिंसा शुरू हो गई थी। लंबे समय से यह विवाद अलग-अलग अदालतों में चलता रहा। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मैराथन सुनवाई के बाद फैसला सुना दिया। देश के सभी पक्षों ने सांप्रदायिक सद्भाव के साथ इस फैसले को स्वीकार भी किया।

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