बीते कुछ सालों में चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक दलों द्वारा ‘मुफ्त योजनाओं’ की घोषणा की जाती है। इसका असर भी चुनाव में होता है और यह जीत की गारंटी भी बना है। इस बीच अब सुप्रीम कोर्ट इन योजनाओं के खिलाफ एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है। इस याचिका को मार्च में सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया है। याचिका में ‘मुफ्त उपहार’ देने या बांटने वाली राजनीतिक पार्टियों के चुनाव चिन्ह को जब्त करने या उनका रजिस्ट्रेशन रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

राजनीतिक पार्टियां हर चीज का वादा करती हैं और यह भ्रष्टाचार का प्रतीक- याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ को बताया कि उनकी जनहित याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग को 2022 में ही नोटिस जारी किए गए थे। उन्होंने मामले को जल्द से जल्द लिस्ट करने का आग्रह किया। वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “सूर्य और चंद्रमा को छोड़कर राजनीतिक पार्टियां चुनाव के दौरान मतदाताओं से हर चीज का वादा करती हैं और यह भ्रष्टाचार का प्रतीक है।” इस पर चीफ जस्टिस ने कहा, “यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कृपया हमें याद दिलाएं और अंत में इसका जिक्र करें। हम इसे मार्च में लिस्ट करेंगे।”

25 जनवरी 2022 को तत्कालीन चीफ जस्टिस एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने केंद्र और चुनाव आयोग से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा था जिसमें चुनाव से पहले ‘मुफ्त उपहार’ देने या बांटने वाली राजनीतिक पार्टी का चुनाव चिन्ह जब्त करने या उसे पंजीकृत न करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। पीठ ने इसे गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा था कि कभी-कभी ‘मुफ्त की योजनाओं’ का बजट नियमित बजट से अधिक हो जाता है। याचिका में अदालत से यह घोषित करने का आग्रह किया गया था कि चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से ‘मुफ्त की योजनाओं’ देने का वादा मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करता है, यह निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को बाधित करता है और चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता को दूषित करता है।

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वकील अश्वनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर याचिका में,एक विकल्प के रूप में केंद्र को इस संबंध में कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है, “याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव को ध्यान में रखते हुए मुफ्त उपहार देकर मतदाताओं को प्रभावित करने की राजनीतिक पार्टियों की हालिया प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, बल्कि संविधान की भावना को भी ठेस पहुंचाती है।”

चुनाव चिह्न जब्त करने की मांग

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है, “यह अनैतिक प्रथा सत्ता में बने रहने के लिए सरकारी खजाने की कीमत पर मतदाताओं को रिश्वत देने के समान है और लोकतांत्रिक सिद्धांतों और प्रथाओं को संरक्षित करने के लिए इससे बचना चाहिए।” याचिका में चुनाव आयोग को यह निर्देश देने की भी मांग की गई है कि राज्य दल के रूप में मान्यता की शर्तों से संबंधित चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968 के प्रासंगिक अनुच्छेदों में एक अतिरिक्त शर्त जोड़ी जाए कि कोई भी राजनीतिक दल चुनाव से पहले सार्वजनिक निधि से अनुचित मुफ्त उपहारों का वादा/वितरण नहीं करेगा।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से यह घोषित करने का आग्रह किया है कि चुनाव से पहले सार्वजनिक निधि से निजी वस्तुओं या सेवाओं का वादा या वितरण संविधान के कई अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है, जिसमें अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) भी शामिल है। याचिका में कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले कुछ राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे वादों का जिक्र किया गया है। याचिका में कहा गया है कि लोकतंत्र का आधार चुनावी प्रक्रिया है, और धन वितरण और मुफ्त उपहारों के वादे चिंताजनक स्तर तक पहुंच गए हैं, जिसके चलते कई बार चुनाव रद्द करने पड़े हैं।